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जवान चाची की चु@@ई

मई की वो तपती हुई दोपहर जब पूरा मोहल्ला गहरी नींद में सोया हुआ था, पुराने पुश्तैनी मकान के सन्नाटे में एक अलग ही बेचैनी पल रही थी। निखिल जो अपनी पढ़ाई पूरी करके शहर से लौटा था, उसकी नज़रें बार-बार रसोई की तरफ जा रही थीं जहाँ उसकी जवान चाची सुनीता काम में व्यस्त थीं। सुनीता की उम्र अभी मात्र बत्तीस साल थी, लेकिन उनके शरीर का उतार-चढ़ाव किसी भी पुरुष को विचलित करने के लिए काफी था। उनके शरीर की बनावट ऐसी थी कि सूती साड़ी भी उनके अंगों की उभार को छिपाने में नाकाम साबित हो रही थी। निखिल के मन में दबे हुए अरमान अब धीरे-धीरे सिर उठाने लगे थे और आज घर में कोई नहीं था।—>गर्मियों की उस दोपहर में सुनीता चाची ने एक बहुत ही पतली और पारभासी साड़ी पहन रखी थी जो उनके भीगे हुए शरीर से चिपक सी गई थी। उनके पीछे का हिस्सा यानी उनका भारी पिछवाड़ा जब चलते समय हिलता, तो निखिल के दिल की धड़कनें तेज हो जाती थीं। उनके सीने पर सजे दो विशाल तरबूज साड़ी के पल्लू से बाहर निकलने को बेताब दिख रहे थे और उनकी गहरी खाई का नज़ारा निखिल को मदहोश कर रहा था। निखिल ने खिड़की से देखा कि कैसे पसीना उनकी गर्दन से होता हुआ नीचे उतर रहा था, जिससे उनके अंगों की चमक और भी बढ़ गई थी।

निखिल पिछले कई सालों से चाची के प्रति इस आकर्षण को अपने दिल में दबाए बैठा था, लेकिन आज उनकी खूबसूरती ने सारी हदें पार कर दी थीं। चाची के तरबूज इतने पुष्ट और रसीले लग रहे थे कि निखिल का मन किया कि बस अभी जाकर उन्हें अपनी बाहों में भर ले। चाची का पिछवाड़ा जब भी मुड़ता, निखिल की आँखों में एक चमक सी आ जाती और उसका खीरा अपनी जगह पर फन उठाने लगता था। वह जानता था कि चाची भी अकेलेपन से जूझ रही हैं क्योंकि चाचा अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर ही रहते थे। यही वो मौका था जिसका निखिल को शायद सालों से इंतज़ार था और आज उसकी हिम्मत जवाब दे रही थी।

धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए निखिल रसोई के दरवाजे तक पहुँचा और चाची को पीछे से देखा जो सिंक पर बर्तन धो रही थीं। उनकी झुकी हुई कमर और उभरा हुआ पिछवाड़ा उसे अपनी ओर खींच रहा था, जैसे कोई चुंबक हो। निखिल ने अपनी धड़कनों को काबू करने की कोशिश की, लेकिन चाची के शरीर की खुशबू ने उसे पागल कर दिया था। उसने देखा कि चाची के ब्लाउज के पीछे से उनकी गोरी पीठ साफ़ झलक रही थी और साड़ी का पल्लू कंधे से सरक कर नीचे गिर गया था। अब उनके तरबूज का एक हिस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था जो हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहा था, जिससे निखिल का संयम टूटने लगा।

निखिल को अपने पास पाकर सुनीता चाची अचानक चौंक गईं, लेकिन उनकी आँखों में गुस्सा नहीं बल्कि एक अजीब सी चमक और शरम थी। उन्होंने अपना पल्लू सहेजने की कोशिश की, लेकिन निखिल ने हिम्मत दिखाते हुए उनका हाथ पकड़ लिया और उन्हें अपनी ओर खींचा। दोनों की सांसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं और रसोई की गर्मी अब जिस्मानी गर्मी में बदलने लगी थी। चाची ने हल्की आवाज़ में विरोध किया, लेकिन उनकी पकड़ ढीली थी, जिससे साफ़ था कि वह भी इस पल का इंतज़ार कर रही थीं। निखिल ने बिना कुछ कहे उनके चेहरे को अपने हाथों में लिया और उनके होठों का रसपान करना शुरू कर दिया।

सुनीता चाची ने पहले तो थोड़ा संकोच किया, लेकिन फिर वह भी इस प्रवाह में बह गईं और निखिल के बालों में अपनी उंगलियां फँसा दीं। निखिल के हाथों ने अब अपना रास्ता बनाना शुरू किया और वह चाची के भारी तरबूज की गोलाई को सहलाने लगा। सूती कपड़े के ऊपर से ही उन तरबूज की गर्मी निखिल की हथेलियों को जला रही थी और उसने महसूस किया कि उनके मटर अब कड़े होकर उभड़ आए थे। चाची के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकली, जिसने निखिल के खीरे में और भी जान फूंक दी। उसने धीरे से साड़ी के पल्लू को पूरी तरह हटा दिया, जिससे चाची का ऊपरी शरीर अब केवल पतले ब्लाउज के सहारे था।

निखिल ने अब ब्लाउज की हुक एक-एक करके खोलना शुरू किया, जैसे वह किसी अनमोल खजाने को खोलने जा रहा हो। जैसे ही ब्लाउज खुला, चाची के सफ़ेद और विशाल तरबूज आज़ाद होकर बाहर आ गए, जिन पर गुलाबी रंग के मटर चमक रहे थे। निखिल ने अपना चेहरा उन दोनों के बीच में रख दिया और उनकी कोमलता का अहसास करने लगा, जबकि चाची ने कसकर उसका सिर अपने सीने से सटा लिया। चाची का शरीर अब थरथराने लगा था और उनकी आँखों में कामुकता का साफ़ साया था। निखिल ने झुककर एक मटर को अपने मुँह में लिया और उसे जीभ से सहलाने लगा, जिससे चाची के शरीर में बिजली सी दौड़ गई।

अब निखिल का हाथ नीचे की ओर बढ़ा और उसने चाची के पेट को सहलाते हुए पेटीकोट की डोरी ढीली कर दी। जैसे ही साड़ी और पेटीकोट जमीन पर गिरे, चाची का पूरा नग्न शरीर निखिल के सामने था, जो किसी अप्सरा से कम नहीं लग रहा था। उनके पिछवाड़े की गोलाई और पैरों के बीच छिपी हुई घनी और नम खाई निखिल को पागल कर देने के लिए काफी थी। उस खाई के आस-पास थोड़े बहुत काले बाल थे जो उसकी प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ा रहे थे। निखिल ने चाची को वहीं स्लैब पर बैठा दिया और उनकी दोनों टांगों को फैलाकर उस गहरी खाई का नज़ारा लेने लगा जो अब पूरी तरह भीग चुकी थी।

निखिल ने अपनी जीभ से खाई चाटना शुरू किया, जिससे सुनीता चाची ने अपनी पीठ कमान की तरह मोड़ ली और ज़ोर-ज़ोर से सिसकारियां भरने लगीं। उनके हाथ निखिल के कंधों को कसकर पकड़े हुए थे और उनकी खाई से निकलता रस निखिल के मुँह का स्वाद बढ़ा रहा था। निखिल की उंगलियां भी शांत नहीं थीं, वह एक मटर को मसल रहा था तो दूसरी तरफ खाई में उंगली डाल कर उसकी गहराई नाप रहा था। चाची अब पूरी तरह से समर्पण कर चुकी थीं और उनका शरीर खुदाई के लिए व्याकुल हो उठा था। उन्होंने निखिल के पेंट की ज़िप खोली और उसके अकड़े हुए खीरे को बाहर निकाला, जो अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ खड़ा था।

सुनीता चाची ने पहली बार निखिल के इतने बड़े और सख्त खीरे को देखा तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं, लेकिन अगले ही पल उन्होंने उसे थाम लिया। उन्होंने धीरे-धीरे खीरा मुंह में लेना शुरू किया और उसे अपनी जीभ की गर्मी से सहलाया, जिससे निखिल की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। खीरे का ऊपरी हिस्सा जब उनकी जीभ से टकराता, तो निखिल के मुँह से कराह निकल जाती थी। चाची ने काफी देर तक खीरा चूसना जारी रखा, जिससे निखिल का उत्तेजना का स्तर अपने चरम पर पहुँच गया। अब निखिल और सब्र नहीं कर सकता था, उसने चाची को सीधा खड़ा किया और उन्हें स्लैब की ओर झुका दिया।

अब पिछवाड़े से खोदना यानी डॉगी स्टाइल में निखिल ने अपनी तैयारी की और अपने खीरे के सिरे को चाची की नम खाई के द्वार पर रखा। जैसे ही उसने पहला धक्का मारा, चाची की चीख निकल गई क्योंकि निखिल का खीरा काफी मोटा था, लेकिन धीरे-धीरे वह उनकी गहराई में समाने लगा। चाची ने अपने हाथों से स्लैब को कसकर पकड़ लिया और उनके भारी तरबूज हवा में झूलने लगे। निखिल ने अपनी रफ़्तार बढ़ाई और हर धक्के के साथ चाची का पूरा शरीर हिलने लगा। खुदाई की आवाज़ उस सुनसान रसोई में गूँज रही थी और दोनों के शरीर से निकलने वाला पसीना उन्हें और भी ज्यादा कामुक बना रहा था।

कुछ देर तक पीछे से आनंद लेने के बाद, निखिल ने चाची को घुमाया और उन्हें स्लैब पर लिटाकर सामने से खोदना शुरू किया। इस स्थिति में चाची के दोनों तरबूज निखिल के हाथों में थे और वह उन्हें बुरी तरह मसलते हुए अपनी खुदाई जारी रखे हुए था। चाची अपनी टांगें निखिल की कमर के चारों ओर लपेट चुकी थीं ताकि वह और भी गहराई तक पहुँच सके। हर धक्के के साथ निखिल का खीरा चाची की खाई की दीवारों को रगड़ते हुए अंदर जा रहा था, जिससे चाची का चेहरा ख़ुशी और दर्द के मिले-जुले भावों से भर गया था। वह निखिल के कानों में फुसफुसा रही थीं, “और ज़ोर से निखिल… मुझे पूरी तरह खोद डालो…”

निखिल अब अपनी पूरी ताकत से धक्के लगा रहा था और चाची का पूरा शरीर थर-थर कांप रहा था। रसोई के उस कोने में प्यार और हवस का ऐसा मंजर था जो शायद ही किसी ने सोचा होगा। निखिल ने चाची के मटर को अपने दांतों से हल्का काटा, जिससे उनकी उत्तेजना और भी बढ़ गई। अब दोनों का अंत करीब था, खाई की गर्मी और खीरे की रगड़ ने उन्हें चरम सीमा पर पहुँचा दिया था। निखिल ने अपनी रफ़्तार को दोगुना कर दिया और चाची के शरीर में हो रही हलचल बता रही थी कि उनका भी रस निकलने वाला है। चाची ने निखिल को कसकर जकड़ लिया और ज़ोर-ज़ोर से सांसें लेने लगीं।

अंततः, एक ज़ोरदार धक्के के साथ निखिल का सारा गरम लावा यानी रस निकलना शुरू हुआ और वह चाची की खाई की गहराइयों में समा गया। उसी समय चाची का भी रस छूटना शुरू हुआ और उनका शरीर पूरी तरह ढीला पड़ गया। दोनों काफी देर तक उसी अवस्था में एक-दूसरे से लिपटे रहे, उनकी सांसें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। रसोई के फर्श पर गिरे हुए कपड़े और बिखरा हुआ सामान उस तूफ़ान की गवाही दे रहे थे जो अभी-अभी वहाँ थमा था। निखिल ने चाची के माथे को चूमा और उन्हें अपनी बाहों में भर लिया, सुनीता चाची की आँखों में अब एक संतुष्टि और सुकून की चमक थी जो उन्होंने सालों से महसूस नहीं की थी।

इस अद्भुत खुदाई के बाद दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा और बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह दिया। चाची ने धीरे से अपने कपड़े समेटे और निखिल को एक शरारती मुस्कान दी, जैसे यह तो बस शुरुआत हो। निखिल को भी अहसास हुआ कि आज उसने न केवल अपनी प्यास बुझाई है, बल्कि चाची के अकेलेपन को भी दूर किया है। उस दिन के बाद से, पुश्तैनी मकान की वो दीवारें कई ऐसी रातों और दोपहरों की गवाह बनीं, जहाँ निखिल और चाची अपनी इच्छाओं को नई उड़ान देते रहे। उनके बीच का यह गुप्त रिश्ता अब और भी गहरा और मज़बूत हो चुका था, जो समाज की नज़रों से दूर, सिर्फ उनकी अपनी दुनिया थी।

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