कॉलेज फ्रेंड की रसीली चु@@ई—>समीर और काव्या की मुलाकात कॉलेज के दस लंबे वर्षों के बाद हुई थी, लेकिन आज भी उन दोनों के बीच वही पुरानी खामोश केमिस्ट्री जिंदा थी जो कभी शब्दों की मोहताज नहीं रही। काव्या के घर की मद्धम रोशनी में जब वे दोनों सोफे पर बैठे, तो वातावरण में एक अजीब सी मादकता और पुरानी यादों की महक घुली हुई थी जिसने समीर के दिल की धड़कनें तेज कर दी थीं। वह देख सकता था कि वक्त ने काव्या को और भी ज्यादा खूबसूरत और निखरा हुआ बना दिया है, उसकी हर अदा में अब एक परिपक्वता और गहरा आकर्षण साफ नजर आ रहा था जिसने समीर के मन में हलचल मचा दी थी।
काव्या ने आज एक गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी, जो उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को बड़ी बेरहमी से उभार रही थी, खासकर उसके वे भारी और सुडौल तरबूज जो ब्लाउज के भीतर से झांकने को बेताब लग रहे थे। जब वह अपनी गर्दन घुमाती, तो उसकी साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसक जाता और समीर की नजरें उसकी गहरी और मखमली खाई की उस हल्की सी झलक पर जाकर टिक जातीं जिसे देखकर उसके शरीर में बिजली सी दौड़ जाती थी। उसके चेहरे पर बिखरी लटें और उन लटों के पीछे छिपे उसके गुलाबी गाल समीर को मजबूर कर रहे थे कि वह आगे बढ़कर उस सुंदरता को अपनी बाहों में भर ले।
बातों-बातों में पुरानी यादें ताजा होने लगीं और समीर ने महसूस किया कि काव्या की बातों में एक तरह की गर्मजोशी और निमंत्रण छिपा हुआ था जो उसे और भी करीब खींच रहा था। काव्या ने जब अपनी रेशमी आवाज में समीर का नाम लिया, तो समीर के शरीर के भीतर एक अजीब सी तपन महसूस हुई और उसका खीरा अपनी जगह पर जोर मारने लगा, जैसे वह भी काव्या की मौजूदगी का जश्न मना रहा हो। उन दोनों के बीच का मानसिक और भावनात्मक जुड़ाव अब एक शारीरिक आकर्षण में बदलने लगा था, जहां हर एक शब्द और हर एक हंसी के पीछे एक गहरी दबी हुई वासना साफ झलक रही थी।
काव्या ने जब झुककर कॉफी का मग मेज पर रखा, तो उसके ब्लाउज के गहरे गले से उसके तरबूजों की गहरी लकीर समीर की आंखों के सामने पूरी तरह नुमाया हो गई, जिसने उसके सब्र का बांध तोड़ दिया। समीर की सांसें अब भारी होने लगी थीं और वह अपनी नजरें काव्या के उन उभरे हुए हिस्सों से हटा नहीं पा रहा था, जो हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। काव्या ने भी समीर की उस प्यासी नजर को भांप लिया था, और उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान के साथ शर्म की एक सुर्खी दौड़ गई, जिसने उसकी खूबसूरती में चार चांद लगा दिए थे।
थोड़ी झिझक के बाद समीर ने हिम्मत जुटाई और धीरे से अपना हाथ काव्या के हाथ पर रख दिया, जो सोफे के हत्थे पर रखा हुआ था, और उस पहले स्पर्श ने जैसे दोनों के शरीरों में आग लगा दी। काव्या ने अपना हाथ हटाया नहीं, बल्कि उसकी उंगलियां समीर की उंगलियों में उलझ गईं, और उस मखमली अहसास ने समीर के पूरे वजूद को झकझोर कर रख दिया। वह धीरे-धीरे काव्या के और करीब खिसका, और उन दोनों के बीच की बची-कुची दूरी भी अब मिटने लगी थी, जिससे उनके शरीरों की गर्मी एक-दूसरे को महसूस होने लगी थी।
समीर ने अपना चेहरा काव्या के चेहरे के पास लाया, तो उसे उसकी सांसों की खुशबू और उसके शरीर से उठने वाली उस भीनी-भीनी महक ने पूरी तरह मदहोश कर दिया। उसने काव्या के कानों के पास जाकर धीरे से फुसफुसाया, “तुम आज भी उतनी ही हसीन हो काव्या, शायद पहले से भी कहीं ज्यादा,” और यह कहते ही उसने उसके गले पर एक प्यार भरा स्पर्श किया। काव्या की आंखें धीरे से बंद हो गईं और उसके मुंह से एक हल्की सी कराह निकली, जिसने समीर के भीतर छिपे हुए तूफान को और भी ज्यादा हवा दे दी, और अब वह पीछे हटने वाला नहीं था।
समीर के हाथ अब काव्या की कमर पर रेंगने लगे थे, जहां साड़ी और ब्लाउज के बीच की नग्न त्वचा का अहसास किसी मखमल से कम नहीं था, और उसकी उंगलियां वहां दबाव बनाने लगी थीं। उसने धीरे से काव्या के चेहरे को अपनी ओर मोड़ा और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए, और उस गहरे संगम ने जैसे समय को वहीं रोक दिया। काव्या ने भी पूरी शिद्दत से समीर का साथ दिया, और उसके हाथ समीर के बालों में उलझ गए, जैसे वह भी इस पल का बरसों से इंतजार कर रही हो, उनकी सांसें अब एक-दूसरे में घुलने लगी थीं।
जैसे-जैसे उत्तेजना बढ़ने लगी, समीर के हाथ काव्या के तरबूजों की ओर बढ़े और उसने उन्हें साड़ी के ऊपर से ही अपनी हथेलियों में भर लिया, जिससे काव्या के बदन में एक सिहरन दौड़ गई। वह उनके भारीपन और कोमलता को महसूस कर रहा था, और उसकी उंगलियां तरबूजों के ऊपर मौजूद उन छोटे मटरों को ढूंढने लगीं जो उत्तेजना के मारे अब पूरी तरह सख्त हो चुके थे। काव्या की सांसें तेज हो गई थीं और वह समीर के सीने से लग गई, जैसे वह अपने भीतर उठ रहे उस कामुक ज्वार को थामने की कोशिश कर रही हो।
समीर ने अब काव्या की साड़ी के पल्लू को धीरे से कंधे से नीचे सरका दिया, जिससे उसके गोल और सुडौल कंधे पूरी तरह उजागर हो गए, और उसने वहां अपनी जीभ से प्यार जताना शुरू किया। काव्या की गर्दन के पीछे जब समीर के गीले होंठों का अहसास हुआ, तो वह कांप उठी और उसने समीर को और भी मजबूती से अपनी बाहों में जकड़ लिया। समीर ने अब अपने हाथों को काव्या के ब्लाउज के हुकों तक पहुँचाया और एक-एक करके उन्हें खोलने लगा, जिससे काव्या की धड़कनें और भी ज्यादा बढ़ गईं और कमरे का तापमान जैसे अचानक बढ़ गया।
ब्लाउज खुलते ही काव्या के विशाल और गोरे तरबूज समीर की आंखों के सामने आजाद हो गए, जिनके ऊपर के मटर गुलाबी और बेहद उत्तेजक लग रहे थे, जिन्हें देखकर समीर की लार टपकने लगी। उसने बिना देर किए अपना मुंह एक तरबूज पर जमा दिया और उसे पूरी शिद्दत से चूसने लगा, जबकि उसकी उंगलियां दूसरे तरबूज के मटर को मसल रही थीं। काव्या ने अपनी कमर ऊपर की ओर उचकाई और उसकी कराहें अब कमरे की खामोशी को चीर रही थीं, वह समीर के सिर को अपने वक्षस्थल पर और भी जोर से दबाने लगी थी।
समीर ने अब काव्या को सोफे से उठाकर बिस्तर की ओर रुख किया, और वहां लेटाकर उसने उसकी साड़ी और पेटीकोट को पूरी तरह से अलग कर दिया, जिससे काव्या का पूरा बदन अब समीर के सामने नग्न था। उसकी नजरें काव्या की जांघों के बीच की उस रेशमी और नम खाई पर जाकर टिक गईं, जहां सुनहरे और काले बाल उस गुप्त द्वार की रखवाली कर रहे थे। समीर ने धीरे से अपनी उंगलियां उस खाई की ओर बढ़ाईं और जैसे ही उसने उसे छुआ, काव्या के शरीर में एक जोरदार झटका लगा क्योंकि उसकी खाई पहले से ही पूरी तरह रसीली और गीली हो चुकी थी।
समीर ने अब अपनी जीभ का इस्तेमाल शुरू किया और काव्या की खाई चाटना शुरू कर दिया, जिससे निकलने वाले उस दिव्य रस का स्वाद उसे और भी ज्यादा उत्तेजित कर रहा था। काव्या के हाथ बिस्तर की चादर को कसकर पकड़ चुके थे और वह अपना सिर इधर-उधर पटक रही थी, समीर की जीभ उसकी खाई के हर कोने को गहराई से सहला रही थी। वह कभी अपनी उंगली से खोदना शुरू करता तो कभी अपनी जीभ से उस मखमली छेद को सहलाता, जिससे काव्या की उत्तेजना अपने चरम बिंदु की ओर तेजी से बढ़ने लगी थी।
जब काव्या ने समीर के पैंट को नीचे खिसकाया, तो उसका विशाल और फन उठाता हुआ खीरा बाहर निकल आया, जिसे देखकर काव्या की आंखों में एक अलग ही चमक और प्यास नजर आई। उसने समीर के खीरे को अपने नाजुक हाथों में थामा और उसे अपनी हथेलियों के बीच रगड़ने लगी, जिससे समीर के मुंह से एक गहरी आह निकली। फिर काव्या ने धीरे से समीर का खीरा मुंह में लेना शुरू किया और उसे इतनी बारीकी और प्यार से चूसने लगी कि समीर को लगा जैसे वह स्वर्ग के द्वार पर खड़ा हो, उसका खीरा अब पत्थर की तरह सख्त और गरम हो चुका था।
अब समीर से और इंतजार नहीं हो रहा था, उसने काव्या को बिस्तर पर सीधा लेटाया और उसके पैरों को अपने कंधों पर रख लिया, जिससे उसकी खाई पूरी तरह से खुदाई के लिए खुल गई। उसने अपने खीरे की नोक को उस रसीली खाई के मुहाने पर रखा और एक गहरा दबाव बनाया, जिससे उसका आधा खीरा एक ही झटके में काव्या के भीतर समा गया। काव्या ने एक जोर की चीख मारी और उसकी आंखें फटी की फटी रह गई, लेकिन उस दर्द में भी एक असीम आनंद छिपा था जिसने उसे समीर की कमर के चारों ओर अपनी टांगें कसने पर मजबूर कर दिया।
समीर ने अब सामने से खोदना (Missionary) शुरू किया, उसके हर धक्के के साथ काव्या के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके शरीरों के टकराने की आवाज कमरे में गूँज रही थी। “ओह समीर, तुम बहुत गहरे जा रहे हो… मुझे और जोर से खोदो,” काव्या ने समीर के कानों में उत्तेजना भरी आवाज में कहा, जिससे समीर के धक्कों की रफ्तार और भी ज्यादा बढ़ गई। वह पूरी ताकत से अपने खीरे को काव्या की गहराई तक उतार रहा था, और हर धक्के के साथ काव्या का बदन पसीने से तर-बतर होता जा रहा था, लेकिन उसकी प्यास जैसे बुझने का नाम नहीं ले रही थी।
कुछ देर बाद समीर ने काव्या की पोजीशन बदली और उसे घुटनों के बल लाकर पिछवाड़े से खोदना (Doggy) शुरू किया, जिससे उसे और भी ज्यादा गहराई और आनंद मिलने लगा। काव्या के पीछे का हिस्सा अब समीर के सामने था, और वह उसके पिछवाड़े को अपने हाथों से सहलाते हुए अपनी खुदाई जारी रखे हुए था, जिससे काव्या मदहोश होकर चिल्ला रही थी। उसका पूरा बदन थरथरा रहा था और उसकी खाई से निकलने वाला रस अब समीर के खीरे को पूरी तरह से चिकना बना चुका था, जिससे हर धक्का और भी ज्यादा सुगम और आनंददायक हो गया था।
दोनों ही अब अपने रस निकलने के करीब थे, समीर की सांसें अब अनियंत्रित हो चुकी थीं और काव्या का शरीर झटके ले रहा था, वह बस अब और कुछ पलों की मोहताज थी। समीर ने अपनी रफ्तार को और तेज कर दिया, वह अब बिना रुके पूरी ताकत से काव्या के भीतर अपने खीरे को झोंक रहा था, और अंत में एक जोरदार धक्के के साथ समीर का पूरा गर्म रस काव्या की खाई के भीतर छूट गया। ठीक उसी वक्त काव्या का भी रस निकल गया, और वह पूरी तरह से निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ी, उसका पूरा शरीर एक अजीब से सुकून और थकान से भर गया था।
खुदाई खत्म होने के बाद समीर काव्या के बगल में ही लेट गया और उसे अपनी बाहों में भर लिया, दोनों के जिस्म अभी भी पसीने से भीगे हुए थे और उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। काव्या ने अपना सिर समीर के सीने पर रख दिया और समीर ने उसके माथे को चूमते हुए उसे अपनी ओर और जोर से सटा लिया, जैसे वे दोनों अब हमेशा के लिए एक हो चुके हों। उस रात की वह खुदाई और वह रसीला अनुभव उन दोनों के जेहन में हमेशा के लिए एक खूबसूरत याद बनकर बस गया, जिसने उनके पुराने रिश्ते को एक नई और गहरी पहचान दे दी थी।