दोपहर की उस तपती धूप में पूरा मोहल्ला जैसे गहरी नींद के आगोश में सोया हुआ था, लेकिन समीर के कमरे में एक अजीब सी बेचैनी पसरी हुई थी। समीर अभी अपनी पढ़ाई पूरी करके शहर से वापस आया था और अपनी कामिनी चाची के घर रुका हुआ था, क्योंकि उसके माता-पिता किसी जरूरी काम से गांव गए हुए थे। चाची कामिनी, जिनकी उम्र करीब छत्तीस साल थी, अपने यौवन के उस पड़ाव पर थीं जहाँ खूबसूरती और मादकता दोनों अपने चरम पर होती हैं। उनकी गठा हुआ बदन और गेहुंआ रंग किसी भी मर्द को दीवाना बनाने के लिए काफी था, और समीर जो अभी जवानी की दहलीज पर कदम रख चुका था, उनके आकर्षण से खुद को बचा नहीं पा रहा था।
कामिनी चाची का व्यक्तित्व बहुत ही शांत और सौम्य था, लेकिन उनकी शारीरिक बनावट कुछ और ही कहानी बयां करती थी। उनके शरीर के ऊपर हिस्से में जो दो विशाल तरबूज थे, वो उनकी साड़ी के ब्लाउज को चीर कर बाहर आने को बेताब रहते थे। जब भी वो चलती थीं, तो वो तरबूज हल्की सी लय के साथ हिलते थे, जिसे देखकर समीर की सांसें अटक जाती थीं। उनके तरबूज के बीच की जो गहरी घाटी थी, समीर अक्सर उसे चोरी-छिपे निहारता रहता था और सोचता था कि उस गहराई में कितनी शांति होगी। उनके तरबूज के ऊपर जो मटर के दाने जैसे उभार थे, वो अक्सर ब्लाउज के पतले कपड़े के नीचे से अपनी मौजूदगी का अहसास कराते थे, जिससे समीर के अंदर एक तूफान उठने लगता था।
उस दिन चाची रसोई में काम कर रही थीं और पसीने की कुछ बूंदें उनके गले से फिसलकर सीधे उन तरबूजों की गहराई में जाकर छिप रही थीं। समीर वहीं डाइनिंग टेबल पर बैठा अखबार पढ़ने का बहाना कर रहा था, लेकिन उसकी नजरें बार-बार चाची के हिलते हुए पिछवाड़े पर जाकर टिक रही थीं। चाची की साड़ी उनके पिछवाड़े के उभारों पर इतनी कसी हुई थी कि उनके शरीर का हर वक्र साफ नजर आ रहा था। उनका पिछवाड़ा किसी पके हुए फल की तरह गोल और आकर्षक था, जिसे देखकर समीर के मन में बार-बार उसे छूने और सहलाने की प्रबल इच्छा जागृत हो रही थी। वो जानता था कि ये गलत है, लेकिन जवानी का जोश और चाची की मादकता उस पर हावी हो रही थी।
अचानक चाची मुड़ीं और समीर को अपनी तरफ टकटकी लगाकर देखते हुए पकड़ लिया, समीर एकदम से सकपका गया और उसने अपनी नजरें झुका लीं। चाची ने मंद सी मुस्कान के साथ कहा, ‘समीर, क्या देख रहे हो? क्या पानी चाहिए?’ उनकी आवाज में एक अजीब सी खनक और मिठास थी जिसने समीर के दिल की धड़कनें तेज कर दीं। समीर ने हकलाते हुए कहा, ‘नहीं चाची, बस कुछ नहीं, गर्मी बहुत ज्यादा है।’ चाची उसके करीब आईं और अपनी साड़ी के पल्लू से अपने माथे का पसीना पोंछने लगीं, जिससे उनके तरबूजों का आधा हिस्सा समीर की नजरों के ठीक सामने आ गया। उस समय समीर को उनके शरीर से आने वाली सोंधी सी महक ने पूरी तरह मदहोश कर दिया था।
समीर के मन में एक गहरा द्वंद्व चल रहा था—एक तरफ समाज की मर्यादा थी और दूसरी तरफ वो बेकाबू इच्छा जो उसे चाची के करीब खींच रही थी। चाची ने महसूस किया कि समीर के भीतर कुछ चल रहा है, उन्होंने प्यार से उसके बालों में उंगलियां फेरीं और कहा, ‘बेटा, शहर में रहकर बहुत पढ़ाई की है, अब थोड़ा आराम भी कर लो।’ चाची का वो कोमल स्पर्श समीर के पूरे शरीर में बिजली की तरह दौड़ गया। उनकी उंगलियों का वो अहसास समीर को किसी दूसरी ही दुनिया में ले गया, जहाँ सिर्फ वो और उसकी चाची थीं। उसने धीरे से चाची का हाथ पकड़ लिया, चाची ने उसे झटकने की कोशिश नहीं की, बल्कि उनकी आंखों में भी एक अजीब सी चमक उभर आई थी।
उस स्पर्श ने दोनों के बीच की झिझक की दीवार को जैसे गिरा दिया था, समीर ने धीरे-धीरे चाची की कमर पर हाथ रखा। चाची के रेशमी बदन का अहसास पाकर समीर की उंगलियां कांपने लगीं, लेकिन उनकी पकड़ ढीली नहीं हुई। चाची की सांसें भी अब भारी होने लगी थीं और उनके तरबूज तेजी से ऊपर-नीचे होने लगे थे। समीर ने धीरे से अपना चेहरा चाची के चेहरे के करीब लाया और उनके होठों के पास अपनी गर्म सांसें छोड़ीं। चाची ने अपनी आंखें मूंद लीं, जैसे वो भी इस पल का लंबे समय से इंतजार कर रही थीं। समीर ने हिम्मत जुटाई और उनके माथे को चूमते हुए धीरे से उनके कानों में फुसफुसाया, ‘चाची, आप बहुत सुंदर हैं।’
चाची के शरीर में एक कंपकंपी सी हुई और उन्होंने समीर को कसकर अपनी बाहों में भर लिया, जिससे समीर का चेहरा सीधे उनके विशाल तरबूजों के बीच जाकर धंस गया। समीर को उन तरबूजों की कोमलता और गर्माहट ने पागल कर दिया, उसने अपने हाथों से उन तरबूजों को हल्के से दबाना शुरू किया। चाची के मुंह से एक दबी हुई कराह निकली, ‘आह समीर… ये तुम क्या कर रहे हो? कोई आ जाएगा।’ लेकिन उनकी आवाज में रोकने की कोई शक्ति नहीं थी, बल्कि वो और ज्यादा गहराई से समीर के करीब आ रही थीं। समीर ने अपनी जीभ से उनके तरबूजों के ऊपर बने उन मटर जैसे दानों को सहलाना शुरू किया, जिससे चाची के पैर डगमगाने लगे।
समीर ने धीरे से चाची को सहारा दिया और उन्हें बेडरूम की तरफ ले जाने लगा, कमरे में अंधेरा था और बाहर की रोशनी खिड़की के पर्दों से छनकर आ रही थी। समीर ने चाची की साड़ी की गाँठ खोली और उसे धीरे से नीचे गिरने दिया, अब चाची सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज में समीर के सामने खड़ी थीं। समीर की नजरें उनके गोरे बदन पर जम गई थीं, उसने चाची के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। जैसे ही ब्लाउज खुला, चाची के विशाल और गोरे तरबूज पूरी तरह से आजाद होकर समीर के सामने लहराने लगे। उन तरबूजों के बीच जो मटर थे, वो अब ठंडक और उत्तेजना की वजह से पूरी तरह से सख्त हो चुके थे और समीर को आमंत्रित कर रहे थे।
समीर ने अब और इंतजार नहीं किया और सीधे अपने चेहरे को उन तरबूजों के बीच ले गया, वो बारी-बारी से एक-एक मटर को अपने मुंह में भरकर चूसने लगा। चाची ने समीर के सिर को अपने हाथों से पकड़ लिया और उसे अपने शरीर में और गहराई से धकेलने लगीं। समीर ने चाची के पेटीकोट को भी धीरे से नीचे सरका दिया, अब वो पूरी तरह से निर्वस्त्र थीं। चाची के निचले हिस्से में जो खाई थी, वो काले घने बालों से ढकी हुई थी और वहां से एक अजीब सी मदहोश कर देने वाली नमी बाहर आ रही थी। समीर ने अपने घुटनों के बल बैठकर उस खाई को निहारना शुरू किया, जो पूरी तरह से रसीली और लाल हो चुकी थी।
समीर ने अपनी जीभ उस खाई के किनारों पर फेरना शुरू किया, चाची के शरीर में जैसे बिजली का करंट दौड़ गया। वो पलंग की चादर को अपने हाथों में भींचने लगीं और उनके मुंह से सिसकारियां निकलने लगीं, ‘उफ़ समीर… वहां नहीं… आहा… बहुत अजीब लग रहा है।’ समीर ने बिना रुके अपनी जीभ को उस खाई के अंदर गहराई तक ले जाना शुरू किया, वो उस खाई को पूरी तरह से चाटना चाहता था। चाची का पूरा शरीर अब पसीने से भीग चुका था और उनकी उत्तेजना अपने चरम पर थी। उन्होंने समीर को ऊपर खींचा और उसके कपड़े उतारने में उसकी मदद की, समीर का जवान और सख्त खीरा अब चाची की नजरों के सामने था।
चाची ने समीर के उस सख्त खीरे को अपने हाथ में लिया और उसकी लंबाई और मोटाई को महसूस करके उनकी आंखें फटी की फटी रह गई। उन्होंने धीरे से उस खीरे को अपने मुंह के करीब लाया और उसे अपनी जीभ से सहलाने लगीं, समीर के मुंह से एक आह निकली। चाची ने फिर धीरे से पूरे खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे चूसना शुरू किया, समीर को ऐसा महसूस हुआ जैसे वो स्वर्ग की सैर कर रहा हो। कुछ देर तक खीरा चूसने के बाद चाची ने समीर को अपने ऊपर आने का इशारा किया, अब समय था उस अंतिम पड़ाव का जिसके लिए दोनों का शरीर और मन बेताब थे।
समीर ने चाची की दोनों टांगों को फैलाया और उस रसीली खाई के द्वार पर अपने खीरे की नोक को टिकाया। चाची ने अपनी आंखें बंद कर ली थीं और उनकी सांसें बहुत तेज चल रही थीं, समीर ने धीरे से एक धक्का मारा और उसका खीरा आधा उस गरम और तंग खाई के अंदर समा गया। चाची के मुंह से एक तेज चीख निकली, ‘आह मां… समीर… बहुत भरा हुआ महसूस हो रहा है।’ समीर थोड़ी देर के लिए रुक गया ताकि चाची का शरीर उस खिंचाव को झेल सके, फिर उसने धीरे-धीरे खुदाई की प्रक्रिया शुरू की। हर धक्के के साथ उसका खीरा उस खाई की गहराइयों को नाप रहा था और चाची के शरीर में एक अजीब सी लचक पैदा कर रहा था।
अब खुदाई की गति धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी, समीर अपनी पूरी ताकत से चाची की खाई को खोद रहा था। कमरे में सिर्फ दोनों के शरीरों के टकराने की आवाज और उनकी भारी सांसें सुनाई दे रही थीं। चाची भी अब बराबर का साथ दे रही थीं, वो हर धक्के पर अपने पिछवाड़े को ऊपर उठाती थीं ताकि समीर का खीरा और गहराई तक जा सके। ‘हां समीर… और जोर से खोदो… मुझे पूरा खत्म कर दो… आह… तुम्हारी चाची आज सिर्फ तुम्हारी है।’ चाची की इन बातों ने समीर के जोश को दोगुना कर दिया, उसने चाची को उल्टा किया और अब पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। इस पोजीशन में चाची के लटकते हुए तरबूज और भी ज्यादा आकर्षक लग रहे थे जिन्हें समीर अपने हाथों से मसल रहा था।
खुदाई अब अपने अंतिम चरण में थी, समीर को महसूस हो रहा था कि अब उसका रस छूटने वाला है। वहीं चाची की खाई भी अब बहुत ज्यादा गीली और गरम हो चुकी थी, उनके शरीर में झटके लगने शुरू हो गए थे। समीर ने अपनी गति को और तेज कर दिया, धक्कों की रफ्तार इतनी थी कि चाची के मुंह से सिर्फ बेतरतीब आवाजें निकल रही थीं। अचानक चाची का शरीर पूरी तरह से अकड़ गया और उनकी खाई से भारी मात्रा में रस निकलने लगा, वो अपने चरम पर पहुँच चुकी थीं। ठीक उसी पल समीर ने भी एक आखिरी जोरदार धक्का मारा और अपना सारा गरम रस चाची की खाई की गहराई में उड़ेल दिया, दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर ढह गए।
काफी देर तक दोनों की सांसें सामान्य होने का नाम नहीं ले रही थीं, समीर चाची की छाती पर अपना सिर रखे हुए उनके दिल की धड़कनें सुन रहा था। चाची ने उसके सिर को चूम लिया और उसके बालों को सहलाते हुए कहा, ‘समीर, तुमने मुझे आज वो अहसास कराया है जो मैंने सालों से नहीं पाया था।’ समीर के मन में अब कोई ग्लानि नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा सुकून था। दोनों के शरीर पसीने और प्रेम के रस से लथपथ थे, लेकिन उनकी आत्माएं जैसे एक हो चुकी थीं। उस दोपहर के बाद उनके बीच का रिश्ता बदल चुका था, अब वो सिर्फ चाची और भतीजा नहीं थे, बल्कि एक-दूसरे की अधूरी इच्छाओं के साथी बन चुके थे, जिनकी ये दास्तान उन बंद कमरों की दीवारों में हमेशा के लिए दफन हो गई।