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कविता अजनबी टेलर की चु@@ई

कविता अजनबी टेलर की चु@@ई—>मई की उस तपती दोपहर में शहर की गलियां जैसे आग उगल रही थीं, लेकिन शहर के सबसे मशहूर बुटीक ‘रेशम स्पर्श’ के अंदर एयरकंडीशनर की ठंडी हवा एक अलग ही सुकून दे रही थी। कविता, जो लगभग अड़तीस साल की एक बेहद आकर्षक महिला थी, अपने हाथ में एक मखमली रेशमी कपड़े का थान लिए काउंटर पर खड़ी थी। उसके चेहरे पर हल्की सी थकावट थी, लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी जो किसी को भी अपनी ओर खींचने के लिए काफी थी। बुटीक का मालिक और मुख्य टेलर, सलीम, अपनी मेज पर बैठा कुछ स्केच बना रहा था, लेकिन जैसे ही कविता की पायल की छनछन उसके कानों में पड़ी, उसने अपनी नजरें उठाईं और देखता ही रह गया।

कविता के शरीर की बनावट किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी, उसकी साड़ी के पतले पल्लू से झांकते उसके भारी और सुडौल तरबूज किसी का भी मन डोलने के लिए काफी थे। साड़ी के ब्लाउज के नीचे से दिखती उसकी गोरी कमर और उस पर पड़ा एक छोटा सा काला तिल सलीम की धड़कनों को बढ़ा रहा था। कविता जब चलती थी, तो उसके पिछवाड़े की मटक सलीम की आंखों को जैसे बांध लेती थी। सलीम ने कई महिलाओं के नाप लिए थे, लेकिन कविता के शरीर में जो एक परिपक्वता और उभार था, वैसा उसने पहले कभी नहीं देखा था। उसने मन ही मन सोचा कि आज की ये मुलाकात महज एक व्यापारिक मुलाकात नहीं रहने वाली है, क्योंकि कविता की नजरों में भी एक किस्म की प्यास साफ झलक रही थी।

सलीम ने बड़े ही अदब से कविता को नाप देने के लिए अंदर के केबिन में बुलाया, जहाँ केवल एक बड़ा सा शीशा और नाप लेने के फीते रखे थे। केबिन के अंदर की रोशनी थोड़ी मद्धम थी, जिससे माहौल और भी गहरा और संजीदा हो गया था। जैसे ही सलीम ने कविता के कंधे पर फीता रखा, कविता के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई। सलीम के हाथों की छुअन में एक अजीब सी गर्मी थी, जो कविता के रेशमी बदन को पार कर उसके मन तक पहुँच रही थी। जब सलीम उसके तरबूजों का घेरा नापने के लिए फीता आगे लाया, तो उसकी उंगलियां गलती से कविता के उभरे हुए मटर से टकरा गईं। उस एक पल के स्पर्श ने दोनों के बीच की झिझक की दीवार को जैसे गिरा दिया था, और कमरे की हवा भारी होने लगी थी।

सलीम धीरे से फुसफुसाया, “मैम, आपका फिगर वाकई बहुत लाजवाब है, इस सूट में आप कहर ढाएंगी।” कविता ने अपनी नीची नजरें उठाईं और सलीम की आंखों में झांका, जहाँ उसके लिए साफ तौर पर हवस और प्रशंसा का मिश्रण था। उसने धीरे से कहा, “सिर्फ सूट ही नहीं सलीम, पहनने वाली की कद्र करने वाला भी चाहिए।” यह बात कहते हुए कविता ने जानबूझकर अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा और खिसका दिया, जिससे उसके गोरे और विशाल तरबूज अब और भी ज्यादा नुमाया हो रहे थे। सलीम का संयम अब जवाब देने लगा था, उसके नीचे की पतलून में उसका खीरा अब अपनी जगह बनाने के लिए छटपटाने लगा था, और उसकी सांसें तेज चलने लगी थीं।

दोनों के बीच बढ़ती इस कामुकता ने अब शब्दों की जगह स्पर्श का सहारा लेना शुरू कर दिया था। सलीम ने धीरे से अपना हाथ कविता की कमर पर रखा और उसे अपनी ओर खींचा, जिससे उसका शरीर सलीम के मजबूत सीने से जा टकराया। कविता ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और सलीम की गर्दन में अपना चेहरा छुपा लिया। सलीम के हाथ अब कविता के पिछवाड़े पर थे, जहाँ वह उन्हें धीरे-धीरे सहला रहा था। कविता के मुंह से एक दबी हुई कराह निकली, जब सलीम ने उसके एक तरबूज को अपनी मुट्ठी में दबाया। वह अहसास इतना तीव्र था कि कविता के बदन का हर रोम-रोम खड़ा हो गया और उसके अंदर की दबी हुई इच्छाएं अब बाहर आने को बेताब थीं।

सलीम ने कविता को धीरे से ट्रायल रूम के सोफे पर लेटा दिया और उसकी साड़ी के बंधनों को एक-एक कर खोलने लगा। जैसे ही साड़ी और ब्लाउज शरीर से अलग हुए, कविता का दूध जैसा सफेद बदन सलीम की आंखों के सामने था। उसके तरबूज इतने बड़े और गोल थे कि सलीम उन्हें अपनी दोनों हथेलियों में भी नहीं समा पा रहा था। सलीम ने झुककर कविता के मटर को अपने होंठों में ले लिया और उसे धीरे-धीरे चूसने लगा। कविता की कमर धनुष की तरह मुड़ गई और वह सलीम के बालों में अपनी उंगलियां फंसाकर उसे और करीब खींचने लगी। उस छोटे से कमरे में अब सिर्फ उनकी भारी सांसों और गीले स्पर्श की आवाजें गूंज रही थीं, जो माहौल को और भी उत्तेजक बना रही थीं।

सलीम ने अब अपना ध्यान कविता की नीचे की खाई की ओर लगाया, जहाँ रेशमी पेटीकोट अभी भी बाधा बना हुआ था। उसने झटके से उसे भी उतार फेंका और कविता के पैरों के बीच की उस गहरी और नम खाई को देखने लगा। वहाँ के बाल करीने से साफ किए हुए थे, जिससे वह जगह और भी कोमल लग रही थी। सलीम ने अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया, तो कविता के पैर कांपने लगे। वह जोर-जोर से सलीम का नाम पुकारने लगी, “ओह सलीम… हाँ… वहीं… और तेज… मैं मर जाऊंगी!” सलीम की जीभ का जादू कविता को पागल कर रहा था, और उसकी खाई से अब धीरे-धीरे रस रिसने लगा था, जो उसकी चरम उत्तेजना का प्रमाण था।

अब सलीम से और इंतजार नहीं हो रहा था, उसने अपनी पतलून उतारी और अपना फन उठाता हुआ साढ़े सात इंच का खीरा बाहर निकाला। कविता ने जब उस विशाल और फौलादी खीरे को देखा, तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई। उसने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उस गर्म खीरे को अपनी मुट्ठी में भर लिया। वह उसे सहलाते हुए बोली, “इतना बड़ा… सलीम, क्या यह मेरी छोटी सी खाई में समा पाएगा?” सलीम ने मुस्कुराते हुए उसके माथे को चूमा और कहा, “तुम्हारी खाई की गहराई और मेरा खीरा एक-दूसरे के लिए ही बने हैं कविता, बस तुम आज इस खुदाई का आनंद लो।” सलीम ने खीरे के ऊपरी हिस्से पर अपना थूक लगाया और उसे कविता की खाई के मुहाने पर टिका दिया।

जैसे ही सलीम ने धीरे से दबाव बनाया, खीरे का मुंडा कविता की तंग खाई में दाखिल हुआ। कविता के मुंह से एक दर्द और सुख की मिली-जुली चीख निकली और उसने सलीम के कंधों को अपने नाखूनों से जकड़ लिया। सलीम रुक गया और उसे सहज होने का समय दिया, वह उसके तरबूजों को सहलाता रहा और उसके मटर को उंगलियों से मसलता रहा। जब कविता थोड़ी शांत हुई, तो उसने खुद अपनी कमर ऊपर उठाई, इशारा दिया कि वह अब पूरी खुदाई के लिए तैयार है। सलीम ने एक जोरदार धक्का दिया और उसका पूरा खीरा जड़ तक कविता की गहराई में समा गया। उस पल ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया थम गई हो, और उन दोनों के बीच सिर्फ मांस से मांस के टकराने की आवाज रह गई थी।

सलीम ने अब अपनी गति बढ़ानी शुरू की, वह पूरी ताकत से कविता को खोदना शुरू कर चुका था। हर धक्के के साथ कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उसकी चूड़ियों की खनक कमरे में संगीत पैदा कर रही थी। सलीम ने उसे घुमाया और पिछवाड़े से खोदने के अंदाज में कर दिया। पीछे से देखते हुए कविता के पिछवाड़े की गोलाई और उसके बीच में जाती सलीम के खीरे की हरकत किसी जन्नत के नजारे से कम नहीं थी। कविता ने अपने दोनों हाथ सोफे पर टिका दिए और जोर-जोर से आहें भरने लगी। सलीम अब बेतहाशा तरीके से खुदाई कर रहा था, उसका हर प्रहार कविता के गर्भाशय तक महसूस हो रहा था, जिससे वह पूरी तरह बेसुध होती जा रही थी।

दोनों का शरीर पसीने से तरबतर हो चुका था और कमरे में एक अजीब सी सोंधी खुशबू फैल गई थी। सलीम ने कविता को फिर से सीधा किया और उसे सामने से खोदना शुरू किया। उसने कविता के पैरों को अपने कंधों पर रख लिया ताकि वह और भी गहराई तक पहुँच सके। कविता अब अपने चरम के करीब थी, उसका पूरा बदन थरथराने लगा था और उसकी खाई के अंदर की मांसपेशियां सलीम के खीरे को कसकर जकड़ रही थीं। वह चिल्लाई, “सलीम… मैं निकलने वाली हूँ… और तेज… हाँ… छोड़ना मत!” सलीम ने भी अपनी गति को चरम पर पहुँचा दिया और कुछ ही लम्हों बाद, एक जोरदार झटके के साथ कविता का रस छूट गया और वह सलीम की बाहों में ढीली पड़ गई।

कविता के रस छूटने के कुछ ही सेकंड बाद, सलीम ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी और उसका खीरा भी अपना सारा गर्म लावा कविता की गहराई में छोड़ने लगा। वह अहसास इतना सुखद और राहत देने वाला था कि दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए सोफे पर ही गिर पड़े। कई मिनटों तक कोई कुछ नहीं बोला, सिर्फ उनकी धड़कनों की रफ्तार धीरे-धीरे सामान्य हो रही थी। सलीम ने कविता के पसीने से भीगे चेहरे को सहलाया और उसके होंठों पर एक प्यार भरा स्पर्श दिया। कविता के चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि और सुकून था, जो शायद उसे अपनी नीरस शादीशुदा जिंदगी में कभी नहीं मिला था।

सलीम ने धीरे से अपना खीरा बाहर निकाला, जो अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ था, और कविता की खाई से बहते हुए सफेद रस को अपनी उंगली से साफ किया। कविता ने धीरे से अपनी साड़ी समेटी और सलीम की ओर देखते हुए मुस्कुराई। उसने कहा, “आज तुमने मुझे वह महसूस कराया है जो मैं सालों से भूल चुकी थी, सलीम। तुम्हारी इस खुदाई का नशा शायद अब कभी नहीं उतरेगा।” सलीम ने उसे गले लगा लिया और वादा किया कि यह सिलसिला अब रुकने वाला नहीं है। वह बुटीक अब उनके गुप्त प्रेम का गवाह बन चुका था, जहाँ हर नए सूट के नाप के बहाने एक नई और जोशभरी खुदाई की दास्तान लिखी जानी थी।

कविता जब बुटीक से बाहर निकली, तो उसकी चाल में एक नई खनक थी और उसके चेहरे का नूर बता रहा था कि वह एक अधूरी औरत से अब एक संतुष्ट नायिका बन चुकी थी। धूप अभी भी तेज थी, लेकिन अब उसे वह धूप चुभ नहीं रही थी, बल्कि वह सलीम के उस गर्म खीरे की याद दिला रही थी जिसने उसकी रूह तक को तृप्त कर दिया था। उसने पीछे मुड़कर एक बार बुटीक के बोर्ड को देखा और मन ही मन तय कर लिया कि अब उसके हर लिबास की सिलाई सिर्फ सलीम के हाथों ही होगी, क्योंकि वह जानती थी कि सलीम सिर्फ कपड़े ही नहीं सिलता, बल्कि दबी हुई इच्छाओं को हकीकत में बदलना भी बखूबी जानता था।

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