मानव शहर के एक नए अपार्टमेंट में शिफ्ट हुआ था जहाँ उसकी पड़ोसन कविता एक बेहद आकर्षक और परिपक्व महिला थी जिसकी उम्र लगभग पैंतीस साल रही होगी। कविता का शरीर किसी तराशी हुई मूरत की तरह था जिसमें उसके उभार और ढलान किसी भी मर्द के मन में हलचल पैदा कर देने के लिए काफी थे। वह अक्सर रेशमी साड़ियाँ पहनती थी जो उसके शरीर के हर वक्र को बड़ी शिद्दत से उभारती थीं और जब वह चलती थी तो उसके भारी कूल्हों की मटक मानव की धड़कनें बढ़ा देती थी। मानव अभी जवान था और उसने कभी भी इतनी कामुक महिला को अपने इतने करीब नहीं देखा था जिसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई और तड़प साफ झलकती थी।
कविता के शरीर की बनावट वाकई कमाल की थी और उसकी साड़ी के पतले पल्लू के नीचे से उसके बड़े और रसीले तरबूज आधे से ज्यादा साफ नजर आते थे जो हर सांस के साथ ऊपर-नीचे होते थे। उसके तरबूजों की गोलाई इतनी मुकम्मल थी कि मानव अक्सर उन्हें देखते हुए ख्यालों में खो जाता था और सोचता था कि उन्हें छूने पर कैसा अहसास होगा। उसके चेहरे की रंगत और उस पर छोटी सी बिंदी उसे और भी ज्यादा गरिमामय और आकर्षक बनाती थी लेकिन उसकी आँखों में छिपी कामुकता कुछ और ही कहानी बयां करती थी जिसे मानव धीरे-धीरे समझने लगा था।
उन दोनों के बीच धीरे-धीरे बातचीत शुरू हुई जो पहले सिर्फ औपचारिक थी लेकिन वक्त के साथ उसमें एक भावनात्मक खिंचाव पैदा होने लगा जो काफी गहरा था। कविता अक्सर मानव को चाय पर बुलाती या कभी कुछ खाने को दे जाती और उस दौरान उनकी बातें घंटों तक चलती रहती थीं जहाँ वे अपनी पसंद-नापसंद साझा करते थे। मानव को महसूस होने लगा था कि कविता के वैवाहिक जीवन में शायद वह गर्माहट नहीं थी जिसकी वह हकदार थी और यही खालीपन उसे मानव के करीब ला रहा था। उन दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता पनपने लगा था जो दोस्ती से कहीं बढ़कर था और जिसमें जिस्मानी भूख भी शामिल थी।
एक दोपहर जब बाहर बहुत तेज धूप थी और लू चल रही थी, कविता मानव के घर कुछ सामान देने आई और गर्मी की वजह से उसका पसीना उसकी गर्दन से होता हुआ उसके तरबूजों की घाटी में उतर रहा था। मानव उसे देख रहा था और उसकी बढ़ती हुई सांसें कमरे के सन्नाटे में गूँजने लगी थीं क्योंकि उस वक्त कविता की साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसक गया था जिससे उसके तरबूजों का ऊपरी हिस्सा और भी ज्यादा साफ दिखने लगा था। कविता ने भी मानव की नज़रों को अपने जिस्म पर टिके हुए महसूस किया लेकिन उसने नज़रे नहीं हटाईं बल्कि एक हल्की सी मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा जिसने मानव के भीतर दबी हुई इच्छाओं की आग को हवा दे दी।
मानव ने हिम्मत जुटाकर कविता का हाथ थाम लिया और उसे अपनी तरफ खींचा तो वह बिना किसी विरोध के उसके करीब आ गई और उसके सीने से लग गई। कविता के शरीर की खुशबू और उसके तरबूजों का नरम अहसास मानव के सीने पर ऐसा जादू कर रहा था कि उसका खीरा अपने आप ही कड़ा होने लगा और उसकी पैंट में हलचल मच गई। दोनों एक-दूसरे की आँखों में देख रहे थे जहाँ अब झिझक खत्म हो चुकी थी और केवल एक-दूसरे को पाने की तीव्र इच्छा शेष थी जो बरसों की प्यास की तरह दोनों के मन में सुलग रही थी।
मानव ने धीरे से कविता के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके होंठों पर अपना दबाव बनाया जिससे कविता के मुंह से एक धीमी सी आह निकली। उसने कविता की साड़ी के पल्लू को धीरे से कंधे से नीचे गिरा दिया जिससे उसके दोनों विशाल और रसीले तरबूज अब सिर्फ एक पतले से ब्लाउज की कैद में थे जो उनके बोझ से फटने को तैयार थे। मानव ने अपने हाथों से उन तरबूजों को सहलाना शुरू किया और उनके बीच की गहराई को अपनी उंगलियों से महसूस करने लगा जिससे कविता का शरीर कामुकता के मारे कांपने लगा और उसने अपनी आँखें मूँद लीं।
जैसे-जैसे स्पर्श बढ़ता गया, मानव ने कविता के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोल दिए और उसके दोनों तरबूज आज़ाद होकर बाहर छलक आए जिनकी नोक पर लगे छोटे मटर के दाने ठंड और उत्तेजना से पूरी तरह सख्त हो चुके थे। मानव ने झुककर एक मटर को अपने मुंह में लिया और उसे धीरे से चूसने लगा जिससे कविता के पैर लड़खड़ाने लगे और उसने मानव के बालों को कसकर पकड़ लिया। वह अपनी कमर को आगे-पीछे कर रही थी जिससे उसके शरीर की गर्मी और खुशबू मानव के दिमाग पर चढ़ती जा रही थी और उसका खीरा अब पूरी तरह से बाहर आने को बेताब था।
मानव ने कविता को उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया और उसकी साड़ी और पेटीकोट को धीरे-धीरे पैरों की तरफ खींचकर उतार दिया जिससे उसकी रेशमी और गहरी खाई अब पूरी तरह से बेपर्दा हो गई थी। उस खाई के आसपास काले घने बाल थे जो उसकी सुंदरता को और भी बढ़ा रहे थे और वहाँ से एक प्राकृतिक गंध आ रही थी जो कामुकता का चरम थी। मानव ने अपनी उंगली से खाई के किनारों को छुआ तो पाया कि वह पहले से ही काफी गीली और रसीली हो चुकी थी जैसे वह किसी बीज के आने का इंतज़ार कर रही हो और उस छुअन से कविता ने अपनी कमर ऊपर उठाकर आह भरी।
मानव ने अब अपना खीरा पूरी तरह से नंगा कर लिया जो अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ गर्व से खड़ा था और उसकी नसें उत्तेजना से फड़क रही थीं। उसने कविता की दोनों टांगों को फैलाया और उसकी खाई के मुहाने पर अपने खीरे को टिका दिया जहाँ से रस की कुछ बूंदें पहले ही निकल चुकी थीं। कविता ने मानव की आँखों में देखते हुए कहा, “मानव, आज मुझे अपनी पूरी खुदाई से भर दो, मैं बहुत समय से इस पल का इंतज़ार कर रही थी, मुझे अंदर तक महसूस करो।” मानव ने एक गहरा सांस लिया और धीरे से अपने खीरे का सिरा उसकी खाई के भीतर धकेलना शुरू किया।
जैसे ही खीरे ने पहली बार खाई की दीवारों को छुआ, कविता के चेहरे पर दर्द और सुख का एक मिला-जुला भाव आया और उसने अपने नाखून मानव की पीठ में गड़ा दिए। खाई बहुत तंग और गर्म थी जो खीरे को हर तरफ से कसकर जकड़ रही थी जिससे मानव को ऐसा लगा जैसे वह जन्नत के द्वार पर खड़ा हो। उसने धीरे-धीरे पूरा खीरा अंदर उतार दिया और जब वह पूरी तरह समा गया तो दोनों कुछ पल के लिए शांत हो गए और बस एक-दूसरे की सांसों और धड़कनों को महसूस करते रहे जो अब एक ही लय में चल रही थीं।
अब मानव ने धीरे-धीरे बाहर-भीतर होने की प्रक्रिया शुरू की जिसे खुदाई कहा जा सकता है और हर धक्के के साथ कविता के मुंह से सुरीली कराहें निकलने लगीं। वह अपने पिछवाड़े को ऊपर उठाकर मानव के हर धक्के का स्वागत कर रही थी और उसके दोनों तरबूज हवा में बुरी तरह झूल रहे थे जो देखने में बेहद उत्तेजक लग रहे थे। मानव ने रफ्तार बढ़ाई और अब खुदाई की आवाज़ कमरे में गूँजने लगी थी जिसमें कविता की चप-चप की आवाज़ और उसकी उत्तेजित सिसकियां शामिल थीं जो इस माहौल को और भी ज्यादा नशीला बना रही थीं।
मानव ने अब कविता को घुमाकर उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया जिससे उसे और भी ज्यादा गहराई तक पहुँचने का मौका मिला और कविता अपने घुटनों के बल बैठकर झटके खा रही थी। उसका पिछवाड़ा इतना मांसल और मुलायम था कि हर धक्के पर वह थरथरा उठता था और मानव का खीरा उसकी गहराई में गोते लगा रहा था। कविता बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थी और उसकी बिखरी हुई जुल्फें और पसीने से भीगा चेहरा उसे किसी अप्सरा की तरह दिखा रहा था जो अपनी पूरी मर्यादा भूलकर बस उस लम्हे को जी रही थी।
खुदाई अपने चरम पर पहुँच चुकी थी और दोनों का शरीर पसीने से तरबतर था लेकिन थकावट का नामोनिशान नहीं था क्योंकि कामुकता की आग उन्हें और भी ऊर्जा दे रही थी। मानव ने फिर से उसे सामने से खोदना शुरू किया और अब उसकी रफ्तार बहुत तेज हो गई थी क्योंकि उसे महसूस हो रहा था कि उसका रस निकलने वाला है। कविता की खाई भी अब बहुत ज्यादा रस छोड़ रही थी जिससे खुदाई और भी आसान और मजेदार हो गई थी और वह भी अपने रस छूटने के करीब थी क्योंकि उसका पूरा बदन बुरी तरह कांप रहा था।
अचानक कविता ने मानव को कसकर जकड़ लिया और उसका पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया क्योंकि उसकी खाई से रस निकलने लगा था और वह चरम सुख की गहराइयों में खो गई थी। उसी पल मानव ने भी अपने खीरे से सारा रस उसकी खाई की गहराई में उड़ेल दिया जिससे उसे एक असीम शांति और संतुष्टि का अहसास हुआ। दोनों एक-दूसरे के ऊपर ढह गए और उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं लेकिन उस कमरे की हवा में अभी भी उस प्यार और खुदाई की महक रची-बसी थी जो उनके नए रिश्ते की शुरुआत थी।
कुछ देर बाद जब दोनों शांत हुए तो कविता ने मानव के माथे को चूमा और उसकी बाहों में सिमट गई जहाँ उसे वह सुकून मिला जिसकी उसे तलाश थी। उसकी हालत अभी भी अस्त-व्यस्त थी, उसके बाल बिखरे थे और उसके तरबूजों पर मानव के हाथों के निशान थे लेकिन उसके चेहरे पर एक ऐसी संतुष्टि थी जो शब्दों में बयान नहीं की जा सकती थी। मानव को भी अहसास हुआ कि यह सिर्फ शारीरिक जरूरत नहीं थी बल्कि दो रूहों का मिलन था जिसने उन्हें हमेशा के लिए एक-दूसरे के साथ एक अटूट बंधन में बाँध दिया था।