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अजनबी पड़ोसी की चु@@ई

बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और बादलों की गड़गड़ाहट दिल को दहला देने वाली थी। रात के करीब दस बजे थे जब समीर अपने फ्लैट की बालकनी के पास खड़ा होकर अंधेरे में भीगते शहर को देख रहा था। तभी अचानक पूरे अपार्टमेंट की बिजली गुल हो गई और सन्नाटा पसर गया। समीर अपनी मोमबत्ती जलाने ही वाला था कि उसके दरवाजे पर किसी ने जोर-जोर से दस्तक दी। जब उसने दरवाजा खोला, तो सामने उसकी नई पड़ोसन नैना खड़ी थी, जो शायद एक हफ्ते पहले ही बगल वाले फ्लैट में रहने आई थी। नैना पूरी तरह से बारिश में भीगी हुई थी और उसके चेहरे पर डर और घबराहट साफ नजर आ रही थी, जिसकी वजह से उसकी सांसें तेज चल रही थीं।

नैना ने एक बहुत ही पतली और गहरी नीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी, जो पानी में भीगने के कारण उसके शरीर से चिपक गई थी। समीर की नजरें जैसे ही उस पर पड़ीं, वह दंग रह गया क्योंकि उस पारदर्शी कपड़े के नीचे से उसके शरीर की बनावट साफ झलक रही थी। उसके ऊपर के दो उभरे हुए रसीले तरबूज साड़ी को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे और ठंड की वजह से उन तरबूजों पर लगे छोटे-छोटे मटर पूरी तरह से सख्त होकर कपड़े के ऊपर से ही अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे। नैना का गोरा बदन और उसकी गहरी नाभि समीर के मन में एक अजीब सी हलचल पैदा कर रही थी, जिसे वह चाहकर भी नजरअंदाज नहीं कर पा रहा था।

नैना ने कांपती आवाज में कहा, ‘समीर जी, मुझे अंधेरे और बादलों की आवाज से बहुत डर लगता है, क्या मैं थोड़ी देर यहां रुक सकती हूं?’ समीर ने मुस्कुराते हुए उसे अंदर आने का इशारा किया और उसे एक तौलिया थमा दिया। दोनों सोफे पर पास-पास बैठ गए और मोमबत्ती की हल्की रोशनी में नैना का भीगा बदन और भी ज्यादा कामुक लग रहा था। उनके बीच बातों का सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें नैना ने बताया कि वह अकेली रहती है। धीरे-धीरे बातों की गहराई बढ़ने लगी और समीर की नजरें बार-बार नैना के उन भारी तरबूजों पर टिक जातीं, जो उसकी हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे।

समीर ने धीरे से अपना हाथ नैना के कंधे पर रखा, तो उसने एक ठंडी आह भरी और अपनी आंखें बंद कर लीं। यह स्पर्श सिर्फ एक सहारा नहीं था, बल्कि एक मौन निमंत्रण था जिसने दोनों के बीच की झिझक की दीवार को गिरा दिया था। समीर ने धीरे-धीरे अपनी उंगलियां नैना की गर्दन पर फेरीं, जिससे उसके शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। नैना ने अपना सिर समीर के कंधे पर रख दिया और उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा, ‘आज मेरा मन बहुत अशांत है, मुझे अपनी बाहों में भर लो।’ समीर ने उसे अपनी तरफ खींचा और उसके रसीले होठों का रस पीना शुरू कर दिया, जिससे कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया।

दोनों के बीच का आकर्षण अब जुनून में बदल रहा था। समीर ने धीरे से नैना की साड़ी का पल्लू नीचे गिरा दिया, जिससे उसके विशाल तरबूज पूरी तरह से आजाद हो गए। वे तरबूज इतने नरम और सफेद थे कि समीर उन्हें बस देखता ही रह गया। उसने अपने हाथों में उन तरबूजों को भरा और उन्हें हल्के से दबाना शुरू किया, जिससे नैना के मुंह से एक सिसकारी निकली। उसने समीर के बालों को अपनी उंगलियों में फंसा लिया और अपने मटर जैसे निप्पलों को समीर के मुंह के करीब ले आई। समीर ने एक-एक करके उन मटरों को अपने मुंह में लिया और उन्हें चूसना शुरू किया, जिससे नैना की कमर ऊपर को उठने लगी।

समीर का हाथ अब धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ा और वह नैना की जांघों के बीच मौजूद उस रेशमी और गीली खाई तक पहुँच गया। जैसे ही समीर की उंगलियों ने उस खाई के किनारों को छुआ, नैना ने जोर से समीर का नाम पुकारा। वह खाई पहले से ही पूरी तरह से गीली और रस से भरी हुई थी, जो इस बात का सबूत थी कि नैना भी उतनी ही उत्तेजित थी। समीर ने अपनी उंगली से उस खाई की गहराई को नापना शुरू किया, जिससे नैना के शरीर में झटके लगने लगे। वह अपनी उंगलियों को उस खाई के अंदर और बाहर कर रहा था, और नैना की आहें अब तेज आवाजों में बदल रही थीं।

जल्द ही समीर ने अपने कपड़ों को शरीर से अलग कर दिया और उसका सख्त खीरा पूरी तरह से बाहर आ गया, जो अपनी मजबूती और लंबाई में किसी को भी हैरान कर देने वाला था। नैना की नजर जैसे ही उस विशाल खीरे पर पड़ी, उसकी आंखें फटी की फटी रह गई। उसने झुककर उस खीरे को अपने हाथों में लिया और उसे सहलाने लगी। फिर उसने धीरे से उस खीरे को अपने मुंह में भर लिया और उसे चूसना शुरू किया। नैना का खीरा चूसने का तरीका इतना जबरदस्त था कि समीर को लगा कि उसका रस अभी निकल जाएगा, लेकिन उसने खुद पर काबू पाया और नैना को बिस्तर पर लिटा दिया।

अब असली खुदाई का समय आ गया था। समीर ने नैना की टांगों को फैलाया और अपने खीरे के अगले हिस्से को उसकी खाई के मुहाने पर टिका दिया। जैसे ही उसने थोड़ा दबाव डाला, खीरा उस तंग और रसीली खाई के अंदर सरकने लगा। नैना ने दर्द और खुशी के मिले-जुले अहसास में समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। समीर ने धीरे-धीरे अपनी गति बढ़ाई और पूरी ताकत से खुदाई शुरू कर दी। हर धक्के के साथ समीर का खीरा गहराई तक जाता और नैना की खाई से एक अजीब सी मदहोश कर देने वाली आवाज निकलती। नैना बार-बार कह रही थी, ‘समीर, मुझे और जोर से खोदो, आज मुझे पूरी तरह अपना बना लो।’

खुदाई की प्रक्रिया अब अपने चरम पर थी। समीर ने नैना को बिस्तर के किनारे पर लाकर उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, जिससे उसे और भी गहरा अहसास होने लगा। नैना के तरबूज नीचे की ओर लटक रहे थे और समीर उन्हें अपने हाथों से मसलते हुए पीछे से लगातार प्रहार कर रहा था। कमरे में केवल उनके जिस्मों के टकराने की आवाज और नैना की सिसकारियां गूंज रही थीं। समीर की गति अब इतनी तेज हो गई थी कि नैना का पूरा शरीर कांपने लगा था। उसने अपनी खाई को समीर के खीरे के चारों ओर कस लिया और जोर-जोर से चिल्लाने लगी।

अंत में, वह पल आ ही गया जब दोनों का संयम टूट गया। समीर ने एक आखिरी और जोरदार धक्का मारा और उसका खीरा पूरी गहराई तक धंस गया। उसी समय नैना की खाई से रसों की बौछार हुई और समीर का सारा गरम रस भी नैना की गहराई में समा गया। दोनों एक-दूसरे से चिपके हुए बिस्तर पर गिर पड़े, उनकी सांसें बेतहाशा चल रही थीं और शरीर पसीने से लथपथ थे। उस रात की उस गहरी खुदाई ने दो अजनबियों को हमेशा के लिए एक-दूसरे के जिस्म और रूह से जोड़ दिया था। अगले कुछ घंटों तक वे बस एक-दूसरे की बाहों में लिपटे रहे, उस सुखद अहसास को महसूस करते हुए जो अभी-अभी उन्होंने साझा किया था।

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