कविता की पहली चु@@ई—>
समीर लगभग दस साल बाद अपने बचपन के शहर वापस लौटा था और उसके मन में अपनी पुरानी सबसे अच्छी दोस्त कविता से मिलने की एक बहुत ही तीव्र और दबी हुई इच्छा कुलबुला रही थी। कविता और समीर बचपन में एक-दूसरे के बहुत करीब थे, लेकिन कॉलेज के बाद रास्ते अलग हो गए थे। जब समीर ने कविता के घर की घंटी बजाई, तो उसे उम्मीद नहीं थी कि वक्त ने कविता के शरीर को इतना कामुक और आकर्षक बना दिया होगा। जैसे ही दरवाजा खुला, समीर की नजरें कविता पर थम सी गईं; उसने एक गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी हुई थी, जिसमें उसके उभरते हुए अंग अपनी पूरी जवानी का अहसास करा रहे थे। कविता के शरीर की बनावट अब एक पूरी औरत जैसी हो चुकी थी, जिसके ऊपर के हिस्से में दो बड़े और रसीले तरबूज ब्लाउज को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे।
कविता की कद-काठी अब पहले से कहीं ज्यादा निखर चुकी थी और उसकी कमर की गोलाई समीर को मदहोश करने के लिए काफी थी। समीर ने गौर किया कि साड़ी के पतले कपड़े के नीचे से उसके भारी और गोल पिछवाड़े की बनावट साफ़ झलक रही थी, जो चलते समय एक लय में हिल रहे थे। कविता का रंग गेंहुआ था और उसकी गर्दन पर हल्की सी नमी उसे और भी ज्यादा उत्तेजक बना रही थी। समीर के दिल की धड़कनें तेज हो गईं जब उसने देखा कि कविता के उन बड़े तरबूजों के बीच एक गहरी घाटी बन रही थी, जो किसी भी मर्द को खुद में समा लेने का न्योता दे रही थी। कविता ने उसे अंदर बुलाया और उसकी मदभरी मुस्कान समीर के शरीर के अंदर एक नई लहर पैदा कर गई, जिससे उसके पजामे के अंदर सोता हुआ खीरा धीरे-धीरे अपनी लंबाई बढ़ाने लगा था।
ड्राइंग रूम में बैठते ही दोनों के बीच पुरानी यादों का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन बातों के बीच जो खामोशी थी, वह कामुकता से भरी हुई थी। समीर की नजरें बार-बार कविता के ब्लाउज के उस हिस्से पर जा रही थीं जहाँ उसके मटर जैसे उभार कपड़े के ऊपर से ही अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे। कविता को भी समीर की नजरों का अहसास हो रहा था और वह जानबूझकर अपनी साड़ी का पल्लू खिसका रही थी, जिससे उसके गोरे पेट और नाभि के नीचे के रेशमी बाल तो नहीं दिख रहे थे लेकिन उस हिस्से की गरमाहट महसूस हो रही थी। दोनों के बीच एक अनकहा भावनात्मक जुड़ाव फिर से जिंदा हो गया था, जहाँ बचपन का मासूम प्यार अब एक व्यस्क वासना में तब्दील होने लगा था। समीर का मन कर रहा था कि वह अभी उठकर कविता के उन भारी तरबूजों को अपने हाथों में भर ले और उनका रस पी जाए।
बातों-बातों में समीर ने कविता का हाथ थाम लिया, जिससे कविता के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई और वह हल्की सी कांप उठी। समीर ने महसूस किया कि कविता के हाथ ठंडे पड़ रहे थे लेकिन उसकी सांसों में एक अजीब सी गर्मी थी जो उसके चेहरे तक पहुँच रही थी। समीर धीरे से सोफे पर कविता के करीब सरक गया और उसके कंधे पर अपना हाथ रख दिया, जिससे उसका हाथ कविता के साड़ी के पल्लू से रगड़ खाता हुआ उसके नर्म कंधे को छूने लगा। कविता ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी आह भरी, जो समीर के लिए हरी झंडी की तरह थी। उसने महसूस किया कि कविता के शरीर की खुशबू किसी जंगली फूल जैसी थी, जो उसे पूरी तरह से पागल करने के लिए काफी थी। अब झिझक का पर्दा धीरे-धीरे हट रहा था और वासना की आग दोनों के बीच भड़कने लगी थी।
समीर ने कविता के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके माथे को सहलाने लगा, फिर धीरे-धीरे उसने अपने होंठ कविता के कान के पास ले जाकर हल्की फुसफुसाहट की। कविता की गर्दन पर समीर की गर्म सांसें पड़ते ही उसके शरीर के रोंगटे खड़े हो गए और उसके मटर जैसे दाने अब ब्लाउज के ऊपर और भी सख्त होकर उभर आए थे। समीर ने अपना हाथ नीचे ले जाते हुए कविता के भारी तरबूजों को पहली बार स्पर्श किया; उनकी कोमलता और भारीपन ने समीर के दिमाग की नसें हिला दीं। कविता के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकली और उसने समीर को अपनी बाहों में कस लिया। समीर अब रुकने वाला नहीं था, उसने धीरे से कविता के ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किए, जिससे उसके दूधिया सफेद तरबूज पूरी तरह आजाद होकर सामने आ गए।
जैसे ही कविता के तरबूज आजाद हुए, समीर ने बिना देर किए एक तरबूज को अपने मुँह में भर लिया और उसके मटर को अपनी जीभ से सहलाने लगा। कविता दर्द और मजे के मिले-जुले अहसास से तड़प उठी और समीर के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ लिया। समीर की जीभ जब कविता के मटर पर घूम रही थी, तो कविता की खाई अब धीरे-धीरे गीली होने लगी थी और उसे अपने निचले हिस्से में एक अजीब सी हलचल महसूस हो रही थी। समीर ने अपना हाथ कविता की साड़ी के नीचे डाला और उसकी जांघों को सहलाते हुए ऊपर की ओर बढ़ने लगा, जहाँ उसने महसूस किया कि कविता की खाई अब पूरी तरह से शहद छोड़ चुकी थी। समीर ने अपनी उंगली से खाई को खोदना शुरू किया, जिससे कविता की कराहें अब पूरे कमरे में गूँजने लगी थीं।
कविता अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थी, उसने समीर के पजामे की डोरी खोली और उसके तने हुए विशाल खीरे को बाहर निकाला। समीर का खीरा अब पूरी तरह से अपनी ताकत में था, जो किसी फन उठाए सांप की तरह खड़ा था। कविता ने पहली बार उस खीरे को अपने नाजुक हाथों में पकड़ा और उसकी लंबाई और मोटाई देखकर उसकी आँखें फटी रह गईं। उसने धीरे से समीर के खीरे को अपने मुँह में लेना शुरू किया और उसे किसी आइसक्रीम की तरह चूसने लगी। समीर को ऐसा लग रहा था जैसे वह जन्नत के मजे ले रहा हो, कविता की गीली जुबान जब उसके खीरे के ऊपरी हिस्से को चाट रही थी, तो समीर का पूरा शरीर झटके लेने लगा था। समीर ने कविता को बेड पर लेटाया और उसकी टांगों को चौड़ा कर दिया ताकि वह उसकी गहरी खाई का दीदार कर सके।
समीर ने अब कविता की खाई को चाटना शुरू किया, उसकी जीभ जब कविता के रस से भरी खाई के अंदर जा रही थी, तो कविता अपनी कमर ऊपर उठा-उठा कर समीर का साथ दे रही थी। कविता के शरीर से पसीना बह रहा था और उसकी सांसों की गति इतनी तेज थी कि वह हाफने लगी थी। समीर ने अपनी उंगली से खाई में तेज खुदाई शुरू की, जिससे कविता का रस और भी ज्यादा निकलने लगा और वह पूरी तरह से भीग गई। अब समीर से और इंतजार नहीं हो रहा था, उसने अपने विशाल खीरे को कविता की तंग और रसीली खाई के द्वार पर रखा। जैसे ही खीरे का सिरा खाई के अंदर घुसा, कविता के मुँह से एक चीख निकल गई और उसने समीर के कंधों पर अपने नाखून गड़ा दिए।
समीर ने धीरे-धीरे अपने खीरे को कविता की खाई की गहराइयों में उतारना शुरू किया; वह खाई इतनी तंग थी कि समीर को अंदर जाने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी। हर धक्के के साथ कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और समीर उन पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए हुए था। जब पूरा खीरा कविता की खाई के अंदर समा गया, तो दोनों को एक असीम शांति और उत्तेजना का अहसास हुआ। समीर ने अब सामने से खोदना शुरू किया, उसकी लय धीरे-धीरे बढ़ रही थी और हर धक्के के साथ मांस के आपस में टकराने की आवाज ‘चप-चप’ करके गूँज रही थी। कविता अब पूरी तरह से इस खुदाई के आनंद में डूब चुकी थी और वह चिल्ला रही थी, ‘हाँ समीर, और तेज खोदो, मुझे पूरा भर दो।’
समीर ने अब कविता की पोजीशन बदली और उसे पिछवाड़े से खोदने के लिए तैयार किया। कविता ने घुटनों के बल झुककर अपने भारी पिछवाड़े को समीर की ओर कर दिया, जिससे उसकी खाई का पिछला हिस्सा और भी ज्यादा आकर्षक लग रहा था। समीर ने पीछे से अपने खीरे को फिर से कविता की खाई में डाला और पागलों की तरह खुदाई करने लगा। इस पोजीशन में समीर के धक्के सीधे कविता की कोख तक पहुँच रहे थे, जिससे उसे एक अलग ही चरम सुख मिल रहा था। समीर की पकड़ कविता की पतली कमर पर इतनी मजबूत थी कि वहाँ उसकी उंगलियों के निशान पड़ रहे थे। पसीने से तरबतर दोनों के शरीर अब एक-दूसरे में पूरी तरह से विलीन हो चुके थे और कमरे का तापमान अपनी चरम सीमा पर था।
काफी देर तक तेज खुदाई करने के बाद, समीर को महसूस हुआ कि अब उसका रस निकलने वाला है। कविता भी अपने रस के छूटने के करीब थी, उसने पीछे मुड़कर समीर के होंठों को चूमना चाहा और अपनी कमर को जोर-जोर से हिलाने लगी। समीर ने आखिरी कुछ बहुत तेज धक्के मारे और अपना सारा गर्म रस कविता की गहरी खाई के अंदर ही छोड़ दिया। उसी पल कविता का भी रस निकल गया और वह बेदम होकर बिस्तर पर गिर पड़ी। दोनों के शरीर एक-दूसरे से सटे हुए थे और उनकी सांसें अभी भी तेज चल रही थीं। समीर ने महसूस किया कि उसका खीरा अब धीरे-धीरे ढीला पड़ रहा था लेकिन कविता की खाई की गर्माहट अभी भी उसे सुकून दे रही थी।
खुदाई के बाद की वह शांति बहुत ही सुखद थी, समीर ने कविता को अपनी बाहों में समेट लिया और उसके पसीने से भीगे माथे को चूम लिया। कविता की आँखों में एक अजीब सी चमक और संतुष्टि थी, जो यह बता रही थी कि आज उसे वह मिल गया जिसकी उसे बरसों से चाहत थी। समीर और कविता काफी देर तक बिना कुछ बोले बस एक-दूसरे की धड़कनों को महसूस करते रहे। उनके शरीर की थकावट और पसीने की खुशबू अब उनके प्यार की गवाह बन चुकी थी। समीर ने धीरे से कविता के कान में कहा, ‘तुम आज भी उतनी ही लाजवाब हो जितनी बचपन में थी’, जिस पर कविता ने बस एक गहरी सांस ली और समीर की छाती में अपना चेहरा छुपा लिया। वह रात उन दोनों के लिए एक नई शुरुआत थी, जहाँ जिस्मानी भूख ने रूहानी जुड़ाव को और भी गहरा कर दिया था।