समीर और अवनी का मौन अनुराग—>
समीर और अवनी के विवाह को दो वर्ष बीत चुके थे, परंतु उनके बीच का रिश्ता आज भी उस पुराने संदूक की तरह था जिसमें कीमती रेशमी वस्त्र तो रखे थे, पर उनकी महक अभी बाहर नहीं आई थी। वे दोनों एक ही छत के नीचे रहते, एक-दूसरे का सम्मान करते और अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा के साथ निभाते, लेकिन उनके संवाद अक्सर केवल ‘जी’ और ‘हाँ’ तक ही सीमित होकर रह गए थे। समीर एक शांत स्वभाव का गंभीर आर्किटेक्ट था, जिसकी दुनिया नक्शों और इमारतों के गणितीय समीकरणों के बीच सिमटी हुई थी, जबकि अवनी एक संवेदनशील लेखिका और इतिहासकार थी, जो खामोशियों को पढ़ने का हुनर बखूबी जानती थी, फिर भी वह समीर की आंखों में छिपे अनकहे रहस्यों को स्पर्श करने से हमेशा हिचकिचाती रही थी। उनके बीच का यह सन्नाटा किसी कड़वाहट की वजह से नहीं, बल्कि एक अजीब सी गरिमामय झिझक के कारण था, जिसने उन्हें एक-दूसरे के बेहद करीब होते हुए भी कोसों दूर कर रखा था।
शहर के शोर-शराबे से दूर, उनकी पुश्तैनी हवेली में बिताया जाने वाला यह मानसून उनके रिश्ते के लिए एक नया मोड़ लेकर आने वाला था, जिसका आभास शायद उन दोनों को भी नहीं था। हवेली की विशाल खिड़कियों से जब बारिश की बूंदें टकरातीं, तो अवनी अक्सर अपनी अधूरी पांडुलिपि लेकर लाइब्रेरी में बैठ जाती, जहाँ समीर पुरानी दीवारों की मरम्मत और उनकी बनावट को फिर से जीवंत करने के काम में व्यस्त रहता था। उस दिन कमरे में फैली पुराने कागज और गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू के बीच एक अजीब सी चुंबकीय ऊर्जा व्याप्त थी, जिसने उन्हें एक-दूसरे की उपस्थिति के प्रति असामान्य रूप से सचेत कर दिया था। समीर ने पहली बार अपने काम से ध्यान हटाकर अवनी को देखा, जो अपनी कलम को होठों पर टिकाए किसी गहरे विचार में डूबी हुई थी, और उसकी पलकों पर ठहरती रोशनी ने उसे एक अद्भुत शांति का अहसास कराया।
समीर ने धीरे से खामोशी को तोड़ते हुए पूछा, ‘क्या तुम इस पुराने घर के बारे में कुछ ऐसा लिख रही हो जो मैं अपनी आंखों से नहीं देख पा रहा, अवनी?’ यह सवाल इतना अप्रत्याशित और कोमल था कि अवनी के हाथ से कलम फिसल गई और उसकी नजरें समीर की गहरी, भूरी आंखों में जा समाईं, जहाँ जिज्ञासा और एक अनकही चाहत का संगम सा प्रतीत हो रहा था। अवनी ने अपनी बिखरी हुई जुल्फों को कान के पीछे हटाते हुए उत्तर दिया, ‘इमारतें केवल पत्थर और चूने की नहीं होतीं समीर, इनमें उन लोगों की सांसें भी कैद होती हैं जो यहाँ कभी रहे थे; मैं बस उन धड़कनों को सुनने की कोशिश कर रही हूँ।’ उसकी आवाज में एक ऐसी गहराई थी जिसने समीर के दिल के किसी बंद कोने पर दस्तक दी, और उसे महसूस हुआ कि वह इतने समय से केवल पत्थरों को देख रहा था, जबकि उसका अपना घर एक जीवंत एहसास की प्रतीक्षा कर रहा था।
उस शाम के बाद उनके बीच बातचीत का सिलसिला जैसे किसी पहाड़ी झरने की तरह धीरे-धीरे बहने लगा, जिसमें बनावटीपन कम और ईमानदारी का स्पर्श अधिक होता चला गया। वे दोनों घंटों लाइब्रेरी के फर्श पर बैठकर पुरानी तस्वीरों और डायरियों के पन्ने पलटते, जहाँ समीर उसे स्थापत्य कला की बारीकियां समझाता और अवनी उसे उन आकृतियों के पीछे छिपी भावनाओं के किस्से सुनाती। एक बार जब समीर किसी पुरानी अलमारी के ऊपरी रैक से एक भारी किताब उतार रहा था, तो अचानक उसका संतुलन बिगड़ा और वह सीधे अवनी के पास जा गिरा, जिससे उसके हाथ अवनी के कंधों पर टिक गए। उस पल समय जैसे ठहर गया था, समीर की गर्म सांसें अवनी के माथे को छू रही थीं और दोनों की धड़कनें उस शांत कमरे में साफ सुनाई दे रही थीं; उस स्पर्श की मासूमियत में एक ऐसी बिजली थी जिसने उनके बीच की सारी दूरियों को पल भर में भस्म कर दिया था।
समीर ने अपना हाथ नहीं हटाया, बल्कि उसकी उंगलियां धीरे से अवनी के गाल को छूते हुए उसके चेहरे पर आए डर और विस्मय के भाव को पढ़ने लगीं, जो अब धीरे-धीरे एक सुखद अहसास में बदल रहा था। उसने बहुत धीमी आवाज में कहा, ‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि किसी के इतना करीब होना इतना सुकूनदेह भी हो सकता है, अवनी, मुझे लगा था कि मैं केवल अकेलेपन में ही शांति पा सकता हूँ।’ अवनी ने अपनी भीगी आँखों से उसे देखा और उसकी कमीज के बटन को धीरे से छूते हुए बोली, ‘अकेलापन कभी शांति नहीं देता समीर, वह बस हमें सुन्न कर देता है; शांति तो उस भरोसे में है जहाँ आप बिना कुछ कहे भी पूरी तरह समझे जाते हों।’ उस रात बारिश और तेज हो गई थी, लेकिन उनके मन की हलचल ने एक ऐसी गर्माहट पैदा कर दी थी जिसने सालों की जमी हुई बर्फ को पिघलाना शुरू कर दिया था।
अगले कुछ दिनों में उनका आकर्षण एक गहरे भावनात्मक जुड़ाव में तब्दील हो गया, जहाँ वे एक-दूसरे की छोटी-छोटी आदतों और पसंद-नापसंद का विशेष ध्यान रखने लगे थे। समीर अब काम से जल्दी घर लौटने लगा था ताकि वह अवनी के साथ चाय पी सके, और अवनी भी उसके लिए वह खास अदरक वाली चाय बनाने लगी थी जिसे पीते समय समीर की आंखों में एक अलग ही चमक आ जाती थी। एक दोपहर जब समीर सोफे पर लेटा हुआ कुछ पढ़ रहा था, अवनी ने बिना कुछ कहे उसके पैरों के पास बैठकर उसके सिर में तेल की मालिश करना शुरू कर दिया। समीर की आँखें बंद हो गईं और उसने अवनी का हाथ पकड़कर अपने दिल पर रख लिया, जैसे वह उसे बताना चाहता हो कि यह धड़कन अब केवल उसी के नाम की माला जप रही है, जो अब किसी औपचारिक रिश्ते की मोहताज नहीं थी।
झिझक के बादल अब पूरी तरह छंट चुके थे, लेकिन फिर भी मन के किसी कोने में यह डर बना रहता था कि कहीं यह सब कोई खूबसूरत सपना तो नहीं, जो सुबह होते ही टूट जाएगा। एक रात जब तेज आंधी चली और बिजली गुल हो गई, तो अवनी घबराकर समीर के कमरे की तरफ भागी, जहाँ समीर उसे पहले से ही ढूंढने के लिए बाहर निकल रहा था। अंधेरे में वे दोनों एक-दूसरे से टकरा गए और समीर ने उसे कसकर अपनी बाहों में भर लिया, जैसे उसे दुनिया के हर तूफान से बचा लेना चाहता हो। अवनी ने उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में थाम लिया और कांपती आवाज में कहा, ‘मुझे मत छोड़ना समीर, मुझे इस खामोश दूरी से बहुत डर लगता है, मैं अब वापस उस अकेलेपन में नहीं जा सकती।’ समीर ने उसके माथे को चूमते हुए फुसफुसाया, ‘अब दूर जाने का रास्ता ही नहीं बचा है, क्योंकि तुम मेरी रूह का हिस्सा बन चुकी हो।’
उनके प्यार की असली परीक्षा तब हुई जब समीर को एक बड़े प्रोजेक्ट के सिलसिले में तीन महीने के लिए विदेश जाना पड़ा, जहाँ से उनका संपर्क केवल चंद मिनटों की कॉल्स तक ही सीमित रह गया था। उन नब्बे दिनों के हर पल में अवनी को समीर की कमी खली, उसे उसकी मेज पर रखे चश्मे, उसकी अधूरी कॉफी के कप और उसकी गंध वाली कमीजों में भी समीर की उपस्थिति महसूस होती थी। समीर के लिए भी वह समय किसी वनवास से कम नहीं था, उसे हर शानदार इमारत में अवनी की मुस्कुराहट और उसकी बातों के संदर्भ नजर आते थे, जिससे उसे अहसास हुआ कि भौतिक सफलताएँ अवनी के बिना पूरी तरह अर्थहीन हैं। दूर रहकर उन्होंने यह जाना कि प्रेम केवल साथ रहने का नाम नहीं है, बल्कि एक-दूसरे की यादों में खुद को सुरक्षित महसूस करने की कला है, जिसने उनके विश्वास को और भी मजबूत कर दिया था।
जब समीर वापस लौटा, तो हवाई अड्डे पर उसे देखते ही अवनी अपनी सारी मर्यादाएं भूलकर उसकी ओर दौड़ पड़ी और उसके सीने से लगकर फूट-फूटकर रोने लगी। समीर ने उसे खुद में समेट लिया और उसकी आंखों के आंसू पोंछते हुए सबके सामने घुटनों पर बैठकर उसका हाथ चूमा और कहा, ‘अवनी, इन दो सालों में हमने साथ रहना सीखा, लेकिन इन तीन महीनों ने मुझे सिखाया कि तुम्हारे बिना जीना असंभव है; क्या तुम मेरी पत्नी से बढ़कर मेरी आत्मा की साथी बनकर ताउम्र मेरे साथ चलोगी?’ अवनी ने केवल सिर हिलाकर अपनी सहमति दी, क्योंकि उसके पास शब्द कम पड़ गए थे और उसकी आंखों से बहते खुशी के आंसू उसके प्यार का सबसे बड़ा प्रमाण थे। उस पल उनके चारों ओर का शोर थम गया था और केवल उनकी प्रेममयी खामोशी ही सब कुछ कह रही थी, जो अब हमेशा के लिए एक मधुर संगीत में बदल चुकी थी।
भविष्य के सपने अब धुंधले नहीं थे, बल्कि उनमें एक साझा रंग भर चुका था, जहाँ वे दोनों मिलकर एक ऐसी दुनिया बसाने के लिए तैयार थे जहाँ प्यार की भाषा शब्दों की मोहताज नहीं थी। उन्होंने तय किया कि वे उस पुरानी हवेली को एक ऐसी लाइब्रेरी और कला केंद्र में बदलेंगे, जहाँ हर आने वाला प्रेम की उस गहराई को महसूस कर सके जिसे उन्होंने बड़ी मुश्किल से खोजा था। आज भी जब कभी बारिश होती है, समीर और अवनी उसी पुरानी खिड़की के पास बैठकर एक-दूसरे का हाथ थामे रहते हैं, जहाँ अब कोई झिझक नहीं, बल्कि केवल गहरा विश्वास और असीम अनुराग व्याप्त रहता है। उनकी प्रेम कहानी उन सभी के लिए एक मिसाल बन गई जो मानते हैं कि सच्चे प्यार को पनपने के लिए केवल समय की नहीं, बल्कि एक-दूसरे के मौन को समझने वाले हृदय की आवश्यकता होती है।