होटल का वह अनजाना कमरा और पड़ोसन की नशीली रात—>समीर अपने काम के सिलसिले में शहर के एक आलीशान होटल में रुका हुआ था। रात के दस बज रहे थे और वह अपनी बालकनी में खड़ा होकर बाहर की जगमगाती रोशनी को देख रहा था। तभी उसकी नज़र बगल वाली बालकनी में खड़ी एक खूबसूरत औरत पर पड़ी जिसका नाम कविता था। वह भी इस होटल में किसी कॉन्फ्रेंस के लिए आई हुई थी। कविता ने एक गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी जो उसके शरीर पर बिजली की तरह चमक रही थी। उन दोनों की निगाहें मिलीं और एक अनकही सी कशिश हवा में तैरने लगी। समीर को लगा जैसे समय रुक गया हो और उस अजनबी पड़ोसन की खुशबू उसके कमरे तक पहुँच रही हो। समीर ने धीरे से मुस्कराते हुए हेलो कहा और कविता ने भी बड़ी शालीनता से उसका जवाब दिया, लेकिन उसकी आँखों की चमक कुछ और ही बयां कर रही थी।
कविता का बदन किसी तराशी हुई मूरत जैसा था जिसे देखकर किसी भी पुरुष का मन डोल जाए। साड़ी के पतले पल्लू से उसके भारी और गोल **तरबूज** साफ झलक रहे थे, जो उसकी हर सांस के साथ ऊपर-नीचे होकर समीर की धड़कनें बढ़ा रहे थे। समीर की नज़रें उन **तरबूजों** के बीच की गहरी घाटी पर टिक गईं, जहाँ से पसीने की एक बूंद धीरे-धीरे नीचे सरक रही थी। कविता के चेहरे पर एक नशीली मुस्कान थी और उसकी गोरी गर्दन पर बिखरे हुए **बाल** उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे। उसके ब्लाउज के भीतर दबे हुए **मटर** जैसे दाने कपड़े को फाड़कर बाहर आने की जिद कर रहे थे, जिन्हें देख समीर के शरीर में एक अजीब सी गर्मी दौड़ गई।
बातों-बातों में पता चला कि कविता अपने वैवाहिक जीवन की नीरसता से परेशान थी और समीर भी अपनी व्यस्त जिंदगी से ऊब चुका था। दोनों के बीच एक भावनात्मक जुड़ाव महसूस होने लगा। समीर ने उसे अपने कमरे में एक कप कॉफी के लिए आमंत्रित किया और कविता ने बिना किसी झिझक के हाँ कह दिया। जब वह कमरे के अंदर आई, तो वातावरण में एक अजीब सी मादकता घुल गई। कमरे की मद्धम रोशनी में कविता और भी ज़्यादा कामुक लग रही थी। समीर ने धीरे से उसके करीब जाकर अपना हाथ उसकी मखमली कमर पर रखा। कविता का शरीर उस पहले स्पर्श से बुरी तरह काँप उठा, जैसे उसे इसी पल का बरसों से इंतज़ार था।
समीर की उंगलियां जब कविता की रेशमी त्वचा पर रेंगने लगीं, तो उसकी सांसें तेज चलने लगीं। समीर ने धीरे से उसके साड़ी के पल्लू को खिसका दिया, जिससे उसके विशाल **तरबूज** पूरी तरह से आज़ाद होकर बाहर झाँकने लगे। समीर ने अपनी जीभ से उसके एक **मटर** को हल्के से छुआ, तो कविता के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकल गई। उसने समीर के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ लिया और उसे अपने शरीर की ओर और ज़ोर से खींचने लगी। समीर अब रुकने वाला नहीं था, उसने कविता को बिस्तर पर लेटा दिया और उसके पूरे बदन को अपनी नज़रों से चखने लगा।
समीर ने धीरे से कविता की साड़ी और पेटीकोट को पूरी तरह उतार दिया, जिससे उसकी रेशमी **खाई** पूरी तरह से सामने आ गई। उस **खाई** के चारों ओर बहुत कम और सलीके से कटे हुए **बाल** थे, जो उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रहे थे। समीर ने अपनी जीभ से उस **खाई** को सहलाना शुरू किया, जिससे कविता का पूरा शरीर कमान की तरह मुड़ने लगा। वह बिस्तर की चादर को अपने हाथों से भींचने लगी और उसकी सिसकारियां कमरे की शांति को भंग करने लगीं। समीर का अपना **खीरा** भी अब पूरी तरह से अकड़ चुका था और वह अपनी मंज़िल पाने के लिए बेताब था।
कविता ने समीर के **खीरे** को अपने कोमल हाथों में लिया और उसे सहलाने लगी। उसकी गर्मी महसूस करते ही कविता ने उस **खीरे** को अपने मुँह में ले लिया और उसे बड़े चाव से चूसने लगी। समीर की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा और उसे लगा जैसे वह स्वर्ग के द्वार पर खड़ा हो। कुछ देर तक यह सिलसिला चलने के बाद, समीर ने कविता को **सामने से खोदने** की स्थिति में लिटाया और अपने **खीरे** की नोक को उसकी गीली **खाई** के मुहाने पर टिका दिया। कविता ने अपनी आँखें बंद कर लीं और समीर ने एक गहरे धक्के के साथ अपने **खीरे** को पूरी तरह उसकी **खाई** की गहराई में उतार दिया।
कविता की एक ज़ोरदार चीख निकली जो दर्द और आनंद का मिश्रण थी। समीर ने अपनी रफ्तार धीरे रखी और गहराई से **खुदाई** करना जारी रखा। हर धक्के के साथ कविता के **तरबूज** हवा में उछल रहे थे और समीर उन्हें अपने हाथों से मसलते हुए उसके **मटर** को चबा रहा था। कमरे में सिर्फ उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ और कविता की मदहोश कर देने वाली कराहें गूँज रही थीं। समीर ने अब उसे घुमाया और **पिछवाड़े से खोदना** शुरू किया। इस स्थिति में कविता की सुडौल गांड और भी आकर्षक लग रही थी और समीर पूरी ताकत से अपनी **खुदाई** का आनंद ले रहा था।
जैसे-जैसे खेल अपने चरम पर पहुँचा, कविता की **खाई** पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वह झटके लेने लगी थी। समीर ने अपनी रफ्तार और तेज़ कर दी, और अंत में एक ज़ोरदार धक्के के साथ उसका सारा **रस निकलना** शुरू हो गया। कविता ने भी उसी पल अपना **रस छोड़ा** और वह समीर की बाहों में ढीली पड़ गई। दोनों पसीने से लथपथ थे और उनकी सांसें अभी भी तेज़ चल रही थीं। उस रात उस होटल के कमरे ने एक ऐसी कहानी देखी थी जो सिर्फ दो रूहों और शरीरों की प्यास की थी। समीर और कविता एक-दूसरे में सिमटे हुए थे, जैसे दुनिया की सारी खुशियाँ उन्हें उसी पल मिल गई हों।