रात के ग्यारह बज चुके थे और राजधानी एक्सप्रेस अपनी पूरी रफ़्तार से पटरियों पर दौड़ रही थी। समीर अपनी सीट पर बैठा खिड़की से बाहर अंधेरे को ताक रहा था, लेकिन उसका ध्यान बाहर कम और अपनी सामने वाली बर्थ पर बैठी उस रहस्यमयी महिला पर ज्यादा था। सीमा, जो लगभग चौंतीस साल की रही होगी, एक गहरे नीले रंग की शिफॉन साड़ी में लिपटी हुई थी, जिसने उसके शरीर के हर उभार को बड़ी बेबाकी से पेश किया था। उसके रेशमी ब्लाउज से झांकते हुए उसके भारी और रसीले तरबूज समीर की धड़कनों को तेज़ कर रहे थे, और जब भी वह अपनी स्थिति बदलती, समीर की नज़रें उसके साड़ी के पल्लू से फिसलकर उन मखमली तरबूजों की गहराई में खो जाती थीं।
सीमा का शरीर किसी अनुभवी मूर्तिकार की कलाकृति जैसा था, उसके कूल्हे यानी उसका पिछवाड़ा इतना मांसल और सुडौल था कि साड़ी की तहें भी उसकी गोलाई को छिपाने में नाकाम साबित हो रही थीं। समीर ने गौर किया कि सीमा भी उसे अपनी तिरछी निगाहों से देख रही थी, और उसकी आँखों में एक अजीब सी प्यास और तड़प साफ़ झलक रही थी। उसकी गर्दन पर पसीने की कुछ बूंदें चमक रही थीं, जो धीरे-धीरे फिसलकर उसके तरबूजों के बीच वाली गहरी घाटी में समा रही थीं, जिसे देखकर समीर के भीतर एक अजीब सी हलचल पैदा होने लगी थी। वातावरण में एक भारी खामोशी थी, लेकिन उस खामोशी में भी एक कामुक संगीत बज रहा था जो दोनों के शरीरों को एक-दूसरे की ओर खींच रहा था।
बातों का सिलसिला तब शुरू हुआ जब समीर ने उसे पानी की बोतल पकड़ाई, और उनके हाथों का स्पर्श हुआ। वह स्पर्श किसी बिजली के झटके जैसा था, जिसने दोनों के भीतर सोई हुई इच्छाओं को जगा दिया था। सीमा ने अपनी रसीली आवाज़ में शुक्रिया कहा, और समीर को लगा जैसे उसके कानों में शहद घुल गया हो। वे दोनों अपनी ज़िंदगियों के बारे में बातें करने लगे, और धीरे-धीरे उनकी बातें भावनात्मक जुड़ाव की ओर बढ़ने लगीं। सीमा ने बताया कि वह अपनी शादीशुदा ज़िंदगी में कितनी अकेली महसूस करती है, और कैसे उसके पति के पास उसके जज्बातों के लिए समय नहीं है। समीर ने उसकी बातों को बड़े ध्यान से सुना, जिससे सीमा को उसके प्रति एक गहरा खिंचाव महसूस होने लगा।
ट्रेन के केबिन की लाइटें मंद हो चुकी थीं, और डिब्बे में एक मखमली अंधेरा छा गया था। अब वे दोनों एक ही बर्थ पर करीब बैठे थे, उनकी जांघें एक-दूसरे से सट रही थीं। समीर को सीमा के शरीर की महक मदहोश कर रही थी, और उसे महसूस हो रहा था कि उसकी पतलून के भीतर उसका खीरा धीरे-धीरे अपनी पूरी लंबाई और मोटाई में सख्त होता जा रहा है। सीमा ने धीरे से अपना हाथ समीर के घुटने पर रखा, और उसकी उंगलियां धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ने लगीं। समीर की सांसें तेज़ हो गईं, और उसने सीमा की कमर को अपने बाहों में भर लिया, जिससे उसका रेशमी पिछवाड़ा उसके हाथों की पकड़ में आ गया, जो बहुत ही कोमल और गदबदा था।
समीर ने सीमा के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके रसीले होंठों का रस लेने लगा। सीमा ने भी बड़ी गर्मजोशी से उसका साथ दिया, और उनके होंठ एक-दूसरे में इस तरह उलझ गए जैसे सदियों की प्यास बुझा रहे हों। समीर के हाथ अब सीमा की साड़ी के भीतर दाखिल हो चुके थे, और वह उसके रेशमी तरबूजों को अपनी हथेलियों में भरकर भींचने लगा। सीमा के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकली जब समीर ने अपनी उंगलियों से उसके तरबूजों के ऊपर लगे नन्हे और सख्त मटर को सहलाया। वह उत्तेजना से कांपने लगी थी, और उसका शरीर समीर के खीरे की गर्मी को महसूस करने के लिए बेचैन हो उठा था।
धीरे-धीरे समीर ने सीमा की साड़ी और ब्लाउज को उसके बदन से अलग कर दिया, और अब वह कुदरत के उस अनमोल खजाने के सामने था। सीमा के शरीर पर घने बाल उसकी कामुकता को और बढ़ा रहे थे। समीर ने नीचे झुककर सीमा की रसीली खाई को निहारना शुरू किया, जो अब पूरी तरह से गीली और रस से सराबोर हो चुकी थी। उसने अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया, जिससे सीमा बिस्तर पर तड़पने लगी। वह समीर के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ कर जोर-जोर से आहें भरने लगी। उसकी खाई का स्वाद किसी अमृत जैसा था, जिसे चखते ही समीर का खीरा और भी ज्यादा बेकाबू होकर बाहर निकलने को छटपटाने लगा।
सीमा ने अब समीर की पतलून उतारी और उसके विशाल और फौलादी खीरे को अपने कोमल हाथों में पकड़ लिया। वह उसे देखकर दंग रह गई और उसने धीरे-धीरे उस खीरे को अपने मुँह में लेना शुरू किया। सीमा का खीरा चूसना इतना जबरदस्त था कि समीर की आँखों के सामने तारे नाचने लगे। वह उसके खीरे को अपनी जीभ से सहला रही थी और उसे अपने गले तक उतारने की कोशिश कर रही थी। समीर को ऐसा लग रहा था जैसे वह स्वर्ग के द्वार पर खड़ा हो। कुछ देर तक यह सिलसिला चलता रहा, और फिर समीर ने सीमा को घुमाकर उसे बिस्तर पर लिटा दिया ताकि वह अपनी असली मंज़िल यानी उस गहरी खाई तक पहुँच सके।
समीर ने सीमा की टांगों को फैलाया और अपने खीरे की नोक को उसकी गरम और गीली खाई के मुहाने पर टिका दिया। उसने एक गहरा सांस लिया और धीरे से अपने खीरे को उस खाई के भीतर धकेलना शुरू किया। सीमा ने एक तीखी कराह भरी जब उसने महसूस किया कि वह विशाल खीरा उसकी खाई की दीवारों को चीरता हुआ भीतर समा रहा है। धीरे-धीरे समीर ने अपनी गति बढ़ाई और सामने से खोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ उनके शरीर एक-दूसरे से टकरा रहे थे, और डिब्बे में मांस के टकराने की चप-चप की आवाज़ गूँजने लगी थी। सीमा के तरबूज हवा में जोर-जोर से उछल रहे थे, जिन्हें समीर अपने हाथों से मसल रहा था।
खुदाई का यह मंजर अब बहुत ही आक्रामक हो चुका था। समीर और सीमा दोनों पसीने से लथपथ थे, और उनकी सांसें एक सुर में चल रही थीं। सीमा चिल्ला रही थी, “समीर, और जोर से खोदो, मुझे पूरा तबाह कर दो!” समीर ने उसकी बात सुनकर अपनी रफ़्तार और बढ़ा दी। उसने सीमा को पलट दिया और उसे घुटनों के बल खड़ा करके पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। यह पोजीशन सीमा को और भी ज्यादा आनंद दे रही थी, और वह हर धक्के पर बिस्तर में अपना मुंह छिपाकर सिसकियां ले रही थी। समीर का खीरा उसकी खाई की गहराइयों को छू रहा था, जिससे सीमा का रोम-रोम उत्तेजना की चरम सीमा पर पहुँच गया था।
काफी देर तक इस दमदार खुदाई के बाद, दोनों ही अपने चरम आनंद के करीब पहुँच गए थे। समीर के झटके अब और भी तेज़ और गहरे हो गए थे, और सीमा की खाई भी उसे कसकर जकड़ने लगी थी। अचानक सीमा का शरीर अकड़ गया और उसकी खाई से भारी मात्रा में रस निकलना शुरू हो गया। ठीक उसी समय समीर ने भी अपने खीरे से सारा गरम रस सीमा की खाई की गहराई में उड़ेल दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े, उनकी धड़कनें बहुत तेज़ थीं और शरीर पूरी तरह से ढीला पड़ चुका था। उस रात उस ट्रेन के केबिन में दो अजनबियों ने एक-दूसरे की रूह और बदन को पूरी तरह से जान लिया था।
खुदाई के बाद की वह शांति बहुत ही सुकून भरी थी। समीर ने सीमा को अपनी बाहों में समेट लिया और उसके माथे को चूमा। सीमा के चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि और चमक थी, जैसे उसने अपनी खोई हुई खुशी को फिर से पा लिया हो। वे दोनों बिना कुछ कहे एक-दूसरे की गर्मी को महसूस करते रहे। ट्रेन अपनी रफ़्तार से चलती रही, लेकिन उन दोनों के लिए वक्त जैसे थम सा गया था। यह सिर्फ शरीर का मिलन नहीं था, बल्कि दो प्यासी आत्माओं का एक-दूसरे में विलीन हो जाना था, जिसकी यादें उनके दिलों में हमेशा के लिए ताज़ा रहने वाली थीं।