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कविता की पड़ोसी से चु@@ई


कविता की पड़ोसी से चु@@ई—>

समीर अभी कुछ दिन पहले ही इस शहर के एक शांत और पॉश इलाके के अपार्टमेंट में रहने आया था। उसके बगल वाले फ्लैट में कविता रहती थी, जिसकी उम्र लगभग पैंतीस साल के आसपास थी और उसकी चाल में एक ऐसी मादकता थी जो किसी भी मर्द का मन विचलित कर दे। समीर की उम्र सत्ताईस साल थी और वह एक कॉर्पोरेट कंपनी में काम करता था, लेकिन कविता को देखते ही उसका ध्यान काम से हटकर उस परिपक्व सुंदरी पर टिक जाता था। कविता अक्सर शाम के वक्त अपनी बालकनी में रेशमी ढीली कुर्ती पहनकर बैठती थी, जिससे उसके शरीर के उभार साफ नजर आते थे।

कविता का शरीर किसी तराशी हुई मखमली मूर्ति की तरह था, जहाँ हर अंग अपनी एक अलग कहानी कहता था। उसके शरीर पर मौजूद वे दो विशाल और रसीले तरबूज उसकी कुर्ती के भीतर से बाहर आने को बेताब दिखते थे, जिनकी गोलाई समीर की रातों की नींद उड़ा देती थी। जब वह चलती थी, तो उसके भारी तरबूज मंद गति से ऊपर-नीचे होते थे, और समीर बस उन्हें एकटक निहारता रह जाता था। कविता के चेहरे पर हमेशा एक हल्की सी मुस्कान रहती थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी प्यास थी जिसे समीर धीरे-धीरे समझने लगा था। उसके शरीर की बनावट और वह भरा हुआ पिछवाड़ा समीर के मन में कामुकता की आग सुलगा देता था।

समीर और कविता के बीच बातचीत की शुरुआत बहुत ही औपचारिक थी, जैसे कि मौसम की बातें या सोसाइटी के नियमों पर चर्चा। लेकिन धीरे-धीरे उनकी बातचीत में एक गर्मजोशी आने लगी और वे घंटों एक-दूसरे के करीब खड़े होकर बातें करने लगे। एक शाम समीर ने देखा कि कविता अपने घर के दरवाजे पर चाबी के साथ जूझ रही थी, शायद ताला अटक गया था। समीर ने मदद की पेशकश की और जब वह ताला ठीक कर रहा था, तब कविता उसके बहुत करीब खड़ी थी। उसके शरीर से आने वाली चमेली की खुशबू और उसकी गर्म साँसें समीर के गले को छू रही थीं, जिससे उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

ताला खुलते ही कविता ने उसे शुक्रिया कहने के लिए एक कप चाय पर अंदर बुलाया, और यहीं से उनकी नियति का नया अध्याय शुरू हुआ। कमरे के अंदर की मद्धम रोशनी में कविता और भी ज्यादा खूबसूरत और आकर्षक लग रही थी। उसने अपनी कुर्ती के ऊपर का बटन खोल रखा था, जिससे उसके तरबूजों की गहरी घाटी और उनके ऊपर के छोटे-छोटे मटर जैसे उभार हल्के से झलक रहे थे। समीर की नजरें बार-बार वहीं जा रही थीं और कविता यह देख रही थी, पर उसने टोका नहीं बल्कि एक शरारती मुस्कान के साथ उसे और करीब आने का मूक निमंत्रण दिया।

जैसे ही समीर ने चाय का कप पकड़ा, कविता ने जानबूझकर अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया। वह स्पर्श इतना गर्म और उत्तेजक था कि समीर के शरीर में बिजली सी दौड़ गई। कविता ने समीर की आँखों में गहराई से झाँका और फुसफुसाते हुए कहा, ‘समीर, यहाँ बहुत अकेलापन है, क्या तुम मेरी इस तन्हाई को दूर नहीं करोगे?’ समीर ने बिना कुछ कहे कप मेज पर रखा और कविता की पतली कमर को अपने हाथों के घेरे में ले लिया। कविता ने एक ठंडी आह भरी और अपना सिर समीर के कंधे पर रख दिया, उसकी साँसें अब समीर की गर्दन पर आग बरसा रही थीं।

समीर ने धीरे से कविता के चेहरे को ऊपर उठाया और उसके गुलाबी होठों का मधुर रसपान करने लगा। यह चुंबन गहरा और लंबा था, जिसमें बरसों की दबी हुई इच्छाएं पिघल रही थीं। कविता ने समीर के बालों में अपनी उंगलियाँ फंसा दीं और उसे अपने और भी करीब खींच लिया। समीर का हाथ धीरे से नीचे फिसला और उसने कविता के उन भारी और मुलायम तरबूजों को अपनी हथेलियों में भर लिया। कविता के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकली जब समीर ने उसके तरबूजों के ऊपर मौजूद मटरों को अपनी उंगलियों से सहलाना शुरू किया।

अब दोनों के बीच झिझक की दीवार पूरी तरह टूट चुकी थी और बेतहाशा वासना का जन्म हो चुका था। समीर ने कविता की कुर्ती को धीरे-धीरे उसके कंधों से नीचे उतार दिया, जिससे उसके श्वेत और चमकदार तरबूज पूरी तरह आजाद हो गए। उन पर बने मटर अब ठंड और उत्तेजना से सख्त हो गए थे, जिन्हें समीर ने बारी-बारी से अपने मुँह में लेना शुरू किया। कविता का पूरा शरीर कांपने लगा था और वह समीर का नाम पुकारते हुए अपने पिछवाड़े को हवा में उछालने लगी थी। कमरे का तापमान बढ़ चुका था और हवा में दोनों के शरीर की गंध घुल गई थी।

समीर ने अब कविता को पूरी तरह निर्वस्त्र कर दिया और उसकी घनी और गहरी खाई के पास पहुंचे जहाँ काले-काले रेशमी बाल उस द्वार की रक्षा कर रहे थे। कविता ने अपनी टांगें फैला दीं और समीर को अपनी उस गहरी खाई का दीदार कराया जो अब पूरी तरह गीली हो चुकी थी। समीर ने अपनी उंगली से उस खाई की गहराई को मापना शुरू किया, जिससे कविता की कराहें और भी तेज हो गईं। वह बार-बार कह रही थी, ‘समीर, मुझे और गहराई तक खोदो, मैं तुम्हारी होना चाहती हूँ।’ समीर ने अपनी उंगली से खोदना जारी रखा जिससे कविता का रस धीरे-धीरे बाहर निकलने लगा।

समीर ने अब अपनी पैंट उतारी और उसका विशाल और फौलादी खीरा बाहर निकल आया जो पूरी तरह से तन चुका था। कविता ने जैसे ही उस लंबे और मोटे खीरे को देखा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने तुरंत समीर के खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे चूसने लगी जैसे कोई स्वादिष्ट फल हो। समीर के मुँह से आनंद की एक लंबी आह निकली और उसने कविता के सिर को पकड़कर उसे और गहराई तक खीरा चूसने के लिए प्रेरित किया। कविता की जीभ जब खीरे के अगले हिस्से को छूती, तो समीर को स्वर्ग जैसा सुख महसूस होता था।

अब वह घड़ी आ गई थी जिसका दोनों को बेसब्री से इंतजार था। समीर ने कविता को बिस्तर पर लिटाया और खुद उसके ऊपर आ गया। उसने अपने खीरे की नोक को कविता की गीली और गर्म खाई के मुहाने पर रखा। कविता ने अपनी आँखें बंद कर लीं और समीर के कमर को मजबूती से पकड़ लिया। जैसे ही समीर ने एक जोरदार धक्का लगाया, उसका पूरा खीरा कविता की खाई के भीतर समा गया। कविता के मुँह से एक चीख निकली, जो दर्द और बेतहाशा आनंद का मिश्रण थी। ‘आह समीर, तुमने तो मुझे पूरा भर दिया!’ कविता ने सिसकते हुए कहा।

समीर ने अब सामने से खोदना शुरू किया, उसकी हर हरकत बहुत ही लयबद्ध और गहरी थी। जैसे-जैसे खुदाई की गति बढ़ती गई, बिस्तर की चूलें हिलने लगीं और कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछलने लगे। समीर हर धक्के के साथ कविता की खाई की गहराई को छू रहा था, जिससे वह पागल सी हो रही थी। ‘ओह समीर, और तेज, मुझे और जोर से खोदो, आज मेरा सब कुछ तुम्हारा है!’ कविता चिल्ला रही थी। उनके शरीर पसीने से लथपथ थे और आपस में चिपकने पर एक अजीब सी आवाज़ कर रहे थे जो कमरे के सन्नाटे को चीर रही थी।

कुछ देर बाद समीर ने कविता को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने के लिए तैयार किया। कविता ने घुटनों के बल झुककर अपने भारी पिछवाड़े को समीर की ओर कर दिया। समीर ने पीछे से उस गहरी खाई में अपना खीरा फिर से उतारा और अब खुदाई और भी भीषण हो गई थी। हर धक्के पर कविता के तरबूज लटक रहे थे और समीर उन्हें अपने हाथों से मसल रहा था। यह डॉगी स्टाइल खुदाई कविता को चरम सुख की ओर ले जा रही थी। उसकी साँसें उखड़ रही थीं और वह पूरी तरह से समीर के वश में थी, उसकी हर आह में एक समर्पण था।

खुदाई अब अपने अंतिम चरण पर थी और दोनों का शरीर बुरी तरह थरथरा रहा था। समीर ने कविता को फिर से सीधा लेटाया और अपनी गति को चरम सीमा तक पहुँचा दिया। कविता की खाई अब पूरी तरह से रस से भर चुकी थी और वह बस फटने ही वाली थी। ‘समीर, मेरा रस निकलने वाला है, मैं आ रही हूँ!’ कविता चिल्लाई। उसी क्षण समीर ने भी अपने खीरे से सारा सफेद रस कविता की खाई की गहराई में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे में सिमट गए और बिस्तर पर निढाल होकर गिर पड़े, उनका शरीर पसीने और प्रेम के रस से सराबोर था।

खुदाई खत्म होने के बाद कमरे में एक शांति छा गई, लेकिन वह शांति बहुत ही संतोषजनक थी। कविता समीर की छाती पर अपना सिर रखकर लेटी हुई थी और समीर उसके गीले बालों को सहला रहा था। उनकी साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं, लेकिन उनके चेहरों पर जो संतुष्टि थी, वह अनमोल थी। कविता ने समीर के गाल पर एक छोटा सा स्पर्श किया और कहा, ‘तुमने मुझे आज वह अहसास दिया जो मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था।’ समीर ने उसे और कसकर गले लगा लिया, उसे पता था कि यह सिर्फ एक जिस्मानी रिश्ता नहीं बल्कि दो प्यासी रूहों का मिलन था।

पूरी रात वे इसी तरह एक-दूसरे की बाहों में लिपटे रहे, कभी बातें करते तो कभी बस एक-दूसरे की धड़कनों को सुनते। सुबह की पहली किरण जब खिड़की से अंदर आई, तो कविता का चेहरा और भी चमक उठा था। उसके शरीर पर समीर के प्यार के निशान थे जिन्हें वह बड़े गर्व से देख रही थी। समीर ने महसूस किया कि इस अजनबी पड़ोसी के साथ उसका रिश्ता अब एक नए मोड़ पर आ चुका है, जहाँ कामुकता और भावनाएं एक-दूसरे में पूरी तरह विलीन हो चुकी थीं। वह एक ऐसी रात थी जिसने उनकी जिंदगी के सूखेपन को हमेशा के लिए खत्म कर दिया था।

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