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अजनबी पड़ोसी की चुदाई

अजनबी पड़ोसी की चुदाई—>बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और आसमान में बिजली की कड़कड़ाहट दिल को दहला रही थी। मैं अपने फ्लैट की खिड़की के पास खड़ा होकर बाहर गिरती बूंदों को देख रहा था, तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने दरवाजा खोला तो सामने मेरी नई पड़ोसन नेहा खड़ी थी, जो पूरी तरह से भीगी हुई थी। उसके बदन पर चिपकी हुई पतली साड़ी उसके शरीर के हर घुमाव को साफ-साफ बयां कर रही थी। उसने झिझकते हुए कहा कि उसके फ्लैट की लाइट चली गई है और उसे डर लग रहा है। मैंने उसे अंदर आने को कहा और यहीं से उस रात की शुरुआत हुई जिसने हमारे बीच की अजनबीपन की दीवार को हमेशा के लिए गिरा दिया।

नेहा के भीगे हुए कपड़ों के नीचे से उसके शरीर की बनावट किसी अप्सरा जैसी लग रही थी। उसके सीने पर उभरे हुए दो मांसल तरबूज साड़ी के पतले कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे। जैसे-जैसे वह सांस ले रही थी, वे तरबूज ऊपर-नीचे हो रहे थे और उन पर जमे हुए छोटे-छोटे मटर साफ दिखाई दे रहे थे जो ठंड और उत्तेजना के कारण अकड़ गए थे। उसका पिछवाड़ा इतना सुडौल और भरा हुआ था कि मेरी नजरें वहां से हट ही नहीं रही थीं। उसके शरीर से उठती हुई सोंधी महक और बारिश की खुशबू ने मेरे भीतर एक अजीब सी तड़प पैदा कर दी थी। वह सोफे पर बैठी तो उसकी साड़ी थोड़ी सरक गई, जिससे उसके गोरे बदन की चमक और भी बढ़ गई थी।

हम दोनों के बीच बातों का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन हमारी आँखों में एक अलग ही प्यास थी। मैंने उसे तौलिया दिया और जब वह अपने बाल सुखाने लगी, तो उसके हाथों की हरकत से उसके तरबूज और भी ज्यादा उछल रहे थे। मुझे महसूस हुआ कि नेहा भी मेरी तरफ आकर्षित हो रही है। उसकी नजरें बार-बार मेरे पैंट के उभार की तरफ जा रही थीं, जहाँ मेरा खीरा धीरे-धीरे अपनी लंबाई बढ़ा रहा था। वह माहौल बहुत ही भावुक और कामुक हो गया था। हमने एक-दूसरे की आँखों में देखा और बिना कुछ कहे समझ गए कि इस रात हम दोनों की तन्हाई खत्म होने वाली है। खिड़की पर गिरती बूंदों का शोर हमारे दिल की धड़कनों के साथ तालमेल बिठा रहा था और हवा में एक सिहरन सी दौड़ रही थी।

मैंने धीरे से अपना हाथ उसकी रेशमी कमर पर रखा, तो वह कांप उठी। उसकी सांसें तेज हो गई थीं और उसकी आंखों में एक गहरी चमक थी। उसने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया और मैंने उसके कान के पास धीरे से फुसफुसाते हुए उसे अपने और करीब खींच लिया। हमारे होंठ धीरे-धीरे एक-दूसरे के करीब आए और जब वे मिले, तो जैसे बिजली का एक झटका सा लगा। वह चुंबन बहुत ही गहरा और रसभरा था, जिसमें हम दोनों अपनी सुध-बुध खो बैठे थे। मैंने महसूस किया कि नेहा का शरीर अब पूरी तरह से मेरे नियंत्रण में था और वह भी इसी पल का इंतज़ार कर रही थी। मैंने धीरे से उसके ब्लाउज के हुक खोले और उसके विशाल तरबूजों को आजाद कर दिया।

जैसे ही उसके तरबूज बाहर आए, मैंने उन्हें अपने हाथों में भर लिया। वे बहुत ही कोमल और गर्म थे, मानो ताजी मलाई के गोले हों। मैंने अपने अंगूठे से उनके ऊपर मौजूद मटर को सहलाया, जिससे नेहा के मुंह से एक धीमी कराह निकली। वह अपनी गर्दन पीछे की ओर झुकाकर मेरी छुअन का आनंद ले रही थी। मैंने अपना चेहरा उसके तरबूजों के बीच ले जाकर उनकी खुशबू को अंदर भरा और फिर एक मटर को अपने मुंह में ले लिया। नेहा ने मेरे बालों में अपनी उंगलियां फंसा लीं और मुझे अपने और करीब खींच लिया। उसके शरीर का तापमान बढ़ रहा था और कमरे की ठंडी हवा अब हमें बिल्कुल भी महसूस नहीं हो रही थी।

अब मेरी उंगलियां उसकी साड़ी के नीचे सरकते हुए उस गहरी और मखमली खाई तक पहुँच गई थीं। वहाँ घने और रेशमी बाल थे जो बारिश की नमी और नेहा की खुद की उत्तेजना से भीगे हुए थे। जैसे ही मेरी उंगली ने उस खाई को छुआ, नेहा ने जोर से मेरा नाम पुकारा। वह खाई बहुत ही तंग और गर्म थी, जिससे निकलने वाला चिपचिपा रस मेरी उंगलियों को और भी फिसलन भरा बना रहा था। मैंने धीरे से अपनी उंगली से उस खाई में खुदाई शुरू की, जिससे नेहा का पूरा शरीर धनुष की तरह मुड़ गया। वह अपनी कमर को ऊपर-नीचे कर रही थी और मेरी उंगलियों की गति के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश कर रही थी। उसके अंदर की गहराई और गर्मी ने मुझे पागल कर दिया था।

मुझसे अब और सब्र नहीं हो रहा था, मैंने अपनी पैंट उतारी और मेरा विशाल खीरा पूरी तरह से अकड़ कर बाहर आ गया। नेहा ने जब उस खीरे को देखा, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गई। उसने उसे अपने हाथों में पकड़ा और सहलाने लगी। उसकी हथेली की कोमलता ने खीरे को और भी कठोर बना दिया था। फिर उसने धीरे से खीरा अपने मुंह में ले लिया और उसे चूसने लगी। वह दृश्य इतना कामुक था कि मुझे लगा मेरा रस अभी निकल जाएगा। वह बड़ी ही कुशलता से खीरे को ऊपर-नीचे कर रही थी, और कभी-कभी अपनी जीभ से उसके ऊपरी हिस्से को सहलाती। मैं बस आँखें बंद करके उस स्वर्गीय सुख को महसूस कर रहा था।

अंततः, मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया और सामने से खुदाई शुरू करने की ठान ली। मैंने अपने खीरे की नोक को उसकी गीली और बेताब खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से धक्का दिया। नेहा ने एक लंबी आह भरी और अपनी टांगें मेरे कंधों पर रख लीं। जैसे-जैसे मेरा खीरा उस मखमली खाई के अंदर समा रहा था, हम दोनों की सांसें एक हो रही थीं। वह जगह इतनी तंग थी कि खीरा अंदर जाते समय हर परत को महसूस कर रहा था। मैंने जोर-धक्के मारने शुरू किए और पूरा कमरा हमारे शरीर के टकराने की आवाज़ और नेहा की आहों से गूंज उठा। ‘हाँ, और जोर से खोदो, मुझे पूरा भर दो,’ नेहा ने सिसकते हुए कहा।

थोड़ी देर बाद मैंने उसे घुमाया और पिछवाड़े से खुदाई करने की स्थिति में ले आया। पीछे से उसका नज़ारा बहुत ही अद्भुत था, उसके हिलते हुए पिछवाड़े को देख कर मेरी उत्तेजना चरम पर पहुँच गई। मैंने एक हाथ से उसके तरबूजों को पकड़ा और दूसरे से अपनी गति को और तेज कर दिया। हर धक्के के साथ नेहा जोर-जोर से कराह रही थी और उसके पिछवाड़े के मांसल हिस्से मेरे पेट से टकरा रहे थे। हमारी यह खुदाई अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच रही थी। नेहा का पूरा बदन पसीने से भीग चुका था और वह बार-बार कह रही थी कि उसका रस निकलने वाला है। मेरी भी हालत अब बेकाबू हो रही थी और मैं अपनी पूरी ताकत उस खाई को खोदने में लगा रहा था।

अचानक नेहा का शरीर बुरी तरह से कांपने लगा और उसने कसकर तकिए को पकड़ लिया। उसकी खाई से भारी मात्रा में रस निकलने लगा जिसने मेरे खीरे को पूरी तरह भिगो दिया। उसी पल, मैंने भी अपना पूरा लावा उसकी गहराई में छोड़ दिया। हम दोनों काफी देर तक एक-दूसरे से लिपटे रहे, हांफते हुए और उस अद्भुत सुख को महसूस करते हुए। नेहा का सिर मेरी छाती पर था और मेरी उंगलियां उसके गीले बालों में खेल रही थीं। वह अजनबी पड़ोसन अब मेरे लिए अजनबी नहीं रही थी, उस बारिश वाली रात ने हमें रूहानी और जिस्मानी तौर पर एक कर दिया था। हम दोनों के बीच का वह मौन अब प्यार और संतुष्टि की कहानी कह रहा था।

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