घर के सन्नाटे में घड़ी की टिक-टिक भी आज किसी धड़कन की तरह गूंज रही थी। समीर सोफे पर बैठा एक किताब पढ़ने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसका ध्यान बार-बार रसोई से आ रही बर्तनों की खनक और पायल की झंकार पर जा रहा था। उसकी साली कविता पिछले दो दिनों से उनके घर रुकी हुई थी क्योंकि बाकी सब एक पारिवारिक शादी में दूसरे शहर गए थे। कविता की उम्र करीब चौबीस साल थी और उसका व्यक्तित्व किसी खिलते हुए फूल की तरह था, जिसकी सुगंध समीर को अपनी ओर खींच रही थी। वह अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी और उसकी आंखों में एक अजीब सी शरारत और मासूमियत का मिश्रण था जो समीर के मन में हलचल पैदा कर रहा था।
कविता जब रसोई से बाहर आई, तो समीर की सांसें जैसे थम सी गईं। उसने हल्के नीले रंग की सूती साड़ी पहनी हुई थी, जो उसके सुडौल शरीर पर इस कदर लिपटी थी कि उसके शरीर की हर ढलान साफ झलक रही थी। उसके भरे हुए शरीर की बनावट किसी तराशी हुई मूर्ति की तरह थी, जिसमें उसके ऊपरी हिस्से के दो रसीले तरबूज साड़ी के ब्लाउज को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे। जब वह चलती थी, तो उसके उन तरबूजों की हरकत समीर की आंखों में एक अजीब सा नशा भर देती थी। उसकी कमर की गोलाई और उसका चौड़ा पिछवाड़ा साड़ी के पतले कपड़े के नीचे से अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे, जिससे समीर के अंदर एक ज्वाला सी भड़क उठी थी।
समीर और कविता के बीच हमेशा से एक दोस्ताना रिश्ता रहा था, लेकिन आज उस सन्नाटे ने उनके बीच एक अदृश्य तनाव पैदा कर दिया था। कविता समीर के पास आकर बैठ गई और उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। समीर ने महसूस किया कि उसकी खुशबू किसी मोगरे के फूल की तरह उसके फेफड़ों में समा रही है। दोनों के बीच बातचीत तो सामान्य हो रही थी, लेकिन उनकी आंखों में एक अलग ही कहानी लिखी जा रही थी। कविता ने जब झुककर मेज से पानी का गिलास उठाया, तो उसके ब्लाउज के गहरे गले से उसके तरबूजों के बीच की गहरी घाटी साफ दिखाई दे रही थी, जिसने समीर के दिल की धड़कन को दोगुना कर दिया था।
जैसे-जैसे शाम ढलती गई, उनके बीच का आकर्षण एक नई करवट लेने लगा। समीर ने महसूस किया कि कविता भी शायद उसी खिंचाव को महसूस कर रही है जो वह खुद महसूस कर रहा था। वह बार-बार अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक करने का बहाना करती, जिससे उसके गोरे बदन की चमक समीर की आंखों के सामने कौंध जाती। उनके बीच की झिझक अब धीरे-धीरे कम हो रही थी और उसकी जगह एक गहरी इच्छा लेती जा रही थी। समीर का मन कर रहा था कि वह आगे बढ़कर उस रेशमी त्वचा को छू ले, लेकिन समाज और रिश्तों की मर्यादा उसके कदमों को रोक रही थी, हालांकि उसका दिल बगावत पर उतारू था।
तभी अचानक बिजली चली गई और पूरा कमरा अंधेरे की चादर में लिपट गया। कविता एक हल्की सी चीख के साथ समीर के करीब आ गई और उसका हाथ पकड़ लिया। समीर ने महसूस किया कि उसकी हथेलियाँ पसीने से भीगी हुई थीं और वह कांप रही थी। उस स्पर्श ने समीर के शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ा दी। उसने धीरे से कविता के कंधे पर हाथ रखा और उसे सांत्वना देने की कोशिश की। उस अंधेरे में दोनों की सांसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं और माहौल में एक अजीब सी गर्मी पैदा हो गई थी। समीर ने महसूस किया कि अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं बचा है और उसकी उंगलियां कविता की गर्दन की कोमलता को महसूस करने लगीं।
समीर का हाथ धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ने लगा और उसने कविता के रेशमी गालों को अपनी उंगलियों से सहलाया। कविता ने अपनी आंखें मूंद लीं और एक गहरी आह भरी, जो समीर के कानों में किसी संगीत की तरह गूंजी। समीर ने अपने होंठों को कविता के कान के पास ले जाकर धीरे से फुसफुसाया, “तुम आज बहुत सुंदर लग रही हो कविता।” कविता ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन उसने समीर के हाथ को और मजबूती से थाम लिया। समीर ने हिम्मत जुटाकर अपने होंठों को उसकी गर्दन पर रख दिया, जिससे कविता के पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई और उसके शरीर का रोम-रोम जाग उठा।
समीर के होंठ अब कविता के चेहरे की ओर बढ़ने लगे और जल्द ही दोनों के होंठ एक-दूसरे में खो गए। वह एक ऐसा मधुर मिलन था जिसमें प्यास और तड़प दोनों शामिल थीं। समीर ने अपनी बाहों में कविता को कस लिया और उसके शरीर की गर्मी को अपने अंदर महसूस करने लगा। उसके हाथ अब कविता की पीठ पर रेंग रहे थे और धीरे-धीरे नीचे की ओर जा रहे थे, जहां उसका भारी पिछवाड़ा साड़ी के नीचे किसी पहाड़ की तरह महसूस हो रहा था। कविता भी अब पूरी तरह से समीर के वश में थी और उसने अपनी बाहें समीर की गर्दन के चारों ओर डाल दी थीं, जिससे उनके शरीर के बीच का फासला खत्म हो गया था।
समीर ने अब कविता की साड़ी के पल्लू को कंधे से नीचे गिरा दिया, जिससे उसके गोरे कंधे और ब्लाउज में दबे हुए तरबूज पूरी तरह से उजागर हो गए। उसने अपने हाथों से उन तरबूजों को धीरे से दबाया, जिससे कविता के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल गई। समीर ने महसूस किया कि उन तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर अब पूरी तरह से सख्त हो चुके थे, जो उसकी उत्तेजना का सबूत थे। उसने अपने मुंह से एक मटर को अपनी गिरफ्त में ले लिया और उसे धीरे से चूसने लगा, जिससे कविता का शरीर धनुष की तरह तन गया और वह समीर के बालों को अपनी उंगलियों से सहलाने लगी।
माहौल अब पूरी तरह से कामुक हो चुका था और दोनों की सांसें तेज हो चुकी थीं। समीर ने कविता को धीरे से उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया और खुद उसके ऊपर आ गया। उसने कविता के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले, जिससे उसके दोनों रसीले तरबूज पूरी तरह से आजाद हो गए। वे चांदनी की हल्की रोशनी में चांदी की तरह चमक रहे थे। समीर ने अपना पूरा चेहरा उन तरबूजों के बीच छिपा दिया और उनकी खुशबू को अपने अंदर उतारने लगा। कविता की सिसकियां अब कमरे के सन्नाटे को तोड़ रही थीं और वह समीर को और भी करीब खींच रही थी, उसकी उंगलियां समीर की पीठ पर निशान बना रही थीं।
समीर ने अब अपना हाथ नीचे की ओर बढ़ाया और कविता के पेटीकोट की डोरी ढीली कर दी। जैसे ही उसने कपड़ा हटाया, उसे कविता की गहरी खाई के दर्शन हुए, जो काले रेशमी बालों से घिरी हुई थी। उस खाई से एक प्राकृतिक खुशबू आ रही थी जिसने समीर के होश उड़ा दिए। उसने अपनी उंगलियों को उस खाई के मुहाने पर रखा और महसूस किया कि वह पहले से ही गीली और रसीली हो चुकी थी। समीर ने अपनी एक उंगली को धीरे से उस खाई के अंदर उतारा, जिससे कविता ने अपनी कमर ऊपर की ओर उठा दी और उसके मुंह से एक लंबी आह निकली, “ओह समीर जी, यह क्या कर रहे हैं आप…”
समीर ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और अपनी उंगलियों की गति बढ़ा दी। वह उसकी खाई में उंगली से खुदाई कर रहा था, जिससे कविता का पूरा शरीर थरथराने लगा था। उसने अपनी दूसरी उंगली भी अंदर डाल दी और उसे गहराई तक महसूस करने लगा। कविता अब बेकाबू हो रही थी और वह अपने हाथों से समीर के पैंट को उतारने की कोशिश करने लगी। समीर ने उसकी मदद की और जल्द ही उसका लंबा और सख्त खीरा पूरी तरह से बाहर आ गया। कविता ने जब उस विशाल खीरे को देखा, तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और उस गर्म खीरे को अपनी मुट्ठी में भर लिया।
कविता ने उस खीरे को अपने मुंह के करीब लाया और उसकी नोक को अपनी जीभ से चखने लगी। समीर को लगा जैसे उसके शरीर से प्राण निकल जाएंगे, वह आनंद के चरम पर था। फिर कविता ने पूरे खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे चूसना शुरू किया। समीर के मुंह से गालियां और सिसकियां एक साथ निकल रही थीं। वह कविता के सिर को पकड़कर उसे अपने खीरे पर आगे-पीछे करने लगा। कमरे में केवल चूसने की आवाजें और भारी सांसें गूंज रही थीं। कुछ ही देर में समीर को लगा कि उसका रस निकलने वाला है, तो उसने धीरे से कविता को हटाया और उसे खुदाई के लिए तैयार किया।
समीर ने कविता की टांगों को अपने कंधों पर रखा और अपने खीरे की नोक को उसकी रसीली खाई के मुहाने पर टिका दिया। उसने एक गहरा सांस लिया और धीरे से दबाव बनाया। जैसे ही खीरा अंदर गया, कविता ने एक चीख मारी और समीर के हाथों को जोर से पकड़ लिया। उसकी खाई बहुत ही तंग थी, जैसे बरसों से किसी ने वहां खुदाई न की हो। समीर ने थोड़ा और जोर लगाया और धीरे-धीरे आधा खीरा अंदर समा गया। कविता की आंखों में आंसू आ गए थे, लेकिन उनमें दर्द के साथ-साथ एक अनूठा आनंद भी था। समीर ने रुककर उसे चूमना शुरू किया ताकि वह सहज हो सके।
जब कविता थोड़ी शांत हुई, तो समीर ने पूरी ताकत से एक धक्का मारा और पूरा खीरा उसकी खाई की गहराई तक धंस गया। कविता का शरीर एक बार फिर से उछला और उसने समीर को कसकर जकड़ लिया। अब समीर ने धीरे-धीरे लय बनानी शुरू की। वह सामने से खुदाई कर रहा था और हर धक्के के साथ कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे। कमरे में मांस के टकराने की आवाजें गूंजने लगी थीं। समीर की गति अब तेज होती जा रही थी और कविता भी उसका पूरा साथ दे रही थी। वह अपनी कमर को ऊपर उठाकर हर धक्के को गहराई तक महसूस कर रही थी और उसके मुंह से लगातार आवाजें निकल रही थीं।
समीर ने अब कविता की स्थिति बदली और उसे बिस्तर पर घुटनों के बल झुका दिया। अब वह पीछे से खुदाई करने के लिए तैयार था। उसने कविता के चौड़े पिछवाड़े को अपने हाथों से सहलाया और फिर अपने खीरे को दोबारा उसकी खाई में पीछे के रास्ते से उतार दिया। इस स्थिति में खुदाई और भी गहरी हो रही थी और समीर को कविता के शरीर की हर हरकत महसूस हो रही थी। वह उसके बालों को पकड़कर उसे झटके दे रहा था और कविता बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींच रही थी। उसका पूरा शरीर पसीने से लथपथ था और उसकी सांसें उखड़ रही थीं, लेकिन वह और अधिक की मांग कर रही थी।
“समीर जी… और तेज… मुझे और गहराई तक खोदो…” कविता चिल्ला रही थी। उसकी इन बातों ने समीर के अंदर के जानवर को पूरी तरह से जगा दिया था। वह पागलों की तरह धक्के मार रहा था, उसका हर प्रहार कविता के शरीर के अंतर्तम को छू रहा था। कविता अब रस निकलने के करीब थी, उसका शरीर कांपने लगा था और उसकी खाई के अंदर की मांसपेशियां समीर के खीरे को कसने लगी थीं। अचानक कविता का पूरा शरीर अकड़ गया और उसकी खाई से गरम रस का फव्वारा फूट पड़ा। वह बिस्तर पर ढह गई, उसका पूरा शरीर थरथरा रहा था और वह जोर-जोर से हांफ रही थी।
समीर भी अब अपने चरम पर था। उसने कुछ और तेज धक्के मारे और फिर उसका खीरा भी अपना सारा रस कविता की गहराई में छोड़ने लगा। वह कविता के ऊपर ही गिर पड़ा, दोनों के शरीर पसीने से भीगे हुए थे और उनकी धड़कनें एक-दूसरे से मुकाबला कर रही थीं। कमरे का तापमान जैसे कई डिग्री बढ़ गया था। कुछ देर तक दोनों शांत लेटे रहे, बस एक-दूसरे की सांसों को महसूस करते रहे। उस पल में कोई रिश्ता नहीं था, कोई शर्म नहीं थी, बस दो जिस्मों का एक-दूसरे में विलीन हो जाना था। समीर ने धीरे से कविता के माथे को चूमा और उसे अपनी बाहों में समेट लिया।
खुदाई के बाद की वह शांति बहुत ही सुकून भरी थी। कविता ने अपना सिर समीर के सीने पर रख दिया और उसकी उंगलियां समीर के बालों में तैरने लगीं। उसके चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि और चमक थी। समीर को अपनी इस हरकत पर कोई पछतावा नहीं था, बल्कि उसे लगा कि उसने कविता के अंदर दबी हुई उस औरत को जगा दिया है जो बरसों से प्यासी थी। दोनों के बीच का वह अनकहा बंधन अब और भी गहरा हो गया था। उन्होंने पूरी रात एक-दूसरे की बाहों में बिताई, कभी बातें करते हुए तो कभी बस एक-दूसरे को निहारते हुए, यह जानते हुए कि यह रात उनके जीवन की सबसे यादगार रात बन चुकी थी।