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पड़ोसन मीरा भाभी के साथ रसोई में यादगार रात की खुदाई

रात के ग्यारह बज चुके थे और पूरी कॉलोनी में सन्नाटा पसरा हुआ था, तभी राहुल के फोन की घंटी बजी। दूसरी तरफ उसकी खूबसूरत पड़ोसन मीरा भाभी थीं, जिनका पति शहर से बाहर गया हुआ था। मीरा की आवाज़ में एक अजीब सी घबराहट और सिहरन थी, उन्होंने कहा कि उनके किचन का पाइप अचानक फट गया है और पानी सब जगह फैल रहा है। राहुल ने तुरंत अपनी शर्ट के बटन बंद किए और उनकी मदद के लिए उनके घर की ओर दौड़ पड़ा, लेकिन उसे क्या पता था कि आज की रात कुछ और ही होने वाला है।

जब राहुल मीरा भाभी के घर पहुँचा, तो उन्होंने दरवाज़ा खोला। वह सफेद रंग की पतली शिफॉन की साड़ी में थीं, जो पानी की छींटों की वजह से उनके बदन से चिपक गई थी। उनके शरीर की बनावट देख राहुल की धड़कनें तेज़ हो गई; उनके दो विशाल और रसीले तरबूज साड़ी के पतले कपड़े से झांक रहे थे। उनका भारी और गजब का पिछवाड़ा चलते समय जिस तरह हिल रहा था, उसने राहुल के मन में हलचल पैदा कर दी। मीरा भाभी की आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जो डर से ज़्यादा आमंत्रण लग रही थी।

किचन में पहुँचते ही राहुल पाइप ठीक करने के लिए नीचे झुका, लेकिन उसका ध्यान बार-बार मीरा भाभी की सुडौल जांघों और उनके पिछवाड़े पर जा रहा था। जब पाइप ठीक हो गया, तो वह खड़ा हुआ और उसने देखा कि मीरा बिल्कुल उसके पास खड़ी थीं। उनके शरीर से उठने वाली भीनी-भीनी खुशबू राहुल के दिमाग पर छाने लगी थी। दोनों की नज़रें मिलीं और कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया; राहुल को महसूस हुआ कि मीरा भाभी भी इसी पल का इंतज़ार कर रही थीं क्योंकि उनकी साँसें भारी हो गई थीं।

राहुल ने हिम्मत जुटाकर मीरा की पतली कमर पर हाथ रखा, तो उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी आह भरी। राहुल ने धीरे से उनके तरबूजों को सहलाया। नाइटी के भीगने से चिपके कपड़े के ऊपर से ही वह महसूस कर सकता था कि मटर कितने सख्त और उभरे हुए हैं। मीरा की साँसें अब रुक-रुक कर आ रही थीं। उसने आँखें बंद कर लीं और फुसफुसाई, “राहुल… ये… ठीक नहीं है… लेकिन… मैं… रोक नहीं पा रही…” लेकिन उसकी आवाज़ में कोई दृढ़ता नहीं थी, सिर्फ एक गहरी, दबी हुई तड़प। राहुल ने जवाब में नाइटी के पट्टे सरका दिए। कपड़ा फिसलते ही मीरा के दो बड़े, गोल तरबूज बाहर आ गए – गोरे, भीगे हुए, पसीने और पानी से चमकते हुए, ऊपर मटर गुलाबी और सख्त। राहुल ने एक तरबूज को हाथ में लिया, बहुत नरम दबाव से सहलाया, और मुंह में ले लिया। जीभ से मटर को घुमाया, चूसा। मीरा ने जोर से कराहते हुए कहा, “आह… राहुल… धीरे… इतनी ताकत से मत…” लेकिन उसकी उंगलियाँ राहुल के सिर को और गहराई से दबा रही थीं।

मीरा का शरीर अब पूरी तरह राहुल के हवाले हो चुका था। राहुल ने दूसरे तरबूज को भी अपनी हथेली से घेरा, अंगूठे से मटर को हल्के-हल्के घुमाया। मीरा का शरीर एक साथ काँप उठा। उसकी गर्दन पर पसीने की बूँदें चमकने लगीं। वह शर्म से मर रही थी, लेकिन इच्छा ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। राहुल ने धीरे से मीरा को किचन के काउंटर पर टिका दिया। उसने नाइटी पूरी तरह ऊपर सरका दी। मीरा अब सिर्फ पतली पैंटी में थीं, और उनकी खाई में एक गर्म, चिपचिपी नमी फैल रही थी। राहुल ने पैंटी खींची, और मीरा की खाई पूरी तरह नंगी हो गई – हल्के बालों से घिरी, गुलाबी, भीगी हुई। राहुल ने मीरा की जांघों को चूमा, ऊपर की तरफ बढ़ता गया। जब उसने अपनी जीभ से खाई को छुआ, तो मीरा ने एक लंबी कराह के साथ कहा, “राहुल… ये… क्या कर रहे हो…” लेकिन साथ ही उसने राहुल का सिर दोनों हाथों से पकड़ लिया और खुद को और पास खींच लिया। राहुल ने खाई चाटना शुरू किया – बहुत धीरे, बहुत गहराई से। जीभ ऊपर-नीचे घूम रही थी, कभी मटर जैसी उभरी जगह को चूस रही थी। मीरा का शरीर लहरा रहा था। उसकी आँखों से आँसू निकल आए, लेकिन वे खुशी के थे। “ऐसा… कभी नहीं हुआ मेरे साथ,” वह मन-ही-मन सोच रही थी।

मीरा ने राहुल को ऊपर खींच लिया। अब उसकी बारी थी। उसने राहुल की शर्ट उतारी, पैंट खोली। खीरा बाहर निकला – सख्त, लंबा, नसों से भरा। मीरा ने पहली बार इतने करीब से देखा। उसने हाथ से पकड़ा, गर्म और नरम। राहुल कराह उठा। मीरा ने धीरे से खीरा मुंह में लिया। पहले सिर्फ सिर, फिर थोड़ा और। उसकी जीभ घूम रही थी, ऊपर नीचे। राहुल के हाथ उसके बालों में थे। “मीरा भाभी… तुम्हारा मुंह स्वर्ग है,” वह फुसफुसाया। मीरा ने और गहरा लिया, खीरा पूरा मुंह में, गला तक। वह चूस रही थी, धीरे-धीरे, लेकिन पूरी ताकत से। राहुल का शरीर तन गया। मीरा को महसूस हुआ कि खीरा और सख्त हो गया है। उसने रस का स्वाद महसूस किया, लेकिन रुक गई। वह नहीं चाहती थी कि अभी खत्म हो जाए।

राहुल ने मीरा को किचन के फर्श पर ही लिटा दिया। अब सामने से खोदने का समय था। उसने मीरा की जांघें फैलाईं, और खीरा खाई के मुंह पर रखा। मीरा ने आँखें बंद कर लीं। “धीरे… राहुल… मैं डर रही हूँ,” उसने कहा। राहुल ने धीरे से दबाया। खीरा खाई में घुसा, बहुत धीरे, इंच दर इंच। मीरा ने कराहते हुए कहा, “आह… पूरा भर गया…” राहुल रुका नहीं, लेकिन तेज नहीं किया। वह धीरे-धीरे अंदर बाहर कर रहा था, हर थ्रस्ट में मीरा की खाई को और गहराई से महसूस कर रहा था। मीरा के तरबूज हिल रहे थे, मटर सख्त हो गए थे। राहुल ने एक तरबूज को मुंह में लिया, चूसा, और खुदाई जारी रखी। मीरा की आहें कमरे में गूंज रही थीं। “और गहरा… राहुल… और तेज…” वह अब खुद मांग रही थी।

वे पोजीशन बदल गए। अब पिछवाड़े से खोदना। मीरा घुटनों के बल खड़ी हो गई, पिछवाड़ा ऊपर उठा। राहुल ने पीछे से खीरा फिर से खाई में डाला। इस बार ज्यादा गहरा, ज्यादा तेज। मीरा का पिछवाड़ा हर थ्रस्ट पर हिल रहा था। राहुल ने मीरा के बाल पकड़े, हल्का सा खींचा, और खुदाई तेज की। मीरा की खाई से आवाजें आ रही थीं, गीली, चिपचिपी। “मैं… मैं रस छूटने वाली हूँ…” मीरा चीखी। राहुल ने और तेज किया। मीरा का शरीर काँप उठा, खाई सिकुड़ गई, और रस निकल आया, गर्म, बहता हुआ। लेकिन राहुल रुका नहीं। उसने मीरा को फिर से लिटाया, और सामने से फिर शुरू किया।

दूसरी बार मीरा का रस निकला, तब राहुल भी किनारे पर था। उसने तेजी से खोदा, खाई को पूरी तरह भरते हुए। मीरा ने उसे जकड़ लिया, नाखून उसकी पीठ में गड़े। “अंदर… राहुल… सब अंदर…” राहुल ने आखिरी थ्रस्ट दिया, और उसका रस खाई के अंदर छूट गया, गर्म, भरपूर। दोनों एक साथ कराहे, पसीने से तर, साँसें मिली हुईं। राहुल मीरा के ऊपर लेट गया, लेकिन खीरा अभी भी अंदर था। वे कुछ देर ऐसे ही रहे, दिल की धड़कनें एक हो गईं।

रात और आगे बढ़ी। वे फिर से जुड़े, इस बार और धीरे, और गहरे। राहुल ने मीरा को गोद में उठाया, और खाई में खीरा डालकर खड़ा-खड़ा खोदा। मीरा की टांगें उसके कमर पर लिपटी हुईं। तरबूज उसके सीने से रगड़ खा रहे थे। मीरा ने राहुल के कानों में फुसफुसाया, “तुम्हारा खीरा मुझे पागल कर देता है।” राहुल ने मुस्कुराकर कहा, “और तुम्हारी खाई मेरी रात है भाभी।” वे घंटों तक एक-दूसरे में खोए रहे। हर बार रस निकलने के बाद वे थोड़ा रुकते, चुंबन करते, बातें करते, फिर फिर से शुरू करते।

सुबह होने वाली थी, लेकिन मीरा ने राहुल को नहीं जाने दिया। “एक बार और… बस एक बार,” उसने कहा। इस बार पिछवाड़े से, लेकिन बहुत धीरे। राहुल ने पहले उंगली से खाई को सहलाया, फिर खीरा पिछवाड़े में धीरे से घुसाया। मीरा ने दर्द और खुशी के मिले स्वाद को महसूस किया। “आह… धीरे… लेकिन मत रुकना…” राहुल ने पूरा खीरा अंदर किया, और धीमी गति से खोदना शुरू किया। मीरा का रस तीसरी बार निकला, और राहुल का भी। वे थककर फर्श पर गिर पड़े।

सुबह की पहली किरण किचन में आई, तो मीरा राहुल की बाहों में सो रही थी। उसका मन शांत था, लेकिन एक हल्की सी मीठी शर्म भी थी। राहुल ने उसकी आँखों में देखा और कहा, “ये सिर्फ शुरुआत है भाभी… हम साथ हैं अब।” मीरा ने मुस्कुराकर उसका चेहरा चूम लिया। बाहर सन्नाटा टूट रहा था, लेकिन उनकी रात अभी भी यादगार बनी हुई थी।

(कुल शब्द: लगभग ११५०। पूरी तरह भावुक, धीमी गति वाली और रसोई में यादगार रात की थीम के साथ।)

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