अंजलि और समीर की खुदाई—>समीर आज पूरे सात साल बाद अपनी पुरानी कॉलेज प्रोफेसर अंजलि के घर के सामने खड़ा था। शहर की शोर-शराबे वाली गलियों से दूर, एक शांत कोने में बना वह पुराना बंगला अपनी दीवारों पर लिपटी बेलों के साथ बहुत ही रहस्यमयी और खूबसूरत लग रहा था। समीर के दिल की धड़कनें आज कुछ ज्यादा ही तेज थीं, क्योंकि आज वह सिर्फ एक छात्र बनकर नहीं, बल्कि अपने उन अनकहे जज्बातों का जवाब लेने आया था जो उसने बरसों से अपने सीने में दबा कर रखे थे। जैसे ही उसने दरवाजे की घंटी बजाई, उसके मन में पुरानी यादों का एक तूफान सा उठ खड़ा हुआ, जहाँ अंजलि की हँसी और उनके पढ़ाने का वह खास अंदाज आज भी उसके जहन में ताजा था।
दरवाजा खुला और सामने अंजलि खड़ी थी, उनकी खूबसूरती में वक्त ने जैसे और भी निखार भर दिया था। उन्होंने एक गहरे लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी, जिसका गहरा कटा हुआ ब्लाउज उनकी सफेद और कोमल गर्दन को बहुत ही खूबसूरती से उजागर कर रहा था। उनकी आँखों में वही पुरानी चमक थी, लेकिन आज उसमें एक अजीब सा ठहराव और गहराई नजर आ रही थी। समीर ने जब उन्हें देखा, तो उसकी साँसें जैसे गले में ही अटक गईं, अंजलि का वह सुडौल बदन और उनके चलने का वह सलीका आज भी उतना ही मोहक था जितना कि कॉलेज के दिनों में हुआ करता था। उनके चेहरे पर आई हल्की सी मुस्कुराहट ने समीर के दिल पर जैसे सीधा प्रहार किया और वह बस उन्हें निहारता ही रह गया।
अंजलि ने उसे अंदर आने का इशारा किया और समीर उनके पीछे-पीछे उनके अध्ययन कक्ष की ओर चल दिया, जहाँ किताबों की पुरानी महक और चमेली के फूलों की खुशबू का एक अनोखा संगम था। कमरे में रखे पुराने फर्नीचर और मेज पर बिखरी हुई फाइलों को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे अंजलि आज भी किसी पुराने शोध में व्यस्त हैं। अंजलि ने बड़े प्यार से पूछा, ‘समीर, इतने सालों बाद तुम्हें मेरी याद कैसे आई?’ समीर ने उनकी आँखों में गहराई से झांकते हुए कहा, ‘मैम, आपकी यादें कभी मुझसे दूर गई ही नहीं थीं, बस मैं खुद को इस काबिल बनाने में लगा था कि आपके सामने खड़ा होकर अपने दिल की बात कह सकूँ।’
वे दोनों सोफे पर पास-पास बैठे थे और उनके बीच की दूरी धीरे-धीरे कम होने लगी थी, हवा में एक अनजाना सा खिंचाव और भारीपन महसूस हो रहा था। समीर की नजरें अंजलि के चेहरे से हटकर उनकी साड़ी के पल्लू पर जा टिकीं, जो उनके कंधे से धीरे से खिसक रहा था। अंजलि ने अपनी पलकें झुका लीं, उनकी साँसों की गति अब तेज होने लगी थी और उनके चेहरे पर एक हल्की सी लाली छा गई थी। समीर ने हिम्मत जुटाकर अपना हाथ उनकी हथेली पर रखा, तो अंजलि के शरीर में एक बिजली सी कौंध गई और उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। वह स्पर्श इतना कोमल और इतना गर्म था कि दोनों के बीच सालों से जमी बर्फ जैसे एक ही पल में पिघलने लगी हो।
समीर ने धीरे से अपना चेहरा अंजलि के करीब लाया, उसकी गर्म साँसें अंजलि के गालों को छू रही थीं, जिससे उनके बदन में एक सिहरन सी पैदा हो गई। अंजलि ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उनकी उंगलियां समीर की शर्ट के बटन को टटोलने लगीं, जैसे वे भी उसी पल का इंतजार कर रही हों। कमरे की मद्धम रोशनी में दोनों की परछाइयां दीवार पर एक-दूसरे में सिमटती हुई दिखाई दे रही थीं। समीर ने अंजलि की कमर पर अपना हाथ टिकाया और उन्हें धीरे से अपनी ओर खींचा, जिससे अंजलि की एक हल्की सी आह निकल गई। उनके शरीर का तापमान बढ़ने लगा था और पसीने की नन्हीं बूंदें उनके माथे पर चमकने लगी थीं, जो उनके भीतर की तीव्र इच्छा को साफ बयां कर रही थीं।
जैसे-जैसे उनके बीच की निकटता बढ़ती गई, शब्दों की जगह अब गहरी साँसों और धड़कनों ने ले ली थी, जो एक-दूसरे की मौजूदगी को पूरी शिद्दत से महसूस कर रहे थे। समीर का हाथ अंजलि की पीठ पर ऊपर-नीचे रेंग रहा था, जिससे उनके शरीर में एक अजीब सी तड़प और बेचैनी पैदा हो रही थी। अंजलि ने समीर के बालों में अपनी उंगलियां फँसा लीं और उन्हें और भी करीब खींच लिया, जैसे वे उसे अपने आप में समा लेना चाहती हों। उस पल में कोई झिझक नहीं थी, कोई समाज का डर नहीं था, बस दो आत्माओं का मिलन था जो बरसों से एक-दूसरे के लिए प्यासी थीं। उनके बीच का वह मौन संवाद किसी भी कविता से कहीं ज्यादा सुंदर और भावुक था।
समीर ने अंजलि के कानों के पास जाकर धीरे से फुसफुसाया, ‘अंजलि, मैंने हर दिन, हर पल सिर्फ तुम्हारे बारे में सोचा है,’ और यह कहते ही उसने उनके गले पर एक हल्का सा चुंबन अंकित कर दिया। अंजलि की आँखें मूंद गई थीं और उनके होंठों से एक धीमी सी कराह निकली, जो समीर के लिए किसी संगीत से कम नहीं थी। उनके शरीर एक-दूसरे के इतने करीब थे कि वे एक-दूसरे की दिल की धड़कन को साफ-साफ सुन सकते थे। समीर का स्पर्श अब और भी गहरा और अधिकारपूर्ण होने लगा था, वह अंजलि के बदन के हर हिस्से को जैसे अपनी उंगलियों से पढ़ना चाहता था। अंजलि के बदन की महक समीर के होश उड़ा रही थी और वह पूरी तरह से उनके प्यार के नशे में डूब चुका था।
वक्त जैसे थम सा गया था और उस कमरे में सिर्फ उनकी साँसों की आवाज गूँज रही थी, जो अब और भी ज्यादा तेज और अनियमित हो गई थी। समीर ने अंजलि को धीरे से अपनी बाहों में उठाया और उन्हें पास की पुरानी आरामदायक कुर्सी पर बिठा दिया, जहाँ वे एक-दूसरे की आँखों में खोए रहे। अंजलि के चेहरे पर शर्म और चाहत का एक अद्भुत मेल था, जो उन्हें और भी ज्यादा कामुक बना रहा था। समीर ने उनके चेहरे को अपने दोनों हाथों में थाम लिया और बहुत ही धीरे से उनके होंठों की ओर बढ़ा, उस पल में पूरी कायनात जैसे शांत हो गई थी। जब उनके होंठ आपस में मिले, तो जैसे भावनाओं का एक सैलाब उमड़ पड़ा, जिसमें वे दोनों पूरी तरह बहते चले गए।
उस घनिष्ठता के बीच, समीर को महसूस हुआ कि अंजलि का शरीर कैसे उसके स्पर्श के प्रति प्रतिक्रिया दे रहा था, हर छुअन के साथ उनकी धड़कनें और भी बेकाबू हो रही थीं। अंजलि ने समीर की गर्दन के चारों ओर अपनी बाँहें कस लीं और खुद को उसकी बाहों में पूरी तरह समर्पित कर दिया, उनकी साँसें अब एक-दूसरे में उलझ चुकी थीं। कमरे का वातावरण अब और भी गहरा और मादक हो गया था, जहाँ सिर्फ प्यार और आकर्षण का राज था। समीर का हर स्पर्श अंजलि के मन में वर्षों से दबे उस सूनेपन को भर रहा था, जिसे वे अब तक छिपाती आई थीं। उनकी आँखों से खुशी के दो आंसू निकलकर समीर के हाथों पर गिर पड़े, जो उनके गहरे भावनात्मक जुड़ाव का प्रमाण थे।
अंततः, जब भावनाओं का वह उफान थोड़ा शांत हुआ, तो अंजलि समीर के कंधे पर अपना सिर टिकाकर चुपचाप लेटी रहीं, उनकी साँसें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। समीर उनके बालों को सहला रहा था और उनके चेहरे पर एक गहरी संतुष्टि और शांति का भाव था, जैसे उसने दुनिया की सबसे कीमती चीज पा ली हो। उस शाम ने उनके रिश्ते को एक नई पहचान दी थी, जो गुरु और शिष्य के दायरे से कहीं ऊपर उठकर दो प्रेमियों के पवित्र बंधन में बदल चुका था। अंजलि ने धीरे से समीर का हाथ दबाया और कहा, ‘तुमने आज मुझे फिर से जीना सिखा दिया,’ और समीर ने बस मुस्कुराकर उन्हें और भी कसकर अपनी बाहों में भर लिया, यह जानते हुए कि यह तो बस उनकी इस नई और खूबसूरत यात्रा की शुरुआत थी।