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कविता चाची की खुदाई

गर्मियों की वह एक बोझिल और सुनहरी दोपहर थी, जब समीर अपने पुश्तैनी शहर वापस लौटा था। घर के पिछवाड़े में बरसों पुराने बगीचे की कायापलट करने की तैयारी चल रही थी और वहाँ एक नए कुएं के लिए खुदाई का काम शुरू हो चुका था। कविता चाची, जो परिवार की सबसे शालीन और सुंदर महिला मानी जाती थीं, इस काम की पूरी देखरेख कर रही थीं। उन्होंने रेशम की एक पतली सी नीली साड़ी पहनी हुई थी, जो उनके सुडौल शरीर पर इस तरह लिपटी थी जैसे कोई बेल किसी पुराने वृक्ष के सहारे चढ़ रही हो। समीर ने जब उन्हें पहली बार देखा, तो उसकी साँसें जैसे रुक सी गईं; उनकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी और चेहरे पर समय की एक परिपक्व चमक, जो उन्हें किसी अप्सरा से कम नहीं बना रही थी। उनके माथे पर पसीने की नन्ही बूंदें चमक रही थीं, जो कड़ी धूप में उनके रूप को और भी अधिक निखार रही थीं।

कविता चाची का व्यक्तित्व जितना शांत था, उनकी शारीरिक संरचना उतनी ही आकर्षक और गरिमापूर्ण थी। जब वे मजदूरों को निर्देश देने के लिए झुकती थीं, तो उनकी साड़ी का पल्लू हवा के झोंके से थोड़ा खिसक जाता था, जिससे उनके गोरे और सुराहीदार गले की शोभा और बढ़ जाती थी। उनकी कमर का घेरा और चाल में एक ऐसी लचक थी जो समीर के मन में हलचल पैदा कर रही थी। समीर ने महसूस किया कि उनके शरीर से आने वाली चंदन और चमेली की हल्की खुशबू हवा में घुल रही है, जो उसे अपनी ओर खींच रही थी। वह दूर खड़ा बस उन्हें ही निहारता रहा, उनकी हर एक भंगिमा, हर एक मुस्कुराहट और उनकी गहरी आँखों की चमक ने समीर के दिल में एक अनजाना सा कंपन पैदा कर दिया था, जिसे वह चाहकर भी नजरअंदाज नहीं कर पा रहा था।

शाम ढलने लगी थी और खुदाई का काम उस दिन के लिए रुक गया था, लेकिन कविता चाची अब भी वहीं खड़ी मिट्टी के उस ढेर को देख रही थीं। समीर धीरे से उनके पास गया और बड़ी नरमी से बोला, “चाची, बहुत थक गई होंगी आप, चलिए अंदर चलकर थोड़ा आराम कर लीजिए।” कविता ने मुड़कर समीर की आँखों में देखा और एक मद्धम सी मुस्कान बिखेर दी, जिसमें ममता और एक छिपी हुई शरारत दोनों थी। उन्होंने कहा, “समीर, इस मिट्टी की खुशबू कितनी सोंधी है न? जैसे बरसों की प्यास बुझ रही हो।” उन दोनों के बीच की बातचीत मिट्टी, जड़ों और पुराने रिश्तों के इर्द-गिर्द घूमती रही, लेकिन उस संवाद के पीछे एक गहरी भावनात्मक लहर थी जो दोनों को एक-दूसरे के करीब ला रही थी। समीर को महसूस हुआ कि कविता चाची के मन में भी कहीं न कहीं एक अकेलापन है जो अब संवाद की शक्ल में बाहर आ रहा था।

अगले कुछ दिनों में उनके बीच आकर्षण का एक सूक्ष्म बीज पनपने लगा जो शब्दों से ज्यादा खामोशियों में पलता था। समीर अब अक्सर खुदाई की जगह पर उनके साथ घंटों बैठा रहता और उनकी बातों को सुनता रहता। एक दोपहर जब तेज धूप के कारण सब आराम कर रहे थे, वे दोनों बरामदे के एक ठंडे कोने में बैठे थे। कविता चाची ने अपनी साड़ी के पल्लू से चेहरे का पसीना पोंछा और समीर की तरफ देखते हुए कहा, “तुम्हारी आँखों में बहुत कुछ है समीर, जो तुम कह नहीं पाते।” समीर का दिल तेजी से धड़कने लगा और उसकी जुबान जैसे तालू से चिपक गई। उस पल हवा रुक गई थी और सिर्फ उन दोनों की साँसों की आवाज़ ही गूँज रही थी। समीर ने हिम्मत जुटाकर उनके हाथ की ओर अपना हाथ बढ़ाया, लेकिन समाज और रिश्ते की बेड़ियों ने उसे एक पल के लिए रोक दिया।

मन के भीतर एक भीषण संघर्ष चल रहा था—एक तरफ संस्कार और मर्यादा थी, तो दूसरी तरफ वह बेपनाह खिंचाव जो कविता चाची के प्रति बढ़ता ही जा रहा था। कविता भी इस कशमकश को महसूस कर रही थीं; उनकी नीची नजरें और कांपती हुई उंगलियाँ समीर के मन की उथल-पुथल को बखूबी समझ रही थीं। वे जानती थीं कि यह रास्ता मुश्किल है, लेकिन दिल की पुकार को अनसुना करना भी असंभव था। समीर ने देखा कि चाची के चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी है, जैसे वे भी किसी बंधन को तोड़कर आजाद होना चाहती हों। खामोशी का वह पल किसी सदी से लंबा लग रहा था, जहाँ धड़कनें एक-दूसरे के संगीत को समझने की कोशिश कर रही थीं। दोनों के बीच की दूरी अब महज कुछ इंच की थी, लेकिन वह फासला तय करना सबसे कठिन लग रहा था।

अचानक समीर का हाथ कविता चाची की हथेली पर जा टिक गया—वह पहला स्पर्श किसी बिजली के झटके की तरह था जिसने दोनों के अस्तित्व को झकझोर कर रख दिया। चाची ने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा, बल्कि उनकी उंगलियों ने समीर की उंगलियों को धीरे से थाम लिया। वह स्पर्श रेशम की तरह कोमल और आग की तरह गर्म था। समीर ने महसूस किया कि चाची की हथेलियां थोड़ी नमी लिए हुए थीं और उनमें एक हल्की सी थरथराहट थी। उस स्पर्श ने सारी बाधाएं तोड़ दीं और उनके बीच के डर को एक गहरे विश्वास में बदल दिया। समीर ने उनके हाथ को अपने होंठों के करीब लाया और धीरे से चूम लिया, जिससे कविता के पूरे शरीर में एक सुखद सिरहन दौड़ गई और उनकी आँखें धीरे से बंद हो गईं।

धीरे-धीरे यह निकटता और बढ़ने लगी, अब बातें कम और छुअन ज्यादा होने लगी थी। वे दोनों अक्सर ऐसी जगहों पर मिलते जहाँ दुनिया की नजरों से दूर वे एक-दूसरे के साथ को महसूस कर सकें। समीर जब उनके कंधों पर हाथ रखता, तो कविता चाची का शरीर एक अजीब सी नरमी के साथ पिघलने लगता। एक रात, जब पूरा घर गहरी नींद में सोया था और बाहर बारिश की बूंदें मिट्टी की खुदाई वाली जगह को गीला कर रही थीं, समीर और कविता एक साथ बैठे थे। समीर ने उनके चेहरे के पास आकर उनकी साँसों की गर्माहट को महसूस किया। कविता ने अपनी गर्दन टेढ़ी कर समीर को रास्ता दिया और जब समीर के होंठ उनकी गर्दन के पास पहुँचे, तो एक दबी हुई आह कविता के हलक से निकली जिसने रात के सन्नाटे को और भी ज्यादा मदहोश कर दिया।

उस रात घनिष्ठता ने अपनी पराकाष्ठा को छू लिया था, जहाँ रूह और जिस्म के बीच की दूरी खत्म हो गई थी। समीर के हाथ जब कविता की कमर के घेरे को सहला रहे थे, तो उन्हें महसूस हुआ कि वह हिस्सा कितना संवेदनशील और कोमल है। कविता की साँसें अब तेज हो चुकी थीं और उनका पसीना समीर की त्वचा पर मिल रहा था। हर स्पर्श के साथ एक नई कंपकंपी और एक नया एहसास जाग रहा था। समीर ने उनके कानों के पास जाकर कुछ धीमे शब्द कहे, जिनसे कविता का चेहरा शर्म से लाल हो गया और उन्होंने अपना चेहरा समीर के सीने में छुपा लिया। वहां कोई अश्लीलता नहीं थी, बस दो तड़पते हुए मन थे जो एक-दूसरे की बाहों में सुकून तलाश रहे थे। उनके अंगों का मिलन किसी पवित्र संगीत की तरह लयबद्ध था।

प्यार की उस गहरी प्रक्रिया में वे दोनों समय और स्थान को भूल चुके थे। समीर ने उनके बदन के हर उतार-चढ़ाव को बड़ी कोमलता और सम्मान के साथ सराहा। हर आह और हर कराह में एक सुखद दर्द और अनंत तृप्ति छिपी हुई थी। कविता चाची ने समीर को अपनी बाहों में इतनी मजबूती से जकड़ रखा था जैसे वे उसे कभी खोना नहीं चाहतीं। उस अंधेरे कमरे में उनकी धड़कनें एक-दूसरे का पता बता रही थीं और पसीने की बूंदें उनके मिलन की गवाह बन रही थीं। समीर ने उनके माथे को चूमते हुए उस पल को हमेशा के लिए अपने भीतर संजो लिया। वह मिलन सिर्फ दो शरीरों का नहीं, बल्कि दो ऐसी आत्माओं का था जो बरसों से एक-दूसरे के स्पर्श के लिए तरस रही थीं।

जब वह तूफान थमा, तो चारों ओर एक असीम शांति छा गई। समीर कविता की गोद में सिर रखकर लेटा हुआ था और कविता उसकी जुल्फों में अपनी उंगलियाँ फिरा रही थीं। उनकी आँखों में अब एक अलग ही चमक थी—एक ऐसी तृप्ति जो उन्होंने पहले कभी महसूस नहीं की थी। समीर ने ऊपर देखते हुए कहा, “चाची, क्या यह गलत है?” कविता ने धीमे से मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “जहाँ इतना समर्पण और पवित्रता हो, वहाँ कुछ भी गलत नहीं होता समीर। मिट्टी की खुदाई के बाद ही तो असली रत्न बाहर आते हैं, वैसे ही आज हमारे मन की परतों की खुदाई हुई है।” वे दोनों जानते थे कि यह रिश्ता समाज की नजरों में भले ही कुछ भी हो, लेकिन उनके लिए यह जीवन का सबसे खूबसूरत और गहरा सच बन चुका था।

उस रात के बाद समीर और कविता के बीच का बंधन और भी ज्यादा अटूट हो गया। अब उनकी आँखों में एक-दूसरे के लिए एक मूक सहमति थी जिसे किसी शब्द की जरूरत नहीं थी। कविता चाची के चेहरे पर अब एक नई रौनक रहने लगी थी, जो केवल सच्चे प्रेम और संतुष्टि से ही आती है। समीर ने सीखा कि प्यार केवल जिस्मानी चाहत नहीं, बल्कि एक-दूसरे के अस्तित्व को गहराई से स्वीकार करने का नाम है। वे अब भी उसी खुदाई वाली जगह पर बैठते थे, लेकिन अब उस मिट्टी की महक उन्हें उनके मिलन की याद दिलाती थी। वह प्रेम जो धीरे-धीरे अंकुरित हुआ था, अब एक विशाल वृक्ष की तरह उनके जीवन को छाया और सुकून प्रदान कर रहा था, जिसमें हर सांस एक कविता की तरह सुंदर थी।

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