गर्मी की तपिश में सुनीता भाभी की रसीली चु@@ई का रोमांच —> जेठ की उस तपती दोपहर में पूरा घर जैसे गहरी नींद में सोया हुआ था, सिवाय मेरे और सुनीता भाभी के। बाहर लू चल रही थी, लेकिन घर के भीतर का सन्नाटा किसी तूफान के आने का संकेत दे रहा था। मैं अपने कमरे में लेटा हुआ था, पर मेरा ध्यान बार-बार रसोई से आने वाली चूड़ियों की खनक पर भटक रहा था।
सुनीता भाभी रसोई में काम कर रही थीं और उनकी साड़ी पसीने से उनके बदन पर चिपक गई थी। जब वह ऊपर रैक से सामान उतारतीं, तो उनकी कमर का वह हिस्सा जो साड़ी से बाहर था, सोने की तरह चमकता था। उनके भारी तरबूज हर हरकत के साथ हिल रहे थे, जैसे वे अपनी आज़ादी की गुहार लगा रहे हों और सांसें तेज कर रहे हों।
मैंने साहस जुटाया और रसोई के दरवाज़े पर जाकर खड़ा हो गया। भाभी ने जैसे ही मुझे देखा, उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई, लेकिन उनकी आँखों में एक प्यास थी जिसे मैं साफ़ पढ़ सकता था। उनके ब्लाउज के ऊपर से उनके मटर साफ़ तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे, जो शायद ठंडक या उत्तेजना की वजह से अकड़ गए थे।
मैंने धीरे से कहा, “भाभी, बहुत गर्मी है, आप आराम क्यों नहीं करतीं?” उन्होंने गहरी सांस ली, जिससे उनके तरबूज और भी उभर कर सामने आ गए। उन्होंने पसीना पोंछते हुए कहा, “काम तो करना ही पड़ता है देवर जी, चाहे कितनी भी तपिश क्यों न हो।” उनकी आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी जिसने मेरे अंदर के सोये हुए शैतान को जगा दिया था।
मैं उनके करीब गया और उनके हाथ से गिलास छीनकर स्लैब पर रख दिया। मेरा हाथ जैसे ही उनकी मखमली त्वचा से टकराया, उनके शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। उन्होंने अपनी पलकें झुका लीं, पर पीछे नहीं हटीं। मैंने देखा कि उनके चेहरे पर शर्म की लाली और चाहत का पसीना एक साथ मिलकर उन्हें और भी ज्यादा हसीन बना रहा था।
मैंने धीरे से उनके कंधे पर हाथ रखा और उन्हें अपनी ओर घुमाया। हम दोनों के बीच की दूरी अब खत्म हो चुकी थी। उनके तरबूज मेरे सीने से हल्के से टकरा रहे थे। मैंने महसूस किया कि मेरा खीरा पैंट की कैद में अब और नहीं रहना चाहता था। वह पूरी तरह से सख्त होकर अपनी जगह तलाशने लगा था और भाभी को उसका अहसास हो रहा था।
“भाभी, सुमित भैया तो आज देर से आएंगे,” मैंने फुसफुसाते हुए उनके कान के पास कहा। उनकी गर्म सांसें मेरी गर्दन पर महसूस हो रही थीं। उन्होंने धीरे से हामी भरी और अपनी आँखें बंद कर लीं। यह इशारा काफी था। मैंने उनके होंठों को चूमना शुरू किया और उनके हाथों ने मेरी पीठ को कसकर जकड़ लिया, जैसे वह भी इसी पल का इंतज़ार कर रही थीं।
मैंने धीरे-धीरे उनके साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा दिया। अब उनके गोरे और गोल तरबूज सिर्फ़ एक पतले से ब्लाउज के नीचे कैद थे। मैंने अपनी उंगलियों से उनके मटर को सहलाना शुरू किया, जिससे उनके मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकली। वह अपनी कमर को मेरे खीरे की तरफ धकेलने लगीं, जिससे हम दोनों की उत्तेजना बढ़ने लगी।
हमने जल्दी से एक-दूसरे के कपड़े उतारना शुरू किया। जब भाभी पूरी तरह निर्वस्त्र हुईं, तो उनकी खूबसूरती देख मेरी सांसें थम गईं। उनकी खाई के पास उगे घने और काले बाल उनकी कामुकता में चार चाँद लगा रहे थे। वह अपनी टांगें थोड़ी खोलकर खड़ी थीं, जिससे उनकी गीली और गुलाबी खाई की झलक मिल रही थी, जो रस से भीगी हुई थी।
मैंने उन्हें वहीं किचन के स्लैब पर बैठा दिया और उनके घुटनों के बल नीचे बैठ गया। मैंने अपना चेहरा उनकी जांघों के बीच ले जाकर उनके बालों को चूमना शुरू किया। उनकी खाई से आने वाली वो प्राकृतिक गंध मुझे और भी पागल कर रही थी। मैंने अपनी जीभ से उनकी खाई को सहलाया, तो वह चीख पड़ीं और मेरे सिर को कसकर पकड़ लिया।
अब भाभी की बारी थी। उन्होंने मुझे खड़ा किया और खुद नीचे बैठ गईं। उन्होंने मेरे सख्त खीरे को अपने कोमल हाथों में लिया और उसे निहारने लगीं। फिर उन्होंने धीरे-धीरे खीरा चूसना शुरू किया। उनकी जीभ की लज्जत और मुँह की गर्मी ने मुझे जन्नत का अहसास करा दिया। वह पूरी शिद्दत के साथ उसे अपने मुँह में लेकर ऊपर-नीचे कर रही थीं।
जब मेरा सब्र का बांध टूटने लगा, तो मैंने उन्हें उठाकर बेडरूम की तरफ ले गया। मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया और उनके ऊपर आ गया। अब समय था असली खुदाई का। मैंने अपना खीरा उनकी खाई के मुहाने पर रखा। वह इतनी गीली हो चुकी थी कि मेरा खीरा एक ही झटके में काफी गहराई तक अंदर समा गया, जिससे भाभी की आँखों से खुशी के आंसू निकल आए।
हम सामने से खोदना शुरू कर चुके थे। हर धक्के के साथ भाभी की सिसकारी गूंज रही थी। उनके तरबूज हवा में उछल रहे थे और मैं उन्हें अपने हाथों से मसल रहा था। उनके मटर उत्तेजना से और भी सख्त हो गए थे। कमरे में सिर्फ हमारे शरीरों के टकराने की आवाज़ और भारी सांसें सुनाई दे रही थीं, जो वातावरण को और भी कामुक बना रही थीं।
कुछ देर बाद मैंने उन्हें पलटने को कहा। अब हम पिछवाड़े से खोदना चाहते थे। वह घुटनों के बल आ गईं और अपना भारी पिछवाड़ा मेरी ओर कर दिया। पीछे से उनकी खाई और भी साफ़ दिख रही थी। मैंने दोबारा अपना खीरा पीछे से अंदर डाल दिया। यह स्थिति और भी आनंददायक थी क्योंकि मुझे उनके पिछवाड़े का पूरा स्पर्श महसूस हो रहा था।
भाभी ने अपने हाथ बिस्तर पर टिका दिए थे और वह बार-बार पीछे मुड़कर मुझे देख रही थीं। “और ज़ोर से, मुझे पूरी तरह से भर दो,” उन्होंने सिसकते हुए कहा। उनकी इस मांग ने मुझे और भी जोश से भर दिया। मैं अब पागलों की तरह खुदाई कर रहा था। पसीना हमारे जिस्मों को एक-दूसरे से जोड़ रहा था, मानो हम दो जिस्म एक जान बन गए हों।
उत्तेजना अब अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। भाभी का शरीर कांपने लगा था, जो इस बात का सबूत था कि वह जल्द ही रस निकलने की स्थिति में पहुँचने वाली हैं। उनकी खाई की पकड़ मेरे खीरे पर और भी मजबूत हो गई थी। उन्होंने जोर-जोर से मेरा नाम पुकारना शुरू किया और अचानक उनका पूरा बदन धनुष की तरह अकड़ गया और उनका रस निकलना शुरू हो गया।
उनकी संतुष्टि को देख मेरा भी संयम जवाब दे गया। मैंने कुछ और गहरे और तेज धक्के लगाए और अपना सारा गरम रस उनकी खाई की गहराइयों में उड़ेल दिया। हम दोनों निढाल होकर एक-दूसरे की बाहों में गिर पड़े। उस शांत दोपहर में सिर्फ हमारी धड़कनों की आवाज़ थी। भाभी ने मेरे माथे को चूमा और मैंने उनकी आँखों में एक गहरी तृप्ति और प्यार देखा।
वह शाम ढलने तक हम वहीं लेटे रहे, एक-दूसरे के जिस्म की गर्माहट महसूस करते हुए। वह खुदाई सिर्फ शारीरिक मिलन नहीं था, बल्कि दो प्यासी रूहों का संगम था। हमने उस दिन समझा कि प्यास सिर्फ पानी की नहीं होती, बल्कि जज्बात और जिस्मानी सुकून की भी होती है। सुनीता भाभी की वो मुस्कान आज भी मेरे ज़हन में ताज़ा है, जिसने मुझे एक नया जीवन दिया था।
घर का सन्नाटा अब सुकून भरा था। भाभी ने धीरे से अपने कपड़े पहने और रसोई की तरफ चली गईं, पर उनके चलने के अंदाज़ में एक अजीब सा गर्व और लचक आ गई थी। मैंने खिड़की से बाहर देखा, सूरज अब ढल रहा था, पर मेरे अंदर की आग अभी भी सुलग रही थी। यह तो बस उस अंतहीन दास्तां की शुरुआत थी जो हम दोनों के बीच हमेशा के लिए कायम हो गई थी।
अगले कुछ दिनों तक हम जब भी एक-दूसरे को देखते, हमारी आँखों में उसी दोपहर की यादें तैरने लगतीं। वह सामने से खोदना और भाभी का वो खीरा चूसना, सब कुछ किसी हसीन ख्वाब जैसा लगता था। हमने एक अनकहा वादा कर लिया था कि जब भी यह तपिश बढ़ेगी, हम एक-दूसरे की प्यास बुझाने के लिए हमेशा तैयार रहेंगे, चाहे दुनिया कुछ भी कहे।