गर्मी की वो दोपहर आज भी मेरे ज़हन में ताज़ा है जब मैं अपनी मासी मीरा के घर पहुँचा था। मीरा मासी की उम्र कोई 38 साल रही होगी, लेकिन उनका शरीर किसी 20 साल की जवान लड़की को मात देता था। उनकी बनावट ऐसी थी कि कोई भी उन्हें एक बार देख ले तो बस देखता ही रह जाए। उस दिन उन्होंने एक हल्की गुलाबी रंग की सूती साड़ी पहनी थी, जो उनके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को बड़ी बेरहमी से बयां कर रही थी। जब वो चलती थीं, तो उनके पीछे का भारी और गोल पिछवाड़ा इस कदर हिलता था कि मेरा मन विचलित हो जाता था। उनके तरबूज साड़ी के ब्लाउज को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे, और जब भी वो झुकतीं, तो उनके तरबूजों की वो गहरी घाटी साफ़ नज़र आती थी जिसे देखकर मेरा गला सूखने लगता था।
मीरा मासी के चेहरे पर हमेशा एक अजीब सी कशिश रहती थी, उनकी बड़ी-बड़ी आँखें और भरे हुए होंठ जैसे कोई अनकही दास्तां सुनाते थे। उनके शरीर का आकार बहुत ही सुडौल था, जैसे किसी मूर्तिकार ने बड़ी फुर्सत से उन्हें गढ़ा हो। उनके लंबे काले बाल जब उनकी कमर पर लहराते थे, तो वो नज़ारा किसी जन्नत से कम नहीं लगता था। उनकी कमर इतनी पतली थी कि कोई भी अपनी दोनों हथेलियों में भर ले, लेकिन उनके कूल्हे और पिछवाड़ा उतने ही भरे हुए और मांसल थे। मैं अक्सर उन्हें छुप-छुप कर देखा करता था, खासकर जब वो किचन में काम करती थीं और पसीने की बूंदें उनकी गर्दन से होते हुए उनके तरबूजों के बीच समा जाती थीं।
उस दिन घर में कोई नहीं था, और बाहर लू चल रही थी। हम दोनों हॉल में बैठे कूलर की हवा ले रहे थे। बातों-बातों में मुझे अहसास हुआ कि मासी आज कुछ ज़्यादा ही भावुक हो रही थीं। उन्होंने बताया कि कैसे वो अपनी ज़िंदगी में अकेलापन महसूस करती हैं और कैसे उनके पति उन्हें समय नहीं दे पाते। उनकी आँखों में नमी थी और आवाज़ में एक थरथराहट। मैंने सांत्वना देने के लिए उनका हाथ थाम लिया। जैसे ही मेरा हाथ उनकी मखमली त्वचा से टकराया, मेरे पूरे शरीर में एक करंट सा दौड़ गया। उनके हाथ बहुत कोमल थे, और उनकी गर्मी मेरी हथेलियों में महसूस हो रही थी। हम दोनों की नज़रें मिलीं और उस पल में जैसे वक्त ठहर गया।
वो आकर्षण इतना प्रबल था कि झिझक के सारे बांध टूटते नज़र आ रहे थे। मेरा मन कह रहा था कि ये गलत है, वो मेरी मासी हैं, लेकिन मेरा शरीर उनकी खुशबू और उनकी नज़दीकी के वश में था। उनके शरीर से सौंधी सी खुशबू आ रही थी जो मुझे पागल कर रही थी। मेरा खीरा पैंट के अंदर ही अंगड़ाई लेने लगा था और अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा था। मासी ने भी अपना हाथ नहीं हटाया, बल्कि उन्होंने अपनी उंगलियों को मेरी उंगलियों में फंसा लिया। उनके चेहरे पर शर्म की एक लाली छा गई थी, लेकिन उनकी आँखों में एक गहरी प्यास साफ़ झलक रही थी।
झिझक और मन के संघर्ष के बीच मैंने धीरे से अपना हाथ उनकी कमर पर रखा। उन्होंने एक लंबी सांस ली और अपनी आँखें मूंद लीं। मेरा हाथ धीरे-धीरे ऊपर की ओर सरकने लगा और मैंने उनके रेशमी तरबूजों को सहलाना शुरू किया। जैसे ही मेरी उंगलियों ने उनके ब्लाउज के ऊपर से उनके मटर जैसे उभारों को छुआ, मासी के मुंह से एक दबी हुई आह निकली। वो पूरी तरह से कांप उठी थीं। मैंने उन्हें अपनी ओर खींच लिया और हमारे होंठ एक-दूसरे में उलझ गए। वो चुंबन इतना गहरा था कि जैसे हम एक-दूसरे की आत्मा को पी जाना चाहते हों। उनके होंठों का स्वाद किसी शहद जैसा मीठा था।
धीरे-धीरे उत्तेजना बढ़ने लगी। मैंने उनके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोल दिए। जैसे ही ब्लाउज खुला, उनके विशाल और गोरे तरबूज आज़ाद होकर मेरे सामने आ गए। उनके ऊपर के मटर के दाने जैसे उभरे हुए हिस्से ठंडक और उत्तेजना से सख्त हो गए थे। मैंने अपनी जीभ से उनके मटर को सहलाना शुरू किया और फिर उन्हें अपने मुंह में भर लिया। मासी बेतहाशा कराहने लगीं और मेरा सिर अपने सीने से और ज़ोर से सटा लिया। वो बार-बार मेरा नाम पुकार रही थीं। उनके शरीर का पसीना अब हमारे बीच एक चिकनाहट पैदा कर रहा था, जिससे हर स्पर्श और भी ज़्यादा कामुक हो गया था।
मैंने उनकी साड़ी और पेटीकोट को भी धीरे से नीचे खिसका दिया। अब वो मेरे सामने पूरी तरह से प्राकृतिक अवस्था में थीं। उनकी खाई घने और काले बालों से ढकी हुई थी, जो बहुत ही मोहक लग रही थी। मैंने अपना हाथ नीचे ले जाकर उनकी खाई को सहलाना शुरू किया। उनकी खाई पहले से ही पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहां से एक मादक गंध आ रही थी। मैंने अपनी उंगली से उनकी खाई के अंदर गहराई तक खोदना शुरू किया। मासी अपनी कमर ऊपर उठाने लगीं और उनके मुंह से निकलने वाली सिसकारियां अब तेज़ होने लगी थीं। वो पूरी तरह से कामदेव के वश में थीं।
अब मुझसे और सब्र नहीं हो रहा था। मैंने अपने कपड़े उतारे और मेरा सख्त और लंबा खीरा उनके सामने तनकर खड़ा हो गया। उसे देखकर मासी की आँखें फैल गईं। उन्होंने अपने कांपते हाथों से मेरे खीरे को थाम लिया और उसे सहलाने लगीं। फिर उन्होंने धीरे से अपना मुंह खोला और मेरे खीरे के ऊपरी हिस्से को चूसना शुरू किया। वो अहसास इतना जबरदस्त था कि मुझे लगा मेरा रस अभी निकल जाएगा। लेकिन मैंने खुद को संभाला। मैंने उन्हें बेड पर लिटाया और उनके पैरों को फैलाकर उनके बीच में आ गया। अब समय था असली खुदाई का।
मैंने अपने खीरे की नोक को उनकी गीली खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से अंदर की ओर दबाव डाला। जैसे ही मेरा खीरा उनकी संकरी खाई के अंदर प्रवेश करने लगा, मासी ने ज़ोर से मेरी पीठ में अपने नाखून गड़ा दिए। उनकी खाई बहुत तंग थी, लेकिन उनके रस ने उसे चिकना बना दिया था। मैंने एक लंबा धक्का मारा और मेरा पूरा खीरा उनकी खाई की गहराई तक समा गया। मासी के मुंह से एक चीख निकली, जो दर्द की नहीं बल्कि असीम सुख की थी। हम दोनों एक लय में आ गए थे। मैंने सामने से खोदना शुरू किया, हर धक्के के साथ मेरे तरबूज उनके सीने से टकरा रहे थे।
कमरे में सिर्फ हमारे जिस्मों के टकराने की आवाज़ और भारी सांसें गूंज रही थीं। मैंने उनकी पोजीशन बदली और उन्हें घुटनों के बल किया। अब मैं उनके पिछवाड़े से खोदने लगा। ये पोजीशन बहुत ही गहरी थी और मेरा खीरा उनकी खाई की हर दीवार को छू रहा था। मासी पागल हो रही थीं, वो बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींच रही थीं। “ओह रोहन… और तेज़… मुझे पूरी तरह से खोद दो…” उनके ये शब्द मुझे और भी उत्तेजित कर रहे थे। धक्कों की रफ़्तार बढ़ती गई। पसीना हमारे शरीरों से बहकर एक हो रहा था।
तभी मुझे लगा कि मेरा बांध टूटने वाला है। मासी का शरीर भी बुरी तरह से कांपने लगा था। उनकी खाई मेरे खीरे को ज़ोर-ज़ोर से जकड़ रही थी। उन्होंने ज़ोर से चिल्लाते हुए अपना रस छोड़ना शुरू किया और ठीक उसी पल मेरा खीरा भी उनके अंदर गर्म रस की फुहारें छोड़ने लगा। वो अहसास इतना दिव्य था कि हम दोनों कई मिनटों तक एक-दूसरे से चिपके रहे। पूरे कमरे में शांति छा गई थी, बस हमारी तेज़ धड़कनें सुनाई दे रही थीं। मेरा खीरा अभी भी उनकी खाई के अंदर ही था, जैसे वो वहां से निकलना ही न चाहता हो।
खुदाई खत्म होने के बाद की वो फीलिंग बहुत ही सुकून देने वाली थी। मासी मेरे सीने पर सिर रखकर लेटी हुई थीं और मैं उनके बालों से खेल रहा था। उनके चेहरे पर एक अजीब सी शांति और संतुष्टि थी। हमारा वो रिश्ता अब एक नए मोड़ पर था, जहाँ शर्म और झिझक की जगह एक गहरा शारीरिक और भावनात्मक लगाव ले चुका था। हम दोनों जानते थे कि ये दोपहर हमारे जीवन की सबसे यादगार दोपहर बन चुकी थी। धीरे-धीरे शाम ढलने लगी थी, लेकिन उस कमरे की गर्मी अभी भी बरकरार थी, जो हमें फिर से एक नई खुदाई के लिए उकसा रही थी।