Join WhatsApp Click Here
Join Telegram Click Here

कविता का अनकहा प्यार

कविता का अनकहा प्यार —> बाहर काले घने बादलों ने आसमान को पूरी तरह से घेर लिया था और मूसलाधार बारिश की बूंदें छत पर एक मधुर संगीत पैदा कर रही थीं। समीर अपने कमरे की बालकनी के पास खड़ा था, लेकिन उसकी नज़रें बाहर के मौसम पर नहीं, बल्कि रसोई में काम कर रही अपनी भाभी कविता पर टिकी थीं। समीर की उम्र अभी बाईस साल थी और कविता तीस के पार थी, लेकिन उसकी सुंदरता और व्यक्तित्व में एक ऐसी कशिश थी जो समीर को अपनी ओर खींच लेती थी। कविता ने आज हल्के बैंगनी रंग की साड़ी पहनी थी, जो उसके गोरे रंग और तराशे हुए शरीर पर बिजली की तरह गिर रही थी। घर में उस वक्त कोई नहीं था, क्योंकि समीर के बड़े भाई काम के सिलसिले में शहर से बाहर गए हुए थे और यह अकेलापन समीर के मन में हलचल पैदा कर रहा था। उसके दिल की धड़कनें तेज थीं और मन में एक अजीब सी कसमकस चल रही थी कि वह अपने दिल की बात कैसे कहे।

कविता के शरीर की बनावट किसी कुशल मूर्तिकार की उत्कृष्ट कृति की तरह थी, जो हर देखने वाले को सम्मोहित कर दे। जब वह साड़ी का पल्लू अपने कंधे पर डालती, तो उसके उभरे हुए सुडौल तरबूज साड़ी के पतले कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब लगते थे। उन तरबूजों की गोलाई इतनी सटीक थी कि समीर की आँखें वहीं जम जाती थीं। अक्सर चलते-फिरते जब साड़ी थोड़ी खिसकती, तो उन तरबूजों के बीच का गहरा सिरा और ऊपर की ओर तने हुए छोटे-छोटे मटर साफ झलक जाते थे। उसकी कमर की ढलान किसी रेशमी रास्ते की तरह थी जो नीचे जाकर एक चौड़ी और गहरी खाई की ओर ले जाती थी। समीर जब भी उसे झुककर काम करते देखता, तो साड़ी के नीचे दबे उसके भारी पिछवाड़े की गोलाई देखकर उसका सारा संयम जवाब देने लगता था। उसकी देह का हर अंग जैसे एक कामुक कविता लिख रहा था, जिसे समीर बार-बार पढ़ना चाहता था।

समीर धीरे-धीरे रसोई की ओर बढ़ा और कविता के ठीक पीछे जाकर खड़ा हो गया, जहाँ से उसके शरीर की भीनी-भीनी खुशबू उसे मदहोश कर रही थी। कविता ने मुड़कर देखा और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे वह जानती हो कि समीर के मन में क्या चल रहा है। समीर ने धीमी आवाज़ में कहा, भाभी, आप आज बहुत सुंदर लग रही हैं, इतनी कि मेरी धड़कनें रुकने का नाम नहीं ले रहीं। कविता थोड़ा शर्माई और अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए बोली, समीर, तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान क्यों नहीं देते, ये सब बातें शोभा नहीं देतीं। लेकिन उसकी आवाज़ में कोई सख्ती नहीं थी, बल्कि एक आमंत्रण था जिसने समीर की हिम्मत और बढ़ा दी। उसने कविता के हाथ को धीरे से छुआ, जो ठंडे पानी की वजह से शीतल थे, लेकिन समीर के स्पर्श ने वहाँ एक गर्माहट भर दी। दोनों की साँसें एक-दूसरे से टकराने लगीं और रसोई का वह कोना अचानक बहुत गर्म महसूस होने लगा।

समीर की उंगलियां अब कविता की कोमल कमर पर रेंगने लगी थीं, जिससे कविता के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी आह भरी, जो समीर के लिए हरी झंडी की तरह थी। समीर ने उसे धीरे से अपनी ओर खींचा और उसके गले पर अपनी साँसों की गर्मी छोड़ने लगा। कविता ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उसके हाथों ने समीर की पीठ को मजबूती से जकड़ लिया। समीर की धड़कनें अब उसके सीने को चीरकर बाहर आने को बेताब थीं और उसका खीरा अपनी जगह पर पूरी तरह से अकड़ चुका था। उसने कविता के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके माथे को चूमा, फिर धीरे-धीरे उसके कानों के पास फुसफुसाया, मैं कब से इस पल का इंतज़ार कर रहा था, कविता। कविता की आँखों में हया और प्यास का एक अनोखा संगम था, जो समीर को और भी उत्तेजित कर रहा था।

दोनों धीरे-धीरे चलते हुए बेडरूम तक पहुँचे, जहाँ केवल डिम लाइट जल रही थी जो माहौल को और भी रोमांटिक बना रही थी। समीर ने कविता को बिस्तर पर बिठाया और उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया, जैसे वह किसी देवी की पूजा करने जा रहा हो। उसने धीरे-से कविता की साड़ी का पल्लू नीचे गिराया, जिससे उसके रेशमी ब्लाउज में दबे वे भारी तरबूज पूरी तरह से उजागर हो गए। समीर ने अपनी कांपती उंगलियों से ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले, और जैसे ही ब्लाउज खुला, वे गोरे और विशाल तरबूज आज़ाद होकर बाहर छलक आए। उन पर मौजूद मटर ठंड और उत्तेजना के कारण पूरी तरह से सख्त हो चुके थे। समीर ने अपना चेहरा उन तरबूजों के बीच फंसा लिया और उनकी कोमलता का आनंद लेने लगा, जबकि कविता की आहें पूरे कमरे में गूँजने लगी थीं।

कविता ने समीर के बालों में अपनी उंगलियां फँसा लीं और उसका सिर अपने तरबूजों पर और जोर से दबा लिया। समीर अब उन मटर के दानों को अपने मुँह में लेकर धीरे-धीरे चूसने लगा, जिससे कविता का शरीर धनुष की तरह ऊपर की ओर खिंच गया। वह बार-बार समीर का नाम पुकार रही थी और उसकी आवाज़ में एक ऐसी तड़प थी जो समीर के खीरे को और भी पत्थर जैसा बना रही थी। समीर ने अब नीचे की ओर बढ़ना शुरू किया और कविता की साड़ी के साथ उसका साया भी नीचे सरका दिया। अब कविता उसके सामने पूरी तरह से नग्न अवस्था में थी, उसकी गहरी खाई के चारों ओर काले रेशमी बाल एक सुरक्षा कवच की तरह फैले हुए थे। उस खाई से एक प्राकृतिक खुशबू आ रही थी जो समीर के दिमाग पर चढ़ गई और उसने उस खाई को करीब से निहारना शुरू किया।

समीर ने अब अपनी उंगली को धीरे से उस रेशमी खाई के भीतर दाखिल किया, जो पहले से ही रस से गीली हो चुकी थी। कविता की कराह तेज हो गई और वह अपने कूल्हों को हवा में उछालने लगी। समीर की उंगली जैसे-जैसे उस खाई की गहराई नाप रही थी, कविता का रस और अधिक निकलने लगा। समीर ने अपनी उंगलियों की गति बढ़ाई और कभी-कभी वह उस खाई को अपनी जुबान से चखने लगा। कविता ने अपने हाथ समीर के सिर पर रखे और उसे और गहराई तक खींच लिया, वह इस सुख में पूरी तरह से खो चुकी थी। समीर का खीरा अब अपनी सीमाओं को लांघने के लिए तैयार था, उसने अपनी पैंट उतारी और अपने विशाल और कठोर खीरे को कविता के हाथों में थमा दिया, जिसे देखकर कविता की आँखें फटी की फटी रह गईं।

कविता ने उस गर्म और सख्त खीरे को अपने नाजुक हाथों में पकड़ा और उसे सहलाने लगी, जैसे वह उसे महसूस करना चाहती हो। फिर उसने धीरे से उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे चूसना शुरू किया, जिससे समीर के मुँह से बेसाख्ता एक कराह निकल गई। वह उस सुख की चरम सीमा पर था जिसे वह शब्दों में बयां नहीं कर सकता था। कुछ देर तक यह सिलसिला चलने के बाद, समीर ने कविता को सीधा लिटाया और खुद उसके ऊपर आ गया। उसने अपने खीरे की नोक को उस रेशमी खाई के मुहाने पर टिकाया और धीरे से दबाव डाला। कविता ने दर्द और सुख की एक मिली-जुली आह भरी जब वह खीरा धीरे-धीरे उस संकरी खाई के भीतर समाने लगा। समीर ने एक गहरा धक्का दिया और पूरा खीरा उस गहराई में खो गया।

शुरू में गति धीमी थी, समीर धीरे-धीरे खुदाई कर रहा था ताकि कविता उस खिंचाव को बर्दाश्त कर सके। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, दोनों के शरीर पसीने से तर-बतर हो गए और कमरे में केवल मांस के मांस से टकराने की आवाज़ें गूँजने लगीं। समीर ने कविता के भारी पिछवाड़े को अपने हाथों में भर लिया और उसे ऊपर उठाकर और भी गहराई से खोदना शुरू किया। कविता के तरबूज हर धक्के के साथ ऊपर-नीचे उछल रहे थे, जिन्हें समीर बीच-बीच में अपने हाथों से मसल रहा था। दोनों एक-दूसरे की आँखों में देख रहे थे, जहाँ केवल और केवल प्यास और जुनून दिखाई दे रहा था। समीर ने अब अपनी गति को तूफानी कर दिया और खुदाई इतनी तेज हो गई कि कविता केवल बेसुध होकर कराह रही थी, उसका पूरा शरीर थर-थर कांप रहा था।

जब वे दोनों चरम सीमा के करीब पहुँचे, तो समीर ने कविता को उल्टा घुमा दिया और पिछवाड़े से खुदाई शुरू की। यह स्थिति कविता के लिए और भी उत्तेजक थी, वह बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींच रही थी। समीर की हर चोट उसकी रूह तक पहुँच रही थी। अंत में, जब समीर को महसूस हुआ कि उसका रस अब निकलने ही वाला है, उसने एक आखिरी जोरदार धक्का दिया और अपना सारा रस उस गहरी खाई के भीतर उड़ेल दिया। उसी क्षण कविता का भी रस निकला और वह पूरी तरह से ढीली पड़ गई। दोनों पसीने में भीगे हुए एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े, उनकी साँसें अभी भी बहुत तेज थीं लेकिन मन में एक असीम शांति और संतुष्टि थी। वह रात उनके लिए केवल एक शारीरिक मिलन नहीं, बल्कि दो रूहों के एक होने की कहानी बन गई थी, जिसे वे कभी नहीं भूल सकते थे।

Leave a Comment

You cannot copy content of this page

error: Content is protected !!