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जवान माँ की खुदाई


जवान माँ की खुदाई —>

बारिश की उस काली और घनी रात में घर के भीतर एक अजीब सी खामोश बेचैनी फैली हुई थी, जो रोहन के दिल की धड़कनों को तेज़ कर रही थी। कविता, जो उसकी सौतेली माँ थी, ने आज पीले रंग की एक बहुत ही महीन और पारदर्शी साड़ी पहनी हुई थी, जिससे उसके शरीर की बनावट साफ़ झलक रही थी। रोहन उसे रसोई में काम करते हुए देख रहा था और उसके मन में अपनी माँ के प्रति एक ऐसी उत्तेजना जाग रही थी जो उसे अंदर ही अंदर जला रही थी। बाहर बिजली कड़क रही थी और अंदर रोहन के जज्बात उफान मार रहे थे।

कविता का शरीर किसी तराशी हुई मूरत जैसा था, जिसके भारी और रसीले तरबूज साड़ी के ब्लाउज से बाहर निकलने को बेताब लग रहे थे। जब वह झुकती थी, तो उसके तरबूजों के बीच की गहरी लकीर रोहन की आँखों को अपनी ओर खींच लेती थी और वह चाहकर भी अपनी नज़रें नहीं हटा पाता था। उसके बदन की खुशबू पूरे कमरे में महक रही थी और उसके मटर साड़ी के पतले कपड़े के ऊपर से ही अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे, जिससे रोहन का खीरा अपनी जगह पर सख्त होने लगा था। उसका पिछवाड़ा साड़ी में इतना उभार लिए हुए था कि रोहन का मन उसे सहलाने के लिए मचल उठा।

रोहन पिछले कई दिनों से कविता की बढ़ती नजदीकियों को महसूस कर रहा था, लेकिन आज की रात कुछ अलग थी। कविता के पति यानी रोहन के पिता शहर से बाहर थे, और पूरा घर खाली था। जैसे ही रोहन रसोई में पानी पीने पहुँचा, कविता ने मुड़कर उसे देखा और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। उसने रोहन के हाथ को धीरे से छुआ, जिससे रोहन के पूरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। उस स्पर्श में एक छिपी हुई चाहत और बरसों की तड़प साफ़ महसूस की जा सकती थी, जिसने दोनों के बीच की झिझक को पल भर में खत्म कर दिया।

कविता की साँसें तेज हो रही थीं और उसने धीरे से रोहन के कंधे पर अपना सिर रख दिया, जैसे वह किसी बड़े सहारे की तलाश में हो। रोहन ने अपनी कांपती हुई उंगलियों से कविता के रेशमी बालों को छुआ और फिर धीरे-धीरे अपना हाथ उसके कंधों से नीचे ले जाने लगा। वह अब भी डरा हुआ था, लेकिन कविता की आहें उसे आगे बढ़ने का इशारा दे रही थीं। उसने कविता की कमर को कसकर पकड़ लिया और उसे अपनी ओर खींच लिया, जिससे कविता के कोमल तरबूज रोहन की मजबूत छाती से पूरी तरह दब गए।

रोहन ने अपना चेहरा कविता के गले के पास ले जाकर उसकी खुशबू को गहराई से महसूस किया और धीरे-धीरे उसके कानों के पास फुसफुसाया, माँ, आप आज बहुत खूबसूरत लग रही हैं। कविता ने शरमाते हुए अपनी आँखें बंद कर लीं और रोहन को और भी मजबूती से जकड़ लिया। रोहन के हाथ अब कविता के पिछवाड़े पर पहुँच चुके थे, जहाँ वह साड़ी के ऊपर से ही उसके मांसल हिस्से को दबाने लगा। कविता के मुँह से एक दबी हुई कराह निकली, जो रोहन के लिए किसी संगीत से कम नहीं थी। उसने धीरे से साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा दिया।

अब रोहन के सामने कविता के वो उभरे हुए तरबूज थे, जो ब्लाउज की तंग कैद में फड़फड़ा रहे थे। उसने अपनी उंगलियों से उन तरबूजों के ऊपर मौजूद छोटे-छोटे मटरों को सहलाना शुरू किया, जिससे कविता का पूरा शरीर कांपने लगा। कविता ने रोहन के बालों में अपनी उंगलियां फँसा लीं और उसे अपनी ओर खींच लिया। रोहन ने अब और इंतज़ार नहीं किया और अपना मुँह एक तरबूज पर रख दिया, उसे कपड़े के ऊपर से ही चूसने लगा। कविता की उत्तेजना अब सातवें आसमान पर थी और उसने धीरे से रोहन की पैंट की जिप खोल दी।

जैसे ही कविता का हाथ रोहन के सख्त खीरे पर पड़ा, उसकी चीख निकल गई। वह खीरा अब पूरी तरह से तैयार था और अपनी जगह बनाने के लिए बेताब था। कविता ने धीरे से झुककर उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे बड़ी शिद्दत से चूसने लगी। रोहन को ऐसा सुख मिल रहा था जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। वह कविता के सिर को पकड़कर उसे और गहराई तक ले जाने लगा। कुछ ही देर में रोहन का खीरा पूरी तरह से गीला हो चुका था और कविता की लार उस पर चमक रही थी।

अब रोहन ने कविता को उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया और उसकी साड़ी और ब्लाउज को पूरी तरह से उतार फेंका। कविता अब पूरी तरह से निर्वस्त्र थी और उसकी गहरी खाई रोहन को अपनी ओर बुला रही थी। रोहन ने अपनी उंगली से उस खाई को टटोलना शुरू किया, जो पहले से ही रस से भीगी हुई थी। जैसे ही रोहन की उंगली खाई के भीतर गई, कविता ने जोर से आह भरी और अपने पैरों को सिकोड़ लिया। वह रोहन से विनती करने लगी कि वह अब और इंतज़ार न करे और अपनी खुदाई शुरू करे।

रोहन ने अपने खीरे को कविता की खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से एक धक्का मारा। कविता की आँखों से आँसू छलक आए, लेकिन वह खुशी के आँसू थे। जैसे-जैसे खीरा खाई की गहराइयों में उतर रहा था, कविता की चीखें और भी तेज होती जा रही थीं। रोहन ने अब अपनी गति बढ़ा दी और पूरी ताकत से खुदाई करने लगा। हर धक्के के साथ कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और रोहन उन्हें अपने हाथों से पकड़कर जोर-जोर से दबा रहा था। कमरे में केवल उनके शरीर के टकराने की आवाज़ें गूँज रही थीं।

खुदाई की यह प्रक्रिया बहुत ही गहन और भावनात्मक होती जा रही थी। रोहन और कविता एक-दूसरे की आँखों में देखते हुए इस पल का आनंद ले रहे थे। रोहन ने कविता को अब पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, जिससे कविता को एक नया और अनूठा सुख मिला। वह बेड के सिरहाने को पकड़कर जोर-जोर से रोहन के नाम की आहें भर रही थी। रोहन का खीरा अब पूरी तरह से गर्म हो चुका था और उसे महसूस हो रहा था कि अब उसका रस छूटने वाला है। उसने अंतिम कुछ धक्के बहुत ही तेज़ और गहरे मारे।

अचानक कविता के शरीर में एक तेज़ थरथराहट हुई और उसकी खाई से बहुत सारा रस निकलने लगा। ठीक उसी पल रोहन ने भी अपना सारा गरम रस कविता की खाई की गहराइयों में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े, उनकी साँसें बहुत तेज़ चल रही थीं और शरीर पसीने से लथपथ थे। उस चरम सुख के बाद दोनों के मन में एक अजीब सी शांति और संतुष्टि थी। रोहन ने कविता के माथे को चूमा और उसे अपनी बाहों में भर लिया, जैसे वह उसे कभी छोड़ना नहीं चाहता हो।

अगले कुछ घंटों तक वे वैसे ही लेटे रहे, एक-दूसरे के शरीर की गर्मी को महसूस करते हुए। उनके बीच अब कोई पर्दा नहीं था, न रिश्तों का और न ही झिझक का। कविता ने रोहन के सीने पर हाथ रखते हुए कहा कि आज उसने पहली बार खुद को एक पूर्ण स्त्री महसूस किया है। रोहन ने भी वादा किया कि वह हमेशा उसका ख्याल रखेगा। उस रात की खुदाई ने उनके बीच के भावनात्मक बंधन को और भी गहरा कर दिया था, और वे जानते थे कि यह सिलसिला अब रुकने वाला नहीं है।

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