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कॉटेज में निशा की चु@@ई

पहाड़ों पर घना कोहरा छाया हुआ था और आसमान से लगातार तेज बारिश बरस रही थी, जिससे पूरा हिमाचल का यह छोटा सा रिसॉर्ट एक जादुई लेकिन सुनसान जगह लग रहा था। लकड़ी की बनी कॉटेजों के बीच निशा अपनी कॉटेज की खिड़की के पास खड़ी बारिश की बूंदों को देख रही थी। निशा की उम्र छब्बीस साल थी, उसका शरीर जवानी की चरम सुंदरता से भरा हुआ था – भरे-भरे तरबूज जो ब्लाउज में भी अपनी मौजूदगी जताते थे, घुमावदार कमर और नाजुक लेकिन आकर्षक कूल्हे। उसके पति दिल्ली में अचानक आए जरूरी काम से फंस गए थे और अगले कई दिनों तक नहीं आ पाने वाले थे। निशा इस ट्रिप पर पति के साथ घूमने आई थी लेकिन अब अकेलापन उसे अंदर से घेर रहा था। ठंडी हवा कॉटेज में घुस रही थी, बारिश की आवाज उसके कान में गूंज रही थी और शरीर में एक अनकही बेचैनी जाग रही थी जिसे वह दबाने की कोशिश कर रही थी। फायरप्लेस में लकड़ियां जल रही थीं, उनकी लपटें कमरे को हल्की गर्माहट दे रही थीं लेकिन निशा के मन और शरीर की आग को शांत नहीं कर पा रही थीं। वह सोच रही थी कि अगर पति साथ होते तो यह शाम कितनी अलग होती, लेकिन अब हर पल अकेलेपन की याद दिला रहा था।

तभी कॉटेज के दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई। निशा ने दरवाजा खोला तो सामने आर्यन खड़ा था, जो उसके पति का सबसे करीबी दोस्त था और संयोग से इसी रिसॉर्ट में कुछ काम से ठहरा हुआ था। आर्यन की उम्र अट्ठाईस साल थी, लंबा कद, मजबूत कद-काठी, आकर्षक चेहरा और वह मुस्कान जो किसी भी दिल को पिघला सकती थी। उसने निशा को देखते ही कहा कि बारिश इतनी तेज है और तुम अकेली हो, सोचा चलकर देख आऊं कि सब ठीक तो है। निशा ने राहत की सांस ली और उसे अंदर बुला लिया। दोनों फायरप्लेस के सामने आरामदायक सोफे पर बैठ गए। आर्यन ने खुद दो कप गर्म कॉफी बनाई और निशा को थमा दी। उनकी बातें शुरू हुईं – पहले मौसम की, फिर काम की, लेकिन धीरे-धीरे बहुत गहरी होती चली गईं। निशा ने अपनी उदासी बताई, पति के दूर होने से होने वाली रातों की बेचैनी, अकेलेपन का बोझ। आर्यन ने बहुत धैर्य से सुना, उसकी आंखों में समझ और सहानुभूति थी। वह बोला कि कभी-कभी जीवन ऐसे पल लाता है जहां सिर्फ एक सच्चा साथी ही सब बदल सकता है। निशा को उसकी बातों में एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव महसूस हो रहा था, जैसे कोई पुराना घाव धीरे-धीरे भर रहा हो। कमरे में फायरप्लेस की लपटें नाच रही थीं और बारिश की आवाज उन्हें पूरी दुनिया से अलग कर रही थी।

आकर्षण अब उनके बीच हवा में तैरने लगा था। आर्यन की मजबूत बांहें और उसकी गर्म सांसें निशा को करीब खींच रही थीं। निशा ने शर्माते हुए आर्यन की ओर देखा और उसकी उंगली हल्के से छू ली। आर्यन ने मुस्कुराकर निशा का हाथ थाम लिया और धीरे से अपनी ओर खींचा। अब उनके चेहरों के बीच सिर्फ सांसों की दूरी थी। आर्यन ने बहुत धीरे-धीरे निशा के गाल पर संतरा चूसना शुरू किया, फिर होंठों तक पहुंच गया। निशा की सांसें रुकने लगीं, वह पूरी तरह उस पल में खो गई। संतरा चूसना गहरा, भावुक और लंबा होता गया, उनकी सांसें एक-दूसरे में घुलती चली गईं। निशा के शरीर में सिहरन दौड़ गई, उसके तरबूज फूल उठे थे और ब्लाउज के अंदर मटर कड़े होकर बाहर आने को बेताब थे। आर्यन के हाथ धीरे-धीरे निशा की पीठ पर फिसले और तरबूजों को बाहर से नरमी से सहलाने लगे। निशा आह भर उठी लेकिन शर्म से आंखें बंद कर लीं। मन में द्वंद्व चल रहा था – पति की याद आ रही थी, यह गलत है, लेकिन आर्यन की गर्मी और इच्छा की लहर इतनी तेज थी कि वह खुद को रोक नहीं पा रही थी। बारिश की बूंदें खिड़की से टकरा रही थीं और फायरप्लेस की गर्मी उनके शरीरों को और भी संवेदनशील बना रही थी।

झिझक अब निशा के अंदर तूफान की तरह उठ रही थी। वह बार-बार सोच रही थी कि अगर पति को पता चल गया तो क्या होगा, समाज क्या कहेगा, लेकिन आर्यन की आंखों में छिपी नरमी और इच्छा उसे रोक रही थी। आर्यन ने निशा को धीरे से उठाकर बेड की तरफ ले गया और उसे लिटा दिया। उसने निशा के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। निशा ने कमजोर विरोध किया, “आर्यन, यह ठीक नहीं…” लेकिन उसकी आवाज में इच्छा साफ झलक रही थी। आर्यन ने कहा कि यहां सिर्फ हम हैं, बारिश हमें पूरी तरह छिपाए हुए है। निशा के तरबूज बाहर आ गए, उनके मटर अब पूरी तरह कड़े और संवेदनशील हो चुके थे। आर्यन ने पहले उंगलियों से मटर को घुमाया, फिर मुंह से संतरा चूसना शुरू किया। निशा की पीठ घुमड़ने लगी, वह जोर से कराह उठी, “अहह… आर्यन… बहुत अच्छा लग रहा है…” पसीना उसकी गर्दन से बहकर तरबूजों पर गिर रहा था। मन में शर्म थी लेकिन शरीर खुशी से लहरा रहा था। निशा सोच रही थी कि यह पल कितना खतरनाक लेकिन कितना मीठा और जरूरी है, जैसे वर्षों की प्यास बुझ रही हो।

पहला स्पर्श अब गहराई में उतर चुका था। आर्यन ने निशा की साड़ी धीरे-धीरे ऊपर सरकाई और उसकी खाई को देखा जो पहले से ही गीली और तैयार थी। उसने उंगली से खाई में बहुत धीरे प्रवेश किया और खाई को उंगली से खोदने लगा। निशा की आंखें बंद हो गईं, वह सांस रोककर आहें भरने लगी। आर्यन की उंगली अंदर-बाहर होती रही, खाई के हर हिस्से को छूती रही। फिर आर्यन ने सिर झुकाया और खाई चाटना शुरू किया, अपनी जीभ से खाई को पूरी तरह सहलाने लगा। निशा का शरीर लहराने लगा, उसकी उंगलियां आर्यन के बालों में फंस गईं और वह जोर-जोर से कराहने लगी। पसीना उनके शरीरों को चिपका रहा था, लकड़ी की कॉटेज की खुशबू उनके पसीने से मिल रही थी। निशा को लग रहा था जैसे उसका सारा अस्तित्व इस सुख में घुल गया हो, लेकिन शर्म का एक छोटा कोना अभी भी था जो याद दिला रहा था कि यह गुप्त है। आर्यन ने अपना खीरा बाहर निकाला, जो कड़ा और पूरी तरह तैयार था। निशा ने शर्माते हुए उसे देखा और फिर हल्के हाथ से छू लिया, उसकी उंगलियां खीरे को नाप रही थीं।

धीरे-धीरे तीव्रता बढ़ने लगी। निशा ने आर्यन का खीरा मुंह में लेना शुरू किया, खीरा चूसना कर रही थी, अपनी जीभ को खीरे के चारों ओर घुमाती हुई। आर्यन कराह उठा, उसकी सांसें तेज हो गईं और वह निशा के बालों को प्यार से सहला रहा था। निशा की जीभ खीरे पर कुशलता से नाच रही थी, उसे पूरी तरह चूस रही थी। आर्यन की उंगलियां निशा के तरबूजों को दबा रही थीं, मटर को निचोड़ रही थीं। फिर आर्यन ने निशा को सामने से खोदना शुरू किया, अपना खीरा बहुत धीरे लेकिन गहराई से खाई में डाला। निशा चीख उठी लेकिन खुशी की चीख थी, “अहह… पूरी तरह भर गया आर्यन…” आर्यन धीरे-धीरे गति बढ़ा रहा था, हर थरकन के साथ निशा का शरीर कंप रहा था। वे दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए थे, पसीने से तर, सांसें मिली हुईं। बारिश की आवाज उनके कराहों को छुपा रही थी और फायरप्लेस की लपटें उनके चेहरों पर नाच रही थीं। निशा के मन में अब सिर्फ सुख था, शर्म पीछे छूट चुकी थी।

वे पूरी तरह खुदाई में लीन हो चुके थे। आर्यन की गति अब और तेज होती जा रही थी, निशा की खाई खीरे को पूरी तरह समो रही थी। निशा की आहें कॉटेज में गूंज रही थीं, “हां आर्यन… और गहरा… और जोर से…” आर्यन पसीने से लथपथ था, उसकी हर मांसपेशी काम कर रही थी। निशा का शरीर तन गया, वह रस निकलने के बहुत करीब थी। ठीक उसी पल अचानक पूरे रिसॉर्ट की बिजली चली गई। भारी बारिश की वजह से पावर कट हो गया था। कॉटेज अंधेरे में डूब गई, सिर्फ फायरप्लेस की लालिमा रह गई थी। निशा और आर्यन अभी भी एक-दूसरे में लिपटे थे। तभी दरवाजे पर जोरदार दस्तक हुई, “मैडम, सब ठीक है ना? जनरेटर चेक करने आया हूं, बाहर तूफान बहुत तेज है।” आवाज विक्रम की थी – रिसॉर्ट का मुख्य केयरटेकर। विक्रम की उम्र पैंतीस साल थी, शरीर लोहे जैसा हट्टा-कट्टा, चौड़ी छाती, मोटी भुजाएं और पसीने से चमकता चेहरा।

निशा शर्म से मर गई, उसने चादर से तरबूज ढक लिए और खाई पर चादर खींच ली। आर्यन जल्दी से अलग हुआ लेकिन खीरा अभी भी खड़ा था। विक्रम ने दरवाजा खोलकर अंदर आ ही चुका था, हाथ में लालटेन लिए हुए। उसने पूरा सीन देख लिया। निशा की आंखों में आंसू आ गए, वह गिड़गिड़ाई, “विक्रम जी, प्लीज किसी को मत बताना…” लेकिन विक्रम की नजर निशा के खुले तरबूजों और गीली खाई पर अटकी हुई थी। वह बोला, “मैडम, मैं कई दिनों से आपको देखता आ रहा हूं, आपकी खूबसूरती, आपका शरीर… मुझे पागल कर देता है। बारिश में मैं भी फंस गया हूं। अगर आप चाहें तो मैं चुप रहूंगा, लेकिन…” निशा का मन फिर संघर्ष में पड़ गया, डर, शर्म, लेकिन विक्रम के मजबूत शरीर को देखकर उसकी खाई में फिर से गर्म लहर दौड़ गई। आर्यन ने भी निशा की ओर देखा और हल्के से सिर हिला दिया। अब तीनों एक साथ थे।

विक्रम ने लालटेन को एक कोने में रखा और निशा के पास आ गया। उसने निशा को खींचकर अपने सीने से लगा लिया। निशा ने हल्का विरोध किया लेकिन विक्रम की ताकत के आगे वह पिघल गई। विक्रम ने निशा के होंठों पर गहरा संतरा चूसना शुरू किया, उसकी जीभ निशा के मुंह में घुस गई। निशा की सांसें फिर तेज हो गईं, वह विक्रम के मजबूत शरीर से चिपक गई। विक्रम के बड़े हाथ निशा के तरबूजों पर गए, उन्हें जोर से दबाया, मटर को उंगलियों से मसलने लगा। निशा कराह उठी, “अहह विक्रम… धीरे…” विक्रम ने निशा को बेड पर लिटाया और उसकी खाई को उंगली से खोदना शुरू किया, लेकिन इस बार उंगलियां ज्यादा मजबूत और अनुभवी थीं। निशा का शरीर फिर लहराने लगा। आर्यन भी पास आ गया और निशा के तरबूजों को चूसने लगा।

विक्रम ने अपना खीरा निकाला, जो आर्यन से भी बड़ा, मोटा और कड़ा था। निशा ने देखा और शर्म से आंखें फेर लीं लेकिन उसका हाथ खुद बढ़ गया और खीरे को पकड़ लिया। विक्रम ने निशा को पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, अपना खीरा धीरे लेकिन गहराई से पिछवाड़े में डाला। निशा जोर से चीख उठी, “ओह… इतना मोटा… पूरा भर गया…” विक्रम की गति धीमी लेकिन ताकतवर थी, हर धक्के से निशा का पूरा शरीर हिल जाता था। आर्यन सामने से खाई में अपना खीरा डाल रहा था। दोनों पुरुष निशा को बीच में लेकर उसे पूरी तरह भर रहे थे। निशा की आहें बढ़ गईं, वह दोनों की पीठ पर नाखून गड़ा रही थी। वे तीनों पूरी तरह लीन हो चुके थे, बारिश की आवाज उनके कराहों को छुपा रही थी। निशा का मन अब शर्म और इच्छा के बीच संतुलन बना रहा था, लेकिन सुख इतना गहरा था कि वह सब भूल गई।

तीव्रता अब चरम पर पहुंच चुकी थी। विक्रम की गति तेज होती गई, निशा का पिछवाड़ा और खाई दोनों बार-बार सिकुड़ रहे थे। निशा का पहला रस निकला, वह चीख उठी, “अहह… रस निकल रहा है…” लेकिन दोनों रुके नहीं। निशा का दूसरा रस भी निकला, उसका शरीर थरथरा रहा था। आर्यन और विक्रम भी अब रस निकलने के करीब थे, उनकी सांसें जानवरों जैसी तेज थीं। अंत में तीनों का रस लगभग एक साथ निकला – आर्यन का गर्म रस खाई में और विक्रम का पिछवाड़े में भर गया। वे तीनों थककर एक-दूसरे से लिपटे पड़े रहे। पसीना, बारिश की ठंडक और सुख का मिश्रण उनके शरीरों पर चिपका हुआ था। निशा के मन में अब गहरी शांति थी, शर्म के साथ पूरा संतोष भी। विक्रम और आर्यन ने उसके कान में फुसफुसाया कि यह रात और यह रहस्य सिर्फ हमारे बीच रहेगा।

निशा धीरे-धीरे उठी, अपनी साड़ी ठीक की, तरबूज ढके और दोनों की ओर देखा। बारिश अब थम चुकी थी लेकिन कोहरा अभी भी घना था। आर्यन और विक्रम ने उसे एक आखिरी संतरा चूसना दिया और कहा कि कल फिर मिलेंगे। निशा ने हामी भरी, मन में अब कोई पछतावा नहीं था, सिर्फ एक नई आजादी और खुशी थी। वह कॉटेज की खिड़की के पास आई और बाहर की शांत वादियों को देखा। उसकी चाल अब पहले से ज्यादा आत्मविश्वास भरी थी। यह रात निशा के जीवन की सबसे यादगार और सेंसुअल रात बन गई थी, जहां अकेलापन नहीं, बल्कि दो मजबूत साथियों ने उसे पूरी तरह संतुष्ट कर दिया था। पहाड़ों की ठंडी हवा अब उसे गर्म लग रही थी।

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