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पेट्रोल पम्प वालो ने मिलकर खोदा

मेरा नाम सरिता था, और मैं उस छोटे से गांव में रहती थी जहां खेतों की हरी-भरी फैलावत दूर-दूर तक नजर आती थी, सुबह से शाम तक घास काटना, पोटली बनाकर सिर पर रखकर घर लौटना, यही मेरी दिनचर्या थी, घर में पति काम पर शहर जाते थे, बच्चे स्कूल में, और मैं अकेली उन सुनसान रास्तों से गुजरती जहां हवा में मिट्टी की सुगंध मिली रहती, पक्षियों की चहचहाहट और दूर से ट्रैक्टरों की गूंज सब मिलकर एक शांत लेकिन थका देने वाला माहौल बनाते, गांव के बाहर वो पेट्रोल पंप था जहां दो-तीन सेल्समैन काम करते थे, राजू, मनोज और विक्रम, वे मुझे हमेशा देखते थे जब मैं शाम को लौटती, लेकिन मैं नजरें झुकाकर निकल जाती क्योंकि गांव की औरतें ऐसी नजरों से दूर रहतीं, नैतिकता की दीवारें ऊंची थीं, लेकिन कभी-कभी मन में एक अजीब सी उलझन होती कि क्या वे सिर्फ देखते हैं या कुछ और सोचते हैं, घर पहुंचकर मैं थक कर लेट जाती, लेकिन उन नजरों की याद से शरीर में एक हल्की सी गर्माहट दौड़ती, जो मैं खुद से छुपाती।

एक शाम, जब सूरज डूबने लगा था और आसमान नारंगी रंग में रंगा था, मैं खेत से घास की भारी पोटली सिर पर रखकर लौट रही थी, पसीने से भीगी साड़ी शरीर से चिपकी हुई, हवा ठंडी हो रही थी लेकिन मेरी सांसें तेज, रास्ता सुनसान था, सिर्फ दूर से कुत्तों की भौंकने की आवाजें आ रही थीं, पेट्रोल पंप के पास पहुंची तो राजू बाहर खड़ा था, उसकी मुस्कान में एक अजीब सी चमक थी, वो बोला कि दीदी, थक गई होंगी, पानी पी लो, मैं पहले तो मना करने लगी क्योंकि गांव की औरतें अजनबियों से बात नहीं करतीं, लेकिन प्यास इतनी थी कि मैं रुक गई, वो मुझे अंदर ले गया जहां मनोज और विक्रम भी थे, पंप का कमरा छोटा सा, तेल की गंध भरी हुई, दीवारों पर कैलेंडर लगे, और एक पंखा धीरे-धीरे घूम रहा था, उन्होंने मुझे पानी दिया, लेकिन उनकी नजरें मेरे आम पर टिकीं जो साड़ी के नीचे से उभर रहे थे, मैं शर्मा गई, लेकिन मन में एक अनकही आकर्षण की शुरुआत हो रही थी, जैसे वो नजरें मुझे छू रही हों, मैंने जल्दी से पानी पिया और जाने लगी, लेकिन राजू ने कहा कि शाम हो गई, अंधेरा है, हम छोड़ आएंगे, मैं झिझकी लेकिन हां कह दिया क्योंकि रास्ता अकेला डरावना लगता था।

वे तीनों मुझे साथ लेकर चले, लेकिन रास्ते में उन्होंने बातें शुरू कीं, राजू ने कहा कि आप कितनी मेहनती हैं, रोज देखते हैं आपको, मनोज ने हंसकर कहा कि आपके जैसे कोई नहीं गांव में, उनकी बातों में एक छिपी हुई चाहत थी जो मेरे मन को उलझा रही थी, हम खेतों के बीच पहुंचे जहां घास की खुशबू फैली थी, पक्षी घर लौट रहे थे, और दूर से गांव की लाइट्स चमक रही थीं, विक्रम ने मेरी पोटली उतार ली और कहा कि आराम करो, मैं बैठ गई, लेकिन他们的 स्पर्श जब पोटली उतारते समय मेरे कंधे से हुआ, तो शरीर में एक सिहरन दौड़ी, मैं खुद को रोकना चाहती थी क्योंकि घर में पति इंतजार कर रहा होगा, नैतिक द्वंद्व था कि ये गलत है, लेकिन उनकी निकटता से मन नहीं मान रहा था, राजू करीब आया, उसकी सांसें मेरे चेहरे पर महसूस हो रही थीं, वो बोला कि आप अकेली क्यों इतनी मेहनत करती हो, हम मदद कर सकते हैं, उसकी आंखों में वो आकर्षण था जो मुझे खींच रहा था, मैंने नजरें नीचे कीं लेकिन दिल की धड़कनें तेज हो गईं।

खेत की नरम मिट्टी पर बैठे हम बातें करने लगे, मनोज ने मेरे हाथ पकड़ा और कहा कि आपके हाथ कितने नरम हैं, इतनी मेहनत के बाद भी, स्पर्श से मेरे शरीर में गर्मी फैलने लगी, विक्रम पीछे से आया और मेरे कंधों पर हाथ रखा, मालिश करने लगा, मैं मना करने लगी कि ये नहीं, घर जाना है, लेकिन उनकी गंध, पसीने और तेल की मिली हुई, मुझे एक नशे में डाल रही थी, राजू ने धीरे से मेरे चेहरे को ऊपर किया और रस चूसना शुरू किया, उसके होंठों की नरमी जैसे कोई मीठा फल हो, मैं पहले तो पीछे हटी क्योंकि झिझक थी, गांव की इज्जत का डर, लेकिन फिर उसकी जीभ मेरी जीभ से छू गई, और मैं खुद को रोक नहीं पाई, मन में उलझन थी कि ये पाप है, लेकिन शरीर की चाहत मजबूत हो रही थी, उनके हाथ मेरी साड़ी पर सरकने लगे, आम को छूते हुए, तरबूज की नरमी महसूस करते, अंगूर सख्त हो गए थे, मैं कराह उठी लेकिन बोली कि रुक जाओ, कोई देख लेगा, लेकिन खेत सुनसान था, सिर्फ हवा की सरसराहट और हमारी सांसों की ध्वनियां।

धीरे-धीरे अनिच्छा कम होने लगी, राजू ने मुझे लिटा दिया, मैं लेटी थी पीठ के बल, घास की पोटली बगल में, वो मेरे ऊपर झुका, मनोज और विक्रम बगल में बैठे, राजू ने मेरी साड़ी ऊपर सरकाई, मेरे पैरों के बीच आया, हाथ से खाई को छुआ जो पहले से गीली हो रही थी, झाड़ी हल्की-हल्की छू रही थी, मैं सिहर उठी, बोली कि नहीं, लेकिन मेरे हाथ उसके बालों में उलझ गए, विक्रम ने मेरे आम पर रस चूसना शुरू किया, अंगूर को मुंह में लेकर चूसा, मनोज मेरे पिछवाड़ा पर हाथ फेर रहा था, गोल और भारी महसूस करते, मैं खुद को रोकना चाहती थी लेकिन आकर्षण इतना बढ़ गया था कि रुकना मुश्किल हो रहा था, राजू ने अपनी पैंट खोली, केला सख्त और लंबा निकाला, उसे खाई पर रगड़ा, मैं कराह रही थी, दर्द और मजा का मिश्रण, फिर धीरे से खुदाई शुरू की, मैं लेटी थी, वो ऊपर, धक्के देते हुए, हाथ मेरे तरबूज पर, मनोज और विक्रम बारी-बारी से शामिल हो रहे थे, एक ने गाजर निकाला और मेरे मुंह में डाला, रस चूसने को कहा, मैं चूस रही थी, दूसरा मेरे बगीचा पर हाथ फेर रहा था, फैला हुआ क्षेत्र गहरा महसूस करते।

खुदाई की रिदम बढ़ी, राजू तेज हो गया, मेरे शरीर की कांपन से रस निकलना होने लगा, जैसे फल पक कर रस छोड़ रहा हो, वो भी साथ में रस निकाला, फिर मनोज की बारी आई, मैं अब साइड पर लेटी, वो पीछे से आया, पिछवाड़ा पर हाथ रखकर खुदाई की, विक्रम सामने से रस चूसना कर रहा था, खेत की मिट्टी हमारे शरीर पर लग रही थी, गंध मिट्टी, पसीने और फलों की रसीली खुशबू मिलकर एक नशा पैदा कर रही थी, मैं कराह रही थी, कभी दर्द से, कभी मजा से, लेकिन मन में अब कोई द्वंद्व नहीं था, चाहत ने सब कुछ ढक लिया था, विक्रम ने मुझे घुटनों पर बिठाया, मैं घुटनों पर थी, वो सामने खड़ा, केला मेरे मुंह में, रस चूसते हुए, मनोज नीचे से खाई में उंगली डाल रहा था, फिर विक्रम ने मुझे लिटाया और खुदाई की, तेज धक्के, मेरे हाथ उसके पीठ पर, नाखून गड़ाते, अंत में सबका रस निकलना हुआ, हम लेटे रहे, सांसें तेज, खेत की ठंडी हवा शरीर को छू रही थी, लेकिन मन में एक संतुष्टि थी जो शब्दों में नहीं आ सकती, हालांकि बाद में घर लौटते हुए थोड़ी गिल्ट थी, लेकिन वो शाम अपरिहार्य लग रही थी।

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