लिफ्ट में कविता की चु@@ई—>
मई की उस तपती हुई दोपहर में जब सारा शहर उमस की चादर ओढ़े हुए था, समीर अपने दफ्तर से थका-हारा घर लौट रहा था। जैसे ही उसने अपनी सोसाइटी की लिफ्ट में कदम रखा, उसने देखा कि उसके पड़ोस में हाल ही में रहने आई कविता भी वहां खड़ी थी। कविता ने एक गहरे नीले रंग की पतली शिफॉन की साड़ी पहन रखी थी, जिसका गला काफी गहरा था। समीर ने देखा कि उमस के कारण कविता के माथे पर पसीने की नन्ही बूंदें चमक रही थीं और उसकी सांसें कुछ तेज चल रही थीं। लिफ्ट का दरवाजा बंद हुआ और दोनों एक अनजानी सी खामोशी में एक-दूसरे के बगल में खड़े हो गए, लेकिन समीर की नजरें बार-बार कविता के उभरे हुए अंगों की ओर जा रही थीं।
कविता के शरीर की बनावट किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी। उसकी साड़ी के नीचे से उसके भारी और रसीले तरबूज साफ झलक रहे थे, जो उसकी हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। समीर ने गौर किया कि उमस की वजह से ब्लाउज उसके बदन से चिपक गया था, जिससे उसके मटर और भी ज्यादा उभर कर सामने आ गए थे। कविता का रंग साफ था और उसकी कमर की गोलाई किसी को भी दीवाना बनाने के लिए काफी थी। समीर को अपने शरीर में एक अजीब सी हलचल महसूस होने लगी, उसका खीरा धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा था। कविता ने शायद समीर की नजरों को महसूस कर लिया था, क्योंकि उसने अपनी साड़ी के पल्लू को थोड़ा और ठीक करने की कोशिश की, जिससे उसके बदन की खुशबू और भी ज्यादा फैल गई।
अचानक एक झटके के साथ लिफ्ट रुक गई और सारी लाइटें बंद हो गईं। अंधेरा इतना घना था कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। कविता के मुंह से एक दबी हुई चीख निकली और वह डर के मारे समीर के करीब आ गई। समीर ने उसे सहारा देने के लिए उसके कंधों पर हाथ रखा, तो उसे कविता के रेशमी बदन की गर्माहट का एहसास हुआ। दोनों की सांसें अब एक-दूसरे के चेहरों पर टकरा रही थीं। कविता की घबराहट धीरे-धीरे एक अलग तरह के तनाव में बदलने लगी थी। समीर ने धीरे से कहा, ‘घबराइए मत कविता जी, शायद पावर कट हुआ है, अभी ठीक हो जाएगा।’ लेकिन कविता का दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि समीर को वह अपनी छाती पर महसूस हो रहा था, जहां उसके नरम तरबूज दब रहे थे।
उस घने अंधेरे में डर और आकर्षण का एक अनोखा मेल बन रहा था। समीर ने महसूस किया कि कविता ने उसे कसकर पकड़ लिया है। उसके हाथों का स्पर्श समीर के बदन में बिजली की लहरें दौड़ा रहा था। समीर का हाथ धीरे से फिसलकर कविता की नंगी कमर पर जा टिका। वहां की त्वचा मखमल जैसी नरम और पसीने से हल्की नम थी। कविता ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वह और भी ज्यादा समीर के करीब आ गई। समीर ने झुककर कविता के कान के पास धीरे से फुसफुसाया, जिससे कविता के पूरे शरीर में एक कंपकंपी छूट गई। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी जो उस धुंधले अंधेरे में भी समीर को अपनी ओर खींच रही थी।
समीर ने अपनी झिझक छोड़ते हुए कविता के चेहरे को अपने हाथों में लिया। कविता की सांसें अब अनियंत्रित हो चुकी थीं। समीर ने धीरे-धीरे अपने होंठ कविता के होंठों की ओर बढ़ाए और जैसे ही दोनों के पंखुड़ियों का संगम हुआ, मानो समय थम गया हो। यह स्पर्श इतना गहरा और भावुक था कि दोनों के बीच की सारी दीवारें गिर गईं। समीर ने महसूस किया कि कविता भी उसी तीव्रता के साथ उसे जवाब दे रही है। समीर का एक हाथ अब कविता के ब्लाउज के ऊपर से उसके भारी तरबूजों को सहलाने लगा था, जिससे कविता के मुंह से एक मध़ुर कराह निकली। वह समीर के बालों में अपनी उंगलियां फंसाकर उसे और भी करीब खींचने लगी।
धीरे-धीरे समीर के हाथ कविता के बदन पर और भी ज्यादा साहसी होने लगे। उसने साड़ी के पल्लू को कंधे से नीचे गिरा दिया और उसके नरम तरबूजों को आजाद कर दिया। अंधेरे में भी समीर को उन मटरों का कड़ापन महसूस हो रहा था। उसने झुककर एक मटर को अपने मुंह में लिया और उसे धीरे-धीरे चूसने लगा। कविता की सिसकियां अब लिफ्ट की खामोशी को चीर रही थीं। वह अपनी पीठ को मोड़कर समीर को और भी ज्यादा मौका दे रही थी। समीर ने अपने हाथ नीचे ले जाकर कविता की रेशमी खाई को छुआ, जो पहले से ही अपने रस से पूरी तरह भीग चुकी थी। वहां के मुलायम बाल समीर की उंगलियों में फंस रहे थे, जिससे उत्तेजना और भी बढ़ गई थी।
कविता अब पूरी तरह से नियंत्रण खो चुकी थी। उसने समीर की पैंट की चेन खोली और उसके उफनते हुए खीरे को बाहर निकाल लिया। जब उसके कोमल हाथों ने उस गर्म और कड़े खीरे को छुआ, तो समीर के मुंह से एक आह निकल गई। कविता ने बिना देर किए उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे बड़ी गहराई से चूसने लगी। समीर को ऐसा लग रहा था मानो वह स्वर्ग के द्वार पर खड़ा हो। कविता की जीभ जिस तरह से खीरे के साथ खेल रही थी, उससे समीर का रस निकलने ही वाला था, लेकिन उसने खुद को काबू में रखा क्योंकि वह अभी उस असली आनंद को महसूस करना चाहता था जिसे खुदाई कहते हैं।
समीर ने कविता को लिफ्ट की दीवार के सहारे खड़ा किया और उसकी टांगों को ऊपर उठाकर अपने कंधों पर रख लिया। उसने अपने कड़े खीरे की नोक को कविता की गीली और तंग खाई के मुहाने पर रखा। कविता ने अपनी आंखें बंद कर लीं और समीर को अंदर आने का इशारा दिया। समीर ने एक जोरदार धक्का दिया और उसका पूरा खीरा कविता की तंग खाई के अंदर समा गया। कविता के मुंह से एक ऊंची कराह निकली और उसने समीर को कसकर जकड़ लिया। वह पहली बार की उस गहराई को महसूस कर रही थी जो उसे अंदर तक हिला रही थी। समीर ने धीरे-धीरे अपनी कमर हिलाना शुरू किया, और लिफ्ट के अंदर खुदाई का वह सिलसिला शुरू हो गया।
खुदाई की गति धीरे-धीरे बढ़ने लगी। समीर के हर धक्के के साथ कविता के तरबूज जोर-जोर से उछल रहे थे और उसकी सिसकियां तेज होती जा रही थीं। समीर ने कविता को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने की स्थिति में ला दिया। कविता ने लिफ्ट की रेलिंग को पकड़ लिया और अपना पिछवाड़ा समीर की ओर तान दिया। समीर ने पीछे से अपने खीरे को फिर से खाई के अंदर डाला और पूरी ताकत से खोदना शुरू किया। लिफ्ट में केवल उनके शरीरों के टकराने की आवाज और उनकी भारी सांसें सुनाई दे रही थीं। कविता चिल्ला रही थी, ‘और तेज समीर, मुझे पूरी तरह से भर दो!’ समीर का हर प्रहार कविता को आनंद के चरम की ओर ले जा रहा था।
काफी देर तक चली इस जबरदस्त खुदाई के बाद, दोनों अपने चरम पर पहुंचने वाले थे। समीर ने अपनी गति और भी तेज कर दी और कविता की खाई के अंदर अपने खीरे को पूरी गहराई तक धकेल दिया। कविता का शरीर जोर-जोर से कांपने लगा और उसकी खाई से भारी मात्रा में रस छूटने लगा। ठीक उसी पल समीर का भी बांध टूट गया और उसने अपना सारा गर्म रस कविता की गहराईयों में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए फर्श पर बैठ गए, पसीने से लथपथ और हाफते हुए। उस पल की शांति में एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव महसूस हो रहा था। कुछ देर बाद लिफ्ट की लाइट जल उठी और लिफ्ट चलने लगी, लेकिन समीर और कविता के बीच वह रिश्ता हमेशा के लिए बदल चुका था।