प्यारी भाभी की चु@@ई—>दोपहर की उस तपती हुई खामोशी में हवेली का हर कोना जैसे किसी अनकही प्यास से झुलस रहा था। समीर अपनी किताबों में मन लगाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन रसोई से आती चूड़ियों की खनक और पायलों की छम-छम उसे बार-बार विचलित कर रही थी। सरिता भाभी घर में अकेली थीं क्योंकि भैया किसी काम से शहर गए हुए थे, और घर की इस नीरवता ने हवा में एक अजीब सी भारीपन भर दिया था। समीर ने महसूस किया कि उसकी धड़कनें आज कुछ ज्यादा ही तेज चल रही हैं, जैसे कोई तूफान आने से पहले की खामोशी हो। गर्मी की वजह से समीर के बदन पर पसीना चमक रहा था और उसकी नजरें बार-बार रसोई के दरवाजे की ओर जा रही थीं जहाँ से सरिता की परछाईं फर्श पर लहरा रही थी।
सरिता भाभी की उम्र लगभग बत्तीस साल थी, लेकिन उनका यौवन किसी ढलती दोपहर की तरह नहीं, बल्कि खिलते हुए गुलाब की तरह था। उनकी काया बहुत ही सुडौल और भरी हुई थी, जिसे देखकर किसी का भी मन डोल जाए। उनकी साड़ी के भीतर से उनके बड़े-बड़े तरबूज अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहे थे, और जब वह चलती थीं, तो उनका भारी पिछवाड़ा एक लय में हिलता था जो समीर की आंखों को अपनी ओर खींच लेता था। उनके तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर साड़ी के महीन कपड़े के नीचे से भी अपनी उभरी हुई बनावट का संकेत देते थे, और उनकी कमर का वह घुमाव समीर को पागल करने के लिए काफी था। सरिता की त्वचा गेंहुए रंग की थी जो पसीने की बूंदों से भीगकर और भी अधिक चमक रही थी।
समीर और सरिता के बीच हमेशा से एक अनकहा जुड़ाव रहा था, जो देवर-भाभी के पवित्र रिश्ते से कहीं अधिक गहरा था। समीर अक्सर उनके छोटे-मोटे कामों में मदद करता और बदले में सरिता उसे अपनी उन निगाहों से देखती जिनमें ममता के साथ-साथ एक दबी हुई चाहत भी होती थी। वह समीर के लिए विशेष पकवान बनाती और उसे खिलाते समय अपनी उंगलियों का स्पर्श उसकी हथेलियों पर छोड़ जाती। उस दिन भी समीर ने महसूस किया कि सरिता की आंखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे वह भी उस तन्हाई को समीर की तरह ही महसूस कर रही हों। उनके बीच की बातचीत में आज एक नया ठहराव था, जिसमें शब्दों से ज्यादा सांसों की गर्माहट बोल रही थी।
अचानक बिजली चली गई और कमरे का पंखा रुक गया, जिससे कमरे के अंदर की उमस और भी बढ़ गई। समीर रसोई में गया जहाँ सरिता पसीने से तर-बतर होकर अपने पल्लू से चेहरा पोंछ रही थीं। उनकी साड़ी उनके शरीर से चिपक गई थी, जिससे उनके सुडौल तरबूजों की गोलाई और भी स्पष्ट हो गई थी। समीर को देखते ही सरिता के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई, लेकिन उनकी सांसें कुछ तेज चलने लगी थीं। समीर ने धीरे से कहा, ‘भाभी, बहुत गर्मी है, आप आराम क्यों नहीं करतीं?’ सरिता ने उसकी ओर देखा और उनकी नजरें समीर के चौड़े सीने पर जा टिकीं जो पसीने से गीला था। आकर्षण की वह चिंगारी अब आग में बदलने को तैयार थी।
समीर ने हिम्मत जुटाकर सरिता के करीब कदम बढ़ाया, उसके मन में एक गहरा संघर्ष चल रहा था लेकिन शरीर की इच्छाएं उन पर हावी हो रही थीं। उसने देखा कि सरिता ने अपनी नजरें नहीं हटाईं, बल्कि उनकी पलकें झुक गईं और उनके होंठ थरथराने लगे। समीर का हाथ धीरे से सरिता के कंधे की ओर बढ़ा और जैसे ही उसकी उंगलियों ने उनकी मखमली त्वचा को छुआ, सरिता के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। वह रुकी नहीं, बल्कि समीर के करीब आ गईं, उनकी सांसों की महक अब समीर के चेहरे पर महसूस हो रही थी। झिझक का वह आखिरी बांध टूट चुका था और अब केवल एक-दूसरे को पाने की तीव्र प्यास बाकी थी।
समीर ने धीरे से सरिता के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उनके माथे पर एक गहरा चुंबन अंकित किया। सरिता ने अपनी आंखें बंद कर लीं और समीर के सीने पर अपना सिर टिका दिया। समीर के हाथों ने धीरे-धीरे उनकी पीठ की ओर रुख किया और उनकी साड़ी के पल्लू को खिसका दिया। जैसे ही पल्लू गिरा, सरिता के पुष्ट तरबूज ब्लाउज के भीतर कैद होने के लिए छटपटाते हुए नजर आए। समीर ने अपनी उंगलियों से उनके कंधों को सहलाया और धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ते हुए उनके मटरनुमा उभारों को छू लिया। सरिता के मुंह से एक दबी हुई आह निकली और उन्होंने समीर की कमीज के बटन खोलना शुरू कर दिया।
कमरे का तापमान बढ़ता जा रहा था और दोनों की धड़कनें एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठा रही थीं। समीर ने सरिता को गोद में उठाया और उन्हें बिस्तर की ओर ले गया। बिस्तर पर लेटते ही सरिता ने समीर को अपनी बाहों में भर लिया। समीर ने उनके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले और जैसे ही वह खुला, उनके विशाल तरबूज आजाद होकर बाहर छलक आए। समीर ने अपनी आंखों को उन पर गड़ा दिया और फिर धीरे से झुककर एक तरबूज को अपने मुंह में भर लिया। सरिता ने समीर के बालों में अपनी उंगलियां फंसा लीं और अपनी पीठ को ऊपर की ओर धनुष की तरह मोड़ दिया, उनका पूरा बदन कामुकता से कांप रहा था।
समीर ने अब सरिता के निचले हिस्से की ओर ध्यान दिया और उनकी साड़ी और पेटीकोट को धीरे से पैरों के रास्ते बाहर निकाल दिया। अब सरिता पूरी तरह से प्राकृतिक अवस्था में समीर के सामने थीं। उनकी गहरी खाई और उसके आस-पास के घने बाल समीर की उत्तेजना को चरम पर ले जा रहे थे। समीर ने अपनी जीभ से उनकी खाई को सहलाना शुरू किया, जिससे सरिता के शरीर में बिजली सी दौड़ गई। वह बार-बार समीर का नाम पुकार रही थीं और अपनी कमर को हवा में उठा रही थीं। समीर का खीरा अब पूरी तरह से अकड़ चुका था और वह भी उस गहरी खाई में उतरने के लिए बेकरार था।
समीर ने अपनी पैंट उतारी और उसका विशाल खीरा पूरी शान से खड़ा हो गया। सरिता ने जैसे ही उसे देखा, उनके चेहरे पर एक अचरज भरी खुशी छा गई। उन्होंने अपने हाथ बढ़ाकर उस गर्म और सख्त खीरे को पकड़ लिया और उसे धीरे-धीरे सहलाने लगीं। समीर ने अब सरिता के पैरों को फैलाया और उनकी खाई के द्वार पर अपना खीरा टिका दिया। दोनों की नजरें एक-दूसरे से मिलीं, जिनमें समर्पण और प्यार का अथाह सागर था। समीर ने एक गहरे झटके के साथ अपने खीरे को सरिता की तंग खाई के अंदर धकेल दिया। सरिता ने अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं और समीर के कंधों पर अपने नाखून गड़ा दिए।
खुदाई की वह प्रक्रिया बहुत ही धीमी और लयबद्ध तरीके से शुरू हुई। समीर हर धक्के के साथ गहराई तक जाने की कोशिश कर रहा था और सरिता नीचे से पूरा साथ दे रही थीं। कमरे में केवल उनकी सांसों और शरीर के टकराने की आवाजें गूंज रही थीं। समीर ने सरिता के हाथों को अपने हाथों में लेकर कसकर पकड़ लिया और सामने से खोदना जारी रखा। सरिता के तरबूज हर धक्के के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे और समीर बार-बार उनके मटर को अपने दांतों से हल्के से काट रहा था। ‘समीर… और जोर से… मुझे पूरी तरह खोद दो,’ सरिता ने सिसकते हुए कहा, जिससे समीर का जोश और भी बढ़ गया।
कुछ देर सामने से खोदने के बाद समीर ने सरिता की स्थिति बदली और उन्हें बिस्तर पर घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब वह पिछवाड़े से खोदने की तैयारी में था। सरिता का भारी पिछवाड़ा अब समीर के सामने था, जिसे देखकर समीर ने उन पर थप्पड़ जमाया जिससे वह लाल हो गए। समीर ने अपना खीरा पीछे से उनकी गीली खाई में उतारा और तेज झटके देना शुरू किया। सरिता अपने हाथों को तकिए में धंसा चुकी थीं और उनकी हर आह समीर के कानों में शहद की तरह घुल रही थी। वह पूरी तरह से समीर के वश में थीं और उस खुदाई का आनंद ले रही थीं जो उनके शरीर के हर रोम-रोम को तृप्त कर रही थी।
पसीना दोनों के शरीरों को एक-दूसरे से चिपका रहा था। समीर की गति अब और भी तेज हो गई थी क्योंकि उसे महसूस हो रहा था कि अब उसका रस निकलने वाला है। सरिता भी अपने चरमोत्कर्ष के करीब थीं, उनकी खाई अब बहुत ज्यादा गीली और गर्म हो गई थी। समीर ने एक आखिरी और बहुत ही गहरा धक्का लगाया और सरिता ने उसे कसकर अपनी ओर खींच लिया। उसी पल समीर का सारा रस सरिता की खाई की गहराइयों में छूट गया और सरिता का भी रस निकलकर समीर के खीरे को भिगो गया। दोनों ही बेदम होकर एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े, उनकी सांसें अब भी तेज थीं लेकिन मन में एक असीम शांति थी।
खुदाई के बाद की वह हालत शब्दों में बयान करना मुश्किल था। समीर और सरिता पसीने से लथपथ होकर एक-दूसरे की बाहों में सिमटे हुए थे। सरिता का चेहरा गुलाबी हो गया था और समीर की आंखों में अपनी प्यारी भाभी के लिए सम्मान और प्रेम और भी बढ़ गया था। उन्होंने एक-दूसरे को फिर से धीरे से चूमा और बिना कुछ बोले उस पल की मधुरता को महसूस करने लगे। वह थकान नहीं थी, बल्कि एक ऐसी तृप्ति थी जिसकी उन्हें वर्षों से तलाश थी। धीरे-धीरे समीर ने सरिता को कंबल से ढका और उनके माथे पर एक प्यार भरा चुंबन देकर उन्हें अपनी गोद में सुला लिया।
उस दोपहर ने उनके रिश्ते को एक नई परिभाषा दे दी थी। वह केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं थी, बल्कि दो आत्माओं का मिलन था जिसने समाज के बंधनों को पल भर के लिए भुला दिया था। सरिता ने समीर के सीने पर उंगली से लकीरें खींचते हुए कहा, ‘तुमने आज मुझे वह सब कुछ दिया जिसकी मुझे कमी खलती थी।’ समीर ने उनके हाथ को चूम लिया और वादा किया कि वह हमेशा उनका ख्याल रखेगा। बाहर सूरज ढलने को था, लेकिन उन दोनों के जीवन में एक नई सुबह की शुरुआत हो चुकी थी, जो केवल उनकी अपनी थी और जिसकी गवाह वह बंद कमरा और उसकी खामोश दीवारें थीं।