ट्रेन वाली अजनबी की चु@@ई—>
रात के गहराते साये और रेलगाड़ी की पटरियों पर दौड़ती छुक-छुक की आवाज़ के बीच, समीर अपनी लोअर बर्थ पर बैठा बाहर के अंधेरे को निहार रहा था। डिब्बे में मद्धम रोशनी थी और अधिकांश यात्री सो चुके थे, लेकिन समीर की आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। तभी उसकी नज़र सामने वाली बर्थ पर बैठी उस अजनबी महिला पर पड़ी, जो पिछले दो घंटों से अपनी किताब में डूबी हुई थी। उसका नाम शायद कविता था, जैसा कि उसने चार्ट में पढ़ा था। कविता ने एक गहरे नीले रंग की साड़ी पहनी थी, जो उसके गोरे बदन पर बिजली की तरह चमक रही थी। समीर की धड़कनें तब तेज़ हो गईं जब कविता ने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा ठीक किया, जिससे उसके सुडौल और कसे हुए तरबूज की एक झलक साफ़ दिखाई दी। समीर ने महसूस किया कि उसकी साँसें भारी हो रही हैं और उसके मन में एक अजीब सी हलचल पैदा होने लगी है। कविता के शरीर का हर मोड़ किसी तराशी हुई मूरत जैसा था, और उसकी सादगी में भी एक बेपनाह कामुकता छिपी थी।
कविता के शरीर का आकार बहुत ही आकर्षक था; उसकी कमर इतनी पतली थी कि जैसे कोई रेशमी धागा, लेकिन उसके ऊपर के तरबूज इतने भरे हुए थे कि चोली के बटन जैसे टूटने को बेताब लग रहे थे। समीर चाहकर भी अपनी नज़रों को उसके शरीर के उतार-चढ़ाव से नहीं हटा पा रहा था। जब भी ट्रेन किसी मोड़ पर मुड़ती, कविता का शरीर थोड़ा हिलता और उसके तरबूज समीर की आँखों के सामने नाचने लगते। समीर ने गौर किया कि साड़ी के पतले कपड़े के नीचे से उसके मटर जैसे उभरे हुए निप्पल साफ़ झलक रहे थे, जो शायद डिब्बे की एसी की ठंडक की वजह से सख्त हो गए थे। समीर का खीरा धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने लगा था और पैंट के अंदर उसकी बेचैनी बढ़ने लगी थी। वह सोच रहा था कि क्या यह अजनबी महिला भी वही महसूस कर रही है जो उसके दिल में चल रहा है, या यह सिर्फ उसकी एकतरफा दीवानगी है।
बातों का सिलसिला तब शुरू हुआ जब ट्रेन ने अचानक एक ज़ोरदार झटका लिया और कविता के हाथ से उसकी किताब गिरकर समीर के पैरों के पास आ गई। समीर ने झुककर किताब उठाई और मुस्कुराते हुए उसे वापस किया। ‘धन्यवाद,’ कविता ने एक ऐसी आवाज़ में कहा जिसमें शहद जैसी मिठास थी। उस एक शब्द ने समीर के भीतर के भावनात्मक बांध को तोड़ दिया। वे दोनों बातें करने लगे—सफर, मंज़िल और फिर ज़िंदगी के अकेलेपन के बारे में। बातों ही बातों में समीर को महसूस हुआ कि कविता भी अंदर से बहुत अकेली है और उसे किसी के साथ की तलाश है। उनकी आँखों का संपर्क अब गहरा होने लगा था, और हर गुज़रते मिनट के साथ उनके बीच की झिझक कम होती जा रही थी। समीर ने महसूस किया कि कामुकता सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं होती, बल्कि जब दो तन्हा रूहें मिलती हैं, तो आकर्षण का जन्म अपने आप हो जाता है।
झिझक और मन के संघर्ष के बीच, समीर ने अपनी हिम्मत जुटाई और अपना हाथ कविता के हाथ के करीब ले गया। कविता ने अपना हाथ हटाया नहीं, बल्कि उसकी उंगलियों ने समीर के स्पर्श का जवाब दिया। यह पहला स्पर्श बिजली के करंट जैसा था जिसने दोनों के शरीर में एक सिहरन पैदा कर दी। समीर ने धीरे से कविता का हाथ अपने हाथ में लिया और उसकी उंगलियों को सहलाने लगा। कविता की साँसें तेज़ हो गई थीं और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जिसमें डर और इच्छा दोनों का मिश्रण था। ‘समीर, यह हम क्या कर रहे हैं?’ उसने धीमी आवाज़ में पूछा, लेकिन उसका लहज़ा मना करने वाला नहीं था। समीर ने बिना कुछ कहे उसके हाथ को अपने होठों से लगा लिया और उसकी त्वचा की खुशबू को अपने भीतर उतारने लगा।
धीरे-धीरे बढ़ती तेजी ने उन्हें और करीब ला दिया। समीर अपनी बर्थ से उठकर कविता की बर्थ पर जाकर उसके पास बैठ गया। अब उनके बीच की दूरी खत्म हो चुकी थी। समीर ने अपना हाथ कविता की कमर पर रखा और उसे अपनी ओर खींचा। कविता ने अपना सिर समीर के कंधे पर रख दिया और एक लंबी आह भरी। समीर के हाथ अब उसकी पीठ पर रेंग रहे थे, साड़ी के नीचे की मखमली त्वचा को महसूस कर रहे थे। उसने कविता के चेहरे को ऊपर उठाया और उसके होठों के पास ले गया। उन दोनों के होठों का मिलन एक प्यासे को पानी मिलने जैसा था। समीर ने कविता के होठों का रस पीना शुरू किया और उसके हाथ अब स्वतंत्र होकर उसके तरबूजों को सहलाने लगे। कविता की कराह अब धीमी आवाज़ में सुनाई दे रही थी, जो ट्रेन के शोर में कहीं गुम हो जा रही थी।
समीर ने कविता की चोली के हुक एक-एक करके खोलने शुरू किए। जैसे ही आखिरी हुक खुला, उसके बड़े और शानदार तरबूज समीर की आँखों के सामने आज़ाद हो गए। वे इतने गोरे और गोल थे कि समीर का मन किया कि वह उन्हें बस देखता ही रहे। उसने अपने हाथ उन पर रखे और उन्हें धीरे से भींचना शुरू किया। कविता ने अपनी आँखें बंद कर ली थीं और वह पूरी तरह से समीर के स्पर्श में खो गई थी। समीर ने अपने मुँह में एक तरबूज लिया और उसके मटर जैसे हिस्से को अपनी जुबान से सहलाने लगा। कविता की आहें अब और तेज़ हो गई थीं, ‘ओह समीर, तुम बहुत अच्छा कर रहे हो।’ समीर के हाथ अब नीचे की ओर बढ़ रहे थे, कविता की साड़ी और पेटीकोट के अंदर रास्ता तलाश रहे थे।
जब समीर का हाथ कविता की रेशमी और गीली खाई तक पहुँचा, तो उसने महसूस किया कि वह पहले से ही रस से लथपथ थी। समीर ने अपनी उंगली से खाई को खोजना शुरू किया, जिससे कविता का पूरा बदन कांप उठा। ‘आह समीर, वहाँ बहुत जलन हो रही है, कुछ करो,’ वह फुसफुसायी। समीर ने अपनी पैंट खोली और अपना फन फैलाता हुआ खीरा बाहर निकाला। कविता ने जब समीर के उस विशाल खीरे को देखा, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने धीरे से अपना हाथ उस पर फेरा और उसकी गर्मी को महसूस किया। समीर ने अब कविता को सामने से खोदने की स्थिति में कर दिया और अपने खीरे के अगले हिस्से को उसकी खाई के मुहाने पर टिका दिया।
पूरी खुदाई की प्रक्रिया अब शुरू होने वाली थी। समीर ने एक जोरदार धक्का दिया और उसका खीरा आधा कविता की तंग खाई के अंदर समा गया। कविता के मुँह से एक चीख निकली जिसे उसने समीर के होठों में दबा दिया। ‘बहुत तंग हो तुम कविता,’ समीर ने हाँफते हुए कहा। उसने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया, और हर धक्के के साथ वह और गहराई तक जा रहा था। कविता अब पूरी तरह से लय में आ चुकी थी और वह भी नीचे से अपनी कमर ऊपर उठाकर समीर का साथ दे रही थी। खाई और खीरे के मिलन से एक गीली आवाज़ पैदा हो रही थी जो डिब्बे के उस शांत कोने में संगीत की तरह गूँज रही थी। समीर ने अब उसकी स्थिति बदली और उसे पिछवाड़े से खोदने के लिए तैयार किया।
पिछवाड़े से खुदाई करते समय समीर को एक अलग ही आनंद मिल रहा था। वह कविता के बालों को पकड़कर उसे अपने करीब खींचता और ज़ोर-ज़ोर से धक्के मारता। कविता के तरबूज नीचे की ओर लटक रहे थे और हर धक्के के साथ झूल रहे थे। समीर का खीरा अब पूरी तरह से कविता की खाई की गहराइयों को नाप रहा था। ‘मैं निकलने वाली हूँ समीर, मेरा रस छूटने वाला है!’ कविता ने चिल्लाते हुए कहा। समीर ने भी अपनी गति बढ़ा दी और कुछ ही क्षणों में दोनों का रस एक साथ निकल गया। समीर का गर्म रस कविता की खाई के अंदर भर गया, जिससे उसे एक असीम सुख की प्राप्ति हुई। दोनों पसीने से तर-बतर एक दूसरे के ऊपर गिर पड़े, उनकी साँसें तेज़ थीं और दिल की धड़कनें आपस में बात कर रही थीं।
खुदाई के बाद की फीलिंग बहुत ही शांत और सुकून भरी थी। समीर ने कविता को अपनी बाहों में भर लिया और उसके माथे को चूमा। कविता की हालत ऐसी थी जैसे वह किसी और ही दुनिया से लौटकर आई हो। उसके बाल बिखरे हुए थे, उसकी आँखों में तृप्ति का भाव था और उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। उन्होंने बाकी की रात एक-दूसरे की बाहों में सिमटकर बिताई, जैसे वे बरसों से एक-दूसरे के हों। सुबह जब स्टेशन आया, तो दोनों ने एक-दूसरे को विदा किया, लेकिन उनके बीच जो कुछ हुआ था, उसकी यादें हमेशा के लिए उनके दिलों में बस गई थीं। वह सफर सिर्फ एक रेल यात्रा नहीं थी, बल्कि दो अजनबियों के रूहानी और जिस्मानी मिलन की एक अधूरी मगर मुकम्मल कहानी थी।
Lovely story