पड़ोसन निशा की रसीली चुदाई—>समीर ने अभी कुछ ही दिन पहले शहर की इस भव्य गगनचुंबी इमारत में अपना नया आशियाना बसाया था। वह एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और काम के सिलसिले में अक्सर देर रात तक जागता रहता था। उसके ठीक बगल वाले फ्लैट नंबर 402 में निशा रहती थी, जो अपनी खूबसूरती और सादगी के लिए पूरी सोसाइटी में मशहूर थी। निशा की उम्र लगभग पैंतीस साल रही होगी, लेकिन उसकी काया किसी जवान अल्हड़ हसीना जैसी थी। उसका पति एक बड़ा बिजनेसमैन था जो महीने के बीस दिन शहर से बाहर ही रहता था। निशा अक्सर अकेली रहती थी और यही अकेलापन उसकी आँखों में एक अजीब सी प्यास बनकर झलकता था जिसे समीर ने पहली ही मुलाकात में ताड़ लिया था।
निशा के शरीर की बनावट किसी कुशल मूर्तिकार की बेहतरीन कृति जैसी थी। उसकी हाइट मध्यम थी और उसका शरीर पूरी तरह से भरा हुआ और गदराया हुआ था। जब वह रेशमी साड़ी पहनकर अपनी बालकनी में आती, तो समीर की नज़रें उसके उन भारी-भरकम ‘तरबूजों’ पर टिक जाती थीं जो चोली के भीतर से बाहर निकलने को बेताब रहते थे। उन ‘तरबूजों’ का उभार इतना गहरा था कि समीर अक्सर कल्पना करता था कि उन्हें छूने पर कैसा महसूस होगा। उसकी कमर पतली थी और उसके नीचे उसका ‘पिछवाड़ा’ इतना चौड़ा और मांसल था कि चलते समय वह एक लयबद्ध तरीके से हिलता था, जो किसी भी मर्द के मन में तूफान पैदा करने के लिए काफी था।
समीर और निशा के बीच बातचीत का सिलसिला तब शुरू हुआ जब एक शाम लिफ्ट अचानक बीच में ही अटक गई। उस समय लिफ्ट में सिर्फ वे दोनों ही थे। चारों तरफ अंधेरा छा गया और हल्की सी इमरजेंसी लाइट जल उठी। निशा घबराहट के मारे समीर के करीब आ गई। उस बंद जगह में निशा के शरीर से आने वाली मोगरे की खुशबू समीर की इंद्रियों को जगाने लगी। समीर ने उसे सांत्वना देने के लिए उसके कंधे पर हाथ रखा, तो उसे महसूस हुआ कि निशा का शरीर डर से नहीं, बल्कि एक अनजानी उत्तेजना से कांप रहा है। वे दोनों एक-दूसरे की सांसों की गर्माहट महसूस कर सकते थे और वहीं से उनके बीच एक अनकहा भावनात्मक जुड़ाव शुरू हुआ।
उस लिफ्ट वाली घटना के बाद उनके बीच मुलाकातों का दौर बढ़ गया। कभी चाय के बहाने तो कभी किसी मदद के बहाने समीर उसके घर जाने लगा। एक रात जब बाहर हल्की उमस थी और बिजली गुल हो गई थी, समीर मोमबत्ती लेकर निशा के पास पहुँचा। निशा उस समय एक बेहद झीनी नाइटी में थी जिसके पार से उसके शरीर के अंग साफ झलक रहे थे। उसकी नाइटी के पतले कपड़े के नीचे उसके ‘तरबूज’ साफ़ दिखाई दे रहे थे और उन पर उभरे छोटे-छोटे ‘मटर’ समीर के दिल की धड़कनें तेज कर रहे थे। उस रात की खामोशी में दोनों की नज़रें मिलीं और समाज की सारी बंदिशें जैसे धुंधली पड़ने लगीं।
समीर ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाकर निशा के गालों को छुआ। निशा ने अपनी आँखें मूंद लीं और एक गहरी आह भरी। समीर के स्पर्श में एक ऐसी तड़प थी जिसे निशा बरसों से तरस रही थी। उसने निशा को अपनी बाहों में खींच लिया और उसके होठों का ‘रसपान’ करना शुरू कर दिया। यह उनके बीच का पहला स्पर्श था जो धीरे-धीरे एक ज्वालामुखी में बदलने लगा। समीर के हाथ निशा की पीठ पर रेंगते हुए नीचे की तरफ बढ़े और उसके भारी ‘पिछवाड़े’ को सहलाने लगे। निशा ने भी अपनी बाहें समीर के गले में डाल दीं और उसे अपने करीब खींच लिया, जिससे उसके ‘तरबूज’ समीर की छाती से बुरी तरह दब गए।
जैसे-जैसे उत्तेजना बढ़ी, समीर ने निशा की नाइटी के स्ट्रैप्स नीचे गिरा दिए। अब निशा के वे रसीले और विशाल ‘तरबूज’ पूरी तरह से समीर के सामने थे। समीर ने झुककर एक ‘तरबूज’ को अपने मुंह में भर लिया और उसके ऊपर मौजूद ‘मटर’ को अपनी जुबान से सहलाने लगा। निशा की सिसकारियां कमरे में गूंजने लगीं। वह समीर के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ कर उसे और जोर से अपने शरीर से सट जाने के लिए मजबूर कर रही थी। समीर ने अपनी जुबान से उसके ‘तरबूजों’ के बीच की घाटी को चाटा और फिर धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ता गया, जहाँ उसकी असली मंजिल थी।
समीर ने निशा को बिस्तर पर लेटाया और उसकी टांगों के बीच अपना सिर झुका दिया। वहां उसे एक घने ‘बालों’ का जंगल मिला जिसके बीच में निशा की ‘खाई’ छुपी हुई थी। समीर ने अपनी जुबान से उस ‘खाई’ को चाटना शुरू किया। निशा के शरीर में बिजली सी दौड़ गई और वह अपने कूल्हे हवा में उठाने लगी। वह अपनी ‘खाई’ को समीर के चेहरे पर रगड़ रही थी ताकि उसे और अधिक सुख मिल सके। समीर ने अपनी दो उंगलियां उस रसीली ‘खाई’ के भीतर डाल दीं और ‘उंगली से खोदना’ शुरू किया। निशा जोर-जोर से कराहने लगी, “ओह समीर, और गहरा… मुझे आज पूरा खोद डालो!”
निशा अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थी। उसने समीर की पेंट की जिप खोली और उसका कड़क ‘खीरा’ बाहर निकाल लिया। वह ‘खीरा’ अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ निशा के सामने तनकर खड़ा था। निशा ने बिना देर किए उस ‘खीरे को मुंह में लिया’ और उसे बड़े चाव से चूसने लगी। वह उसके अगले हिस्से को अपनी जुबान से सहलाती और फिर पूरा ‘खीरा’ हलक तक उतार लेती। समीर की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था। वह बस उस सुख के सागर में गोते लगा रहा था। फिर उसने निशा को उठाया और उसे ‘सामने से खोदने’ की पोजीशन में तैयार किया।
समीर ने अपने ‘खीरे’ की नोक को निशा की ‘खाई’ के मुहाने पर रखा और एक ही जोरदार झटके में उसे अंदर उतार दिया। निशा के मुंह से एक चीख निकली, जो दर्द की कम और चरम सुख की ज्यादा थी। समीर ने अपनी गति बढ़ाई और जोर-जोर से ‘खुदाई’ करने लगा। हर धक्के के साथ निशा के ‘तरबूज’ पागलों की तरह ऊपर-नीचे उछल रहे थे। समीर ने उसके दोनों हाथों को बिस्तर पर पिन कर दिया और पागलों की तरह उसे ‘खोदने’ लगा। कमरे में मांस के टकराने की आवाजें और उनकी भारी सांसों का शोर गूंज रहा था। समीर की ‘खुदाई’ इतनी जबरदस्त थी कि निशा का पूरा शरीर पसीने से नहा गया था।
कुछ देर बाद समीर ने निशा को घुमाया और उसे बिस्तर पर घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब समीर उसके पीछे था और उसके सामने उसका विशाल ‘पिछवाड़ा’ था। समीर ने अपने ‘खीरे’ को पीछे से उसकी ‘खाई’ में उतारा और ‘पिछवाड़े से खोदना’ शुरू किया। यह पोजीशन निशा को बहुत पसंद आई। वह अपने सिर को तकिए में गड़ाकर जोर-जोर से चिल्ला रही थी। समीर उसके ‘पिछवाड़े’ पर थप्पड़ मारते हुए उसे और भी गहराई से ‘खोद’ रहा था। निशा के शरीर की हर नस खिंच गई थी और वह अपने ‘रस निकलने’ के करीब पहुँच रही थी। अंत में, एक बहुत ही तीव्र धक्के के साथ समीर के ‘खीरे’ ने सारा गर्म लावा निशा की ‘खाई’ में उड़ेल दिया और निशा का भी ‘रस निकल’ गया।
खुदाई के बाद दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़कर सो गए। कमरे में अभी भी उनकी कामुकता की गंध रची-बसी थी। निशा का चेहरा एक अजीब सी शांति और संतुष्टि से चमक रहा था। समीर ने उसके माथे को चूमा और उसे अपनी छाती से लगा लिया। वह रात उनके लिए सिर्फ एक शारीरिक संबंध नहीं थी, बल्कि दो अकेले रूहों का मिलन था। निशा ने समीर के कान में धीरे से फुसफुसाया, “तुमने आज मुझे वह सब दे दिया जिसकी मुझे बरसों से तलाश थी।” समीर ने बस मुस्कुराकर उसे और कसकर थाम लिया, यह जानते हुए कि अब यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है।