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रेखा माँ की चु@@ई


रेखा माँ की चु@@ई—>

दोपहर की वह तपती हुई खामोशी पूरे बंगले में पसरी हुई थी, जहाँ सूरज की तीखी किरणें खिड़कियों के पर्दों को भेदकर फर्श पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही थीं। अमित अपने कमरे में लेटा हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था, क्योंकि उसके जहन में सिर्फ अपनी सौतेली माँ रेखा का चेहरा घूम रहा था। रेखा, जो अभी मात्र अड़तीस साल की थी, उसकी काया किसी ढलती उम्र की महिला की नहीं, बल्कि एक परिपक्व और रसीले फल की तरह थी जिसे देखकर किसी का भी मन डोल जाए। अमित के पिता पिछले एक हफ्ते से व्यापार के सिलसिले में शहर से बाहर थे और इस विशाल घर में वह और उसकी जवान माँ अकेले थे, जिससे उनके बीच का तनाव और अनकहा आकर्षण धीरे-धीरे अपनी सीमाएं लांघने लगा था। अमित अक्सर छुप-छुपकर रेखा को काम करते देखता था, उसकी चाल में जो लचक थी और उसके अंगों का जो भारीपन था, वह अमित के रातों की नींद हराम करने के लिए काफी था।

रेखा की शारीरिक बनावट किसी संगमरमर की मूरत जैसी थी, जिसका हर उभार अपनी एक कहानी कहता था और अमित को अपनी ओर खींचता था। जब वह सूती साड़ी पहनकर रसोई में काम करती थी, तो उसके ब्लाउज से झांकते हुए भारी और गोल तरबूज अमित की धड़कनों को अनियंत्रित कर देते थे। उन तरबूजों का आकार इतना पूर्ण था कि साड़ी का पल्लू भी उन्हें पूरी तरह ढकने में नाकाम रहता था और अमित का जी चाहता था कि वह बस उन्हें देखता रहे। रेखा का निचला हिस्सा भी कम आकर्षक नहीं था, उसका चौड़ा और गदबदा पिछवाड़ा जब चलते समय हिलता था, तो अमित के शरीर में एक अजीब सी लहर दौड़ जाती थी। उसके गोरे बदन पर पसीने की बूंदें जब चमकती थीं, तो अमित के मन में अजीब से ख्याल आते थे कि काश वह उन बूंदों को अपने होठों से पी पाता। रेखा को भी शायद इस बात का एहसास था कि अमित की नजरें उस पर टिकी रहती हैं, और शायद वह भी अंदर ही अंदर इस युवा आकर्षण का आनंद ले रही थी।

उस दिन दोपहर का खाना खाने के बाद रेखा सोफे पर बैठी अपने पैरों को सहला रही थी, उसके चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी। अमित पास ही खड़ा उसे देख रहा था और तभी रेखा ने धीरे से कहा कि उसके पैरों और कमर में बहुत दर्द हो रहा है, क्या वह थोड़ी मालिश कर देगा। अमित का दिल जोर से धड़कने लगा क्योंकि यह वही मौका था जिसका वह शायद अवचेतन मन में इंतजार कर रहा था, उसने बिना देरी किए तेल की शीशी उठाई और रेखा के पास बैठ गया। जैसे ही अमित के गर्म हाथों ने रेखा के गोरे और मखमली पैरों को छुआ, रेखा के मुंह से एक धीमी सी आह निकल गई जिसने कमरे के तापमान को एकदम से बढ़ा दिया। अमित के हाथ धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ने लगे, टखनों से घुटनों तक और फिर जांघों के उस रेशमी हिस्से तक जहाँ साड़ी थोड़ी ऊपर सरक गई थी, जिससे अमित का संयम अब जवाब देने लगा था।

अमित के हाथों का दबाव जैसे-जैसे बढ़ रहा था, रेखा की सांसें भी भारी होने लगी थीं और उसकी आँखें धीरे-धीरे मुंदने लगी थीं। रेखा ने अमित को धीरे से अपने पास बैठने का इशारा किया और अमित जब उसके करीब बैठा, तो उसे रेखा के शरीर से उठती हुई सोंधी महक और उसके गरम सांसों का अहसास हुआ। अमित ने हिम्मत जुटाकर अपना हाथ रेखा की कमर पर रखा और धीरे से उसे अपनी ओर खींचा, रेखा ने कोई विरोध नहीं किया बल्कि अपना सिर अमित के कंधे पर रख दिया। अमित ने देखा कि रेखा के ब्लाउज के नीचे उसके मटर जैसे निप्पल अब साड़ी के कपड़े को चीरकर बाहर आने को बेताब थे, जो उसके चरम उत्तेजना का प्रमाण दे रहे थे। दोनों के बीच एक गहरा मौन था, लेकिन उनकी धड़कनें चीख-चीखकर अपनी इच्छाएं बयां कर रही थीं, अब झिझक का पर्दा धीरे-धीरे गिर रहा था और वासना का सैलाब उमड़ने को तैयार था।

अमित ने धीरे से रेखा के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके होठों का रसास्वादन करना शुरू किया, वह पल जैसे ठहर सा गया था। रेखा ने भी अपनी बाहें अमित के गले में डाल दीं और बड़े ही प्यार से उसके होठों को चूसने लगी, उनके बीच यह पहला शारीरिक संपर्क था जो बहुत ही भावुक और गहरा था। अमित का हाथ धीरे से रेखा के ब्लाउज के हुक पर गया और एक-एक करके उसने सारे हुक खोल दिए, जिससे उसके भारी और दूधिया तरबूज आजाद होकर बाहर आ गए। अमित ने उन तरबूजों को अपने हाथों में भरा और उन्हें धीरे-धीरे सहलाने लगा, जबकि रेखा की सिसकियां अब तेज होने लगी थीं। अमित ने अपने मुंह से उन तरबूजों के ऊपर लगे मटर को पकड़कर चूसना शुरू किया, तो रेखा ने कामुकता में भरकर अमित के बालों को कसकर पकड़ लिया और अपना पिछवाड़ा सोफे पर रगड़ने लगी।

रेखा की उत्तेजना अब सातवें आसमान पर थी, उसने अमित की पैंट की जिप खोली और उसके अंदर कैद विशाल खीरा को बाहर निकाल लिया। अमित का खीरा अब पूरी तरह से अकड़ चुका था और अपनी प्यास बुझाने के लिए तड़प रहा था, रेखा ने उसे अपने नाजुक हाथों में पकड़ा और उसकी लंबाई को महसूस किया। रेखा ने धीरे-धीरे अपना मुंह नीचे किया और अमित के खीरा को अपने मुंह में ले लिया, उसका खीरा चूसना इतना आनंददायक था कि अमित की आँखें फटने लगीं। रेखा की जीभ जब खीरा के ऊपरी हिस्से पर फिरती थी, तो अमित के पूरे शरीर में बिजली सी दौड़ जाती थी और वह रेखा के सिर को अपने हाथों से दबाकर उसे गहराई तक निगलने का इशारा करने लगा। कमरे में सिर्फ रेखा के चूसने की आवाज और अमित की भारी सांसें गूँज रही थीं, जो वातावरण को और भी ज्यादा कामुक बना रही थीं।

अमित अब और बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था, उसने रेखा को सोफे से उठाकर बिस्तर पर लेटा दिया और उसकी साड़ी और पेटीकोट को पूरी तरह से उतार फेंका। अब रेखा उसके सामने पूरी तरह से निर्वस्त्र थी, उसकी काली और घनी बाल वाली खाई अमित को अपनी ओर आमंत्रित कर रही थी। अमित ने रेखा की दोनों टांगों को फैलाया और अपनी जीभ को उसकी खाई की गहराई में डाल दिया, खाई चाटना शुरू करते ही रेखा बिस्तर पर तड़पने लगी। रेखा की खाई से अब प्राकृतिक रस निकलने लगा था जो अमित के मुंह के स्वाद को और भी बढ़ा रहा था, अमित ने अपनी उंगली से खोदना शुरू किया तो रेखा की चीखें निकलने लगीं। वह अपने हाथों से बिस्तर की चादर को मरोड़ रही थी और बार-बार अमित से कह रही थी कि अब उसे और तड़पाना बंद करे और अपना खीरा उसकी खाई में डाल दे।

अमित ने अपने भारी खीरा को रेखा की खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से धक्का दिया, रेखा के मुंह से एक लंबी आह निकली जब खीरा ने उसकी तंग खाई में प्रवेश किया। अमित ने सामने से खोदना (missionary) शुरू किया, हर धक्के के साथ रेखा के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके शरीर आपस में टकराकर पसीने से तर-बतर हो रहे थे। अमित की खुदाई की गति अब धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी, वह पूरी गहराई तक अपने खीरा को रेखा के अंदर उतार रहा था जिससे रेखा की आँखों में सुख के आंसू आ गए थे। कमरे में मांस के टकराने की ‘चप-चप’ आवाज गूँज रही थी और रेखा बार-बार अमित को कसकर गले लगा रही थी, जैसे वह उसे अपने अंदर ही समा लेना चाहती हो। अमित का हर वार रेखा की आत्मा तक पहुँच रहा था और वह सुख के उस सागर में डूबती जा रही थी जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

कुछ देर बाद अमित ने रेखा को घुमाया और उसे बिस्तर पर घुटनों के बल खड़ा कर दिया ताकि वह पिछवाड़े से खोदना (doggy style) शुरू कर सके। पीछे से जब अमित ने अपना खीरा रेखा की खाई में दोबारा डाला, तो रेखा ने अपना सिर तकिए में छुपा लिया ताकि उसकी आवाज बाहर न जाए। अमित का हाथ रेखा के उन भारी तरबूजों को पीछे से पकड़कर मसल रहा था और वह पूरी ताकत से अपना पिछवाड़ा अमित की ओर धकेल रही थी। यह स्थिति इतनी उत्तेजक थी कि अमित का नियंत्रण अब खोने लगा था, उसकी खुदाई की रफ्तार अब बेकाबू हो चुकी थी। रेखा भी अपने चरमोत्कर्ष के बेहद करीब थी, उसकी खाई अब अमित के खीरा को कसकर जकड़ रही थी और उसकी सांसें उखड़ रही थीं, वह बार-बार ‘और तेज, और जोर से’ के नारे लगा रही थी।

अंततः वह क्षण आ ही गया जब दोनों की उत्तेजना अपने शिखर पर पहुँच गई, अमित ने एक आखिरी जोरदार धक्का दिया और उसका खीरा रेखा की खाई के अंदर ही फटने लगा। रेखा का भी उसी समय रस निकलना शुरू हुआ और वह अमित के नीचे पूरी तरह से ढीली पड़ गई, उसका पूरा बदन कांप रहा था। अमित ने अपना पूरा रस रेखा की खाई की गहराई में भर दिया और उसके ऊपर ही लेट गया, दोनों के शरीर पसीने और काम-रस से भीगे हुए थे। काफी देर तक वे इसी तरह एक-दूसरे में लिपटे रहे, खामोशी में डूबे हुए, जहाँ सिर्फ उनकी थमी हुई सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। इस खुदाई ने न केवल उनकी शारीरिक प्यास बुझाई थी बल्कि उनके बीच के उस अनकहे रिश्ते को एक नई और गहरी पहचान दे दी थी, जिसे वे अब कभी भुला नहीं पाएंगे।

अगले एक घंटे तक दोनों बिस्तर पर वैसे ही पड़े रहे, रेखा का सिर अमित की चौड़ी छाती पर था और अमित उसके बालों को सहला रहा था। उनके मन की झिझक अब पूरी तरह खत्म हो चुकी थी, लेकिन एक मीठा सा अहसास और शर्म अभी भी बाकी थी जो उनके चेहरे पर मुस्कान ला रही थी। रेखा ने धीरे से अमित की आँखों में देखा और उसके माथे को चूम लिया, यह जताते हुए कि वह इस अनुभव से कितनी तृप्त है। अमित को भी अपनी माँ के साथ बिताए इन पलों पर कोई पछतावा नहीं था, बल्कि उसे एक अजीब सी शांति महसूस हो रही थी। धूप अब ढलने लगी थी और कमरा शाम की नारंगी रोशनी से भर गया था, लेकिन उन दोनों के लिए वक्त जैसे वहीं ठहर गया था, एक नए और गहरे भावनात्मक बंधन की शुरुआत करते हुए।

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