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प्यासी चाची की चु@@ई


प्यासी चाची की चु@@ई—>

मई की वह तपती हुई दुपहरी थी जब सूरज की किरणें आंगन में आग उगल रही थीं और घर के सारे लोग किसी रिश्तेदार की शादी में गए हुए थे। कबीर जो अभी हाल ही में अपनी ग्रेजुएशन पूरी कर शहर से लौटा था, ड्राइंग रूम में सोफे पर लेटा हुआ पंखे की धीमी हवा में सुस्ता रहा था। घर में सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी कान के पास गूँज रही थी, तभी उसे रसोई से बर्तनों के टकराने की हल्की आवाज़ आई। उसने देखा कि उसकी जवान चाची सरिता, जो केवल बत्तीस साल की थीं, पसीने से तर-बतर होकर फ्रिज से पानी की बोतल निकाल रही थीं। सरिता चाची का व्यक्तित्व हमेशा से ही कबीर के लिए एक पहेली रहा था, उनकी गेंहुई रंगत और गहरी आँखें जैसे किसी शांत झील की तरह थीं जिनमें एक अनकही प्यास छिपी हुई थी।

सरिता चाची ने आज एक महीन सूती साड़ी पहनी हुई थी जो पसीने के कारण उनके बदन से चिपक गई थी, जिससे उनके शरीर का हर उभार साफ झलक रहा था। उनके सीने पर कसे हुए ब्लाउज के भीतर कैद दो भारी तरबूज अपनी जगह बनाने के लिए छटपटा रहे थे और साड़ी के पतले कपड़े से उनके मटर जैसे उभार साफ दिखाई दे रहे थे जो ठंडक की तलाश में अकड़ गए थे। कबीर की नज़रें उनकी पतली कमर और भारी पिछवाड़े पर टिक गई थीं जो साड़ी के घेरे में एक कामुक गोलाई बना रहे थे। उनके चलने के साथ ही उनके तरबूज हल्की सी थरथराहट के साथ हिल रहे थे, जिसने कबीर के शरीर में एक अजीब सी बिजली दौड़ा दी थी। कबीर ने महसूस किया कि उसका खीरा उसकी पैंट के अंदर करवटें लेने लगा है और उसमें एक जान आ गई है जो बाहर निकलने को बेताब थी।

दोनों के बीच हमेशा से एक सम्मानजनक रिश्ता था, लेकिन पिछले कुछ दिनों से उनकी आँखों में एक अलग तरह की चमक और बातों में एक अनकही गहराई महसूस होने लगी थी। कबीर ने हिम्मत जुटाकर रसोई की तरफ कदम बढ़ाए और चाची के ठीक पीछे जाकर खड़ा हो गया, उनकी खुशबू ने उसके दिमाग को सुन्न कर दिया था। सरिता चाची जैसे ही पलटीं, वे कबीर को इतना करीब पाकर चौंक गईं, उनकी साँसें तेज़ हो गईं और उनके तरबूजों की धड़कनें कबीर की छाती को महसूस होने लगीं। कमरे में अचानक गर्मी बढ़ गई थी और दोनों के बीच की खामोशी अब शब्दों से ज्यादा भारी लग रही थी, जहाँ चाहत और झिझक का एक बड़ा युद्ध चल रहा था। कबीर ने देखा कि चाची की आँखों में डर नहीं बल्कि एक पुरानी तड़प थी जो शायद बरसों से दबी हुई थी।

कबीर ने धीरे से अपना हाथ चाची की नंगी कमर पर रखा, जहाँ पसीने की बूंदें अभी भी चमक रही थीं, उसके स्पर्श ने सरिता चाची के शरीर में एक सिहरन पैदा कर दी। चाची ने एक हल्की सी कराह भरी और अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वे इस स्पर्श का सालों से इंतज़ार कर रही हों, उनका शरीर कबीर की तरफ झुकने लगा। कबीर ने अपनी उंगलियों को उनकी कमर पर घुमाते हुए उन्हें अपनी ओर और कसकर खींच लिया, जिससे उनके मुलायम तरबूज कबीर की सख्त छाती से दब गए। सरिता चाची की भारी साँसें कबीर की गर्दन पर गरम हवा की तरह लग रही थीं, जिससे उसका खीरा अब पूरी तरह से पत्थर की तरह सख्त होकर पैंट की चैन को फाड़ने पर उतारू था। कबीर ने उनके कान के पास जाकर धीरे से फुसफुसाया, ‘चाची, आप आज बहुत सुंदर लग रही हैं’, और उनके कान की लौ को अपने होंठों से सहलाने लगा।

सरिता चाची ने कांपते हुए हाथों से कबीर के बालों को पकड़ा और उसे अपने करीब खींच लिया, उनकी झिझक अब धीरे-धीरे पिघलती हुई इच्छा की आग में तब्दील हो रही थी। उन्होंने धीमे से कहा, ‘कबीर, यह गलत है… कोई आ जाएगा’, लेकिन उनके शब्दों में मनाही कम और समर्पण ज्यादा था। कबीर ने उनके ब्लाउज के हुक धीरे-धीरे खोलने शुरू किए और जैसे ही कपड़ा सरका, उनके दूधिया सफेद तरबूज आज़ाद होकर बाहर निकल आए। उनके मटर एकदम लाल और सख्त थे, जिन्हें देखकर कबीर से रहा नहीं गया और उसने एक मटर को अपने मुंह में भर लिया। चाची के मुंह से एक लंबी आह निकली और उन्होंने कबीर का सिर अपने सीने पर कस लिया, उनकी उंगलियां कबीर की पीठ पर निशान बना रही थीं।

माहौल अब पूरी तरह से कामुक हो चुका था, कबीर ने चाची को उठाकर पास की मेज पर बैठा दिया और उनकी साड़ी के पल्लू को पूरी तरह हटा दिया। अब चाची की गहरी खाई कबीर के सामने थी, जो पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और उस खाई के आसपास के काले बाल पसीने से भीगे हुए थे। कबीर ने अपना खीरा पैंट से बाहर निकाला, जो अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ चाची के सामने तनकर खड़ा था, उसे देख चाची की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने अपनी उंगलियों से खीरे की टोपी को छुआ और उसे महसूस किया, फिर धीरे-धीरे उसे अपने गुलाबी होंठों के बीच ले लिया। चाची का खीरा चूसना इतना आनंददायक था कि कबीर के पैर कांपने लगे और उसे लगा कि उसका रस अभी निकल जाएगा।

कबीर ने चाची को बिस्तर पर लेटाया और उनकी दोनों टांगों को फैलाकर उनकी खाई के मुहाने पर अपना खीरा टिका दिया, जो गर्मी और नमी से लबालब था। उसने अपनी खाई में उंगली डालकर देखा तो पाया कि चाची पूरी तरह से तैयार थीं, उनकी खाई से निकलता हुआ चिकना रस कबीर की उंगलियों को सराबोर कर रहा था। कबीर ने अपनी कमर को एक झटका दिया और अपना आधा खीरा चाची की तंग खाई के अंदर धकेल दिया, जिससे चाची ने एक दर्द और मजे भरी चीख मारी। चाची ने कबीर की पीठ को अपनी नाखूनों से खुरच दिया और अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, उनकी तंग खाई कबीर के खीरे को चारों तरफ से जकड़ रही थी। कबीर कुछ पल के लिए रुक गया ताकि चाची इस नए अहसास को अपने अंदर समा सकें और उनकी साँसें स्थिर हो सकें।

धीरे-धीरे कबीर ने अपनी कमर चलानी शुरू की, वह अंदर-बाहर की लंबी और गहरी खुदाई कर रहा था, हर धक्के के साथ चाची के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे। कमरे में थप-थप की आवाज़ गूँजने लगी और दोनों के शरीर से निकलता पसीना उन्हें एक-दूसरे से चिपका रहा था, खुदाई की आवाज़ और चाची की कराहें मिलकर एक संगीत बना रही थीं। चाची अब खुद भी अपनी कमर ऊपर उठाकर कबीर का साथ दे रही थीं, उन्हें बरसों बाद वह सुख मिल रहा था जिसकी उन्हें तलाश थी। कबीर ने अब चाची को उल्टा घुमाया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, यह नया कोण चाची को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रहा था। उनका पिछवाड़ा कबीर के धक्कों से लाल हो चुका था, लेकिन वे रुकने का नाम नहीं ले रही थीं, बल्कि और तेज़ खुदाई की मांग कर रही थीं।

खुदाई की गति अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी, कबीर का खीरा चाची की खाई की गहराइयों को नाप रहा था और चाची पागलों की तरह कबीर का नाम पुकार रही थीं। कबीर ने चाची के दोनों तरबूजों को अपने हाथों में जकड़ लिया और उन्हें बुरी तरह मसलते हुए अपनी खुदाई को और भी आक्रामक बना दिया। चाची के शरीर में एक अजीब सी थरथराहट होने लगी, उनकी आँखें ऊपर की तरफ चढ़ गईं और उनकी खाई की दीवारें कबीर के खीरे को कसने लगीं। ‘कबीर… मैं जा रही हूँ… आह… निकाल दो अपना सारा प्यार मेरे अंदर…’ चाची चिल्लाईं और उनका रस छूटने लगा। उसी समय कबीर ने भी अपने खीरे के आखिरी झटके दिए और अपना गरम गाढ़ा रस चाची की खाई की गहराइयों में छोड़ दिया, जिससे दोनों को स्वर्ग जैसा सुख महसूस हुआ।

खुदाई खत्म होने के बाद दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़ गए, उनकी साँसें अभी भी तेज़ थीं और शरीर पसीने से लथपथ थे। कबीर ने चाची के माथे को चूमा और उन्हें अपनी बाहों में समेट लिया, सरिता चाची के चेहरे पर एक अजीब सा सुकून और संतोष था जो उन्होंने पहले कभी नहीं महसूस किया था। वे दोनों बिना कुछ बोले बस एक-दूसरे की धड़कनों को सुन रहे थे, उस दोपहर की गर्मी अब उनके शरीर की गर्मी के सामने फीकी पड़ गई थी। कबीर को महसूस हुआ कि यह केवल जिस्मानी सुख नहीं था, बल्कि दो तन्हा रूहों का एक-दूसरे से मिलन था जिसने उनकी सारी दूरियाँ मिटा दी थीं। साड़ी के बिखरे हुए टुकड़े और बिस्तर की सिलवटें उस गहन और भावुक खुदाई की गवाह थीं जो अभी-अभी शांत हुई थी।

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