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जवान माँ की चु@@ई


जवान माँ की चु@@ई—>

समीर अपनी २२ साल की उम्र में अपने पिता और उनकी नई पत्नी, कविता, के साथ एक ही घर में रहता था। कविता की उम्र ३८ साल थी, लेकिन उसे देखकर कोई कह नहीं सकता था कि वह समीर की माँ की जगह है। कविता की काया एक ढली हुई मूर्ति की तरह थी, जिसकी हर लहर समीर के मन में हलचल पैदा कर देती थी। घर की शांति में जब समीर कविता के आसपास होता, तो उसे उसकी सांसों की गर्माहट महसूस होती थी, जो उसे एक अनजानी बेचैनी से भर देती थी। पिता अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहते थे, जिससे घर में समीर और उसकी जवान सौतेली माँ अकेले रह जाते थे।

कविता का शरीर किसी रसीले और भरे हुए बगीचे जैसा था, जहाँ हर अंग अपनी एक अलग ही मादक कहानी सुनाता था। उसके ब्लाउज के नीचे छिपे उसके बड़े-बड़े और उभरे हुए तरबूज हमेशा बाहर आने को बेताब लगते थे, जिनकी चोटियों पर छोटे-छोटे मटर जैसे उभार पतले कपड़े के ऊपर से भी अपनी मौजूदगी का एहसास कराते थे। जब वह घर के काम करते हुए झुकती थी, तो उसकी साड़ी का पल्लू अक्सर सरक जाता था और उसके गोरे तरबूजों की गहरी घाटी समीर की आँखों को अपनी ओर खींच लेती थी। उसका भारी और गोल पिछवाड़ा चलते समय एक खास लय में हिलता था, जिसे देख कर समीर के भीतर का खीरा अक्सर उसकी पैंट की कैद में अंगड़ाई लेने लगता था।

समीर और कविता के बीच एक ऐसा अनकहा रिश्ता पनप रहा था जो सिर्फ माँ और बेटे का नहीं था। समीर अक्सर कविता की आँखों में एक प्यास देखता था, जो शायद उसके पिता के व्यस्त रहने के कारण कभी पूरी नहीं हो पाती थी। कविता भी समीर की जवान देह और उसके सुडौल कंधों को चोरी-छिपे निहारती रहती थी। उन दोनों के बीच एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव भी था, वे घंटों बातें करते और एक-दूसरे की छोटी-छोटी खुशियों का ध्यान रखते थे। लेकिन उस दोपहर की उमस ने उनकी भावनाओं के बांध को तोड़ने का काम कर दिया, जब घर में कोई और नहीं था और वातावरण में सिर्फ उनकी धड़कनों की आवाज़ गूँज रही थी।

दोपहर के समय कविता रसोई में खाना बना रही थी, तभी समीर वहाँ पानी पीने गया। अचानक कविता का पैर फिसला और वह गिरने ही वाली थी कि समीर ने फुर्ती से उसकी पतली कमर को थाम लिया। उस पहले स्पर्श ने दोनों के शरीरों में बिजली की एक लहर दौड़ा दी। समीर का हाथ कविता के रेशमी बदन पर टिका था, और कविता के नरम तरबूज समीर के चौड़े सीने से दब गए थे। समीर को उन तरबूजों की कोमलता और उन पर मौजूद सख्त मटरों का उभार अपने सीने पर साफ महसूस हो रहा था। कविता ने समीर की आँखों में देखा, और उस पल में झिझक का पर्दा पूरी तरह से गिर गया।

कविता की सांसें तेज हो गई थीं और उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी, जिससे उसके तरबूज समीर की आँखों के सामने नाच रहे थे। समीर ने धीरे से अपना हाथ कविता की पीठ पर नीचे की ओर खिसकाया और उसके भारी पिछवाड़े को सहलाने लगा। कविता ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उसने अपनी आँखें मूँद लीं और एक गहरी आह भरी। समीर ने उसके चेहरे को थाम लिया और उसके होंठों का स्वाद लेने लगा। यह चुंबन गहरा और प्यासा था, जिसमें बरसों की दबी हुई इच्छाएं बाहर आ रही थीं। कविता ने समीर के खीरे को अपनी जांघों के बीच महसूस किया, जो अब पूरी तरह से जाग चुका था।

धीरे-धीरे वे दोनों बेडरूम की ओर बढ़े, जहाँ समीर ने कविता की साड़ी की एक-एक तह खोलनी शुरू की। जब कविता पूरी तरह से निर्वस्त्र हुई, तो समीर उसे देखता ही रह गया। उसके गोरे बदन पर काले बाल एक रहस्यमयी जंगल की तरह दिख रहे थे, जो उसकी गहरी और गीली खाई की रक्षा कर रहे थे। समीर ने उसके तरबूजों को अपने हाथों में भर लिया और उन्हें दबाने लगा, जिससे कविता के मुंह से सुरीली कराहें निकलने लगीं। समीर ने झुककर उन रसीले तरबूजों के मटरों को अपने मुंह में लिया और उन्हें धीरे-धीरे चूसने लगा, जिससे कविता का पूरा शरीर कांप उठा।

कविता अब और सब्र नहीं कर पा रही थी, उसने समीर की पैंट खोली और उसके विशाल और सख्त खीरे को बाहर निकाला। उसने उस खीरे को अपने हाथों में लेकर सहलाया और फिर उसे अपने मुंह में ले लिया। कविता का खीरा चूसना इतना आनंददायक था कि समीर का पूरा बदन पसीने से भीग गया। वह उसके सिर के बालों को पकड़कर उसे और गहराई तक खींच रहा था। इसके बाद समीर ने कविता को बिस्तर पर लिटाया और उसकी जांघों के बीच मौजूद गहरी खाई को चाटना शुरू किया। खाई से निकलता हुआ प्राकृतिक शहद समीर के लिए दुनिया का सबसे स्वादिष्ट रस था।

समीर ने अब खुदाई की तैयारी की। उसने कविता की टांगों को हवा में उठाया और अपने विशाल खीरे को उसकी तंग और गर्म खाई के मुहाने पर सेट किया। एक जोरदार धक्के के साथ समीर ने अपना पूरा खीरा कविता की खाई के अंदर उतार दिया। कविता के मुंह से एक लंबी चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं, बल्कि अपार सुख की थी। समीर ने धीरे-धीरे खोदना शुरू किया, हर धक्के के साथ उसका खीरा कविता की खाई की गहराई को छू रहा था। कमरे में उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ और कविता की सिसकारियाँ गूँज रही थीं।

खुदाई की गति अब तेज हो चुकी थी। समीर सामने से खोदना जारी रखे हुए था और हर बार जब वह जोर से धक्का मारता, कविता के तरबूज पागलों की तरह ऊपर-नीचे उछलते थे। समीर ने उसके दोनों तरबूजों को मजबूती से पकड़ लिया और अपनी खुदाई में और जान लगा दी। कविता समीर के शरीर को अपने नाखूनों से खुरच रही थी और उसे और जोर से खोदने के लिए कह रही थी। ‘और जोर से समीर, मुझे पूरा भर दो!’ कविता के इन शब्दों ने समीर के भीतर एक नई ऊर्जा भर दी और उसने खुदाई को और भी आक्रामक बना दिया।

कुछ देर बाद समीर ने कविता को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। यह तरीका और भी ज्यादा उत्तेजक था क्योंकि इसमें समीर को कविता के भारी पिछवाड़े के हिलने का पूरा नज़ारा मिल रहा था। समीर ने पिछवाड़े से खोदते हुए कविता के मटरों को अपनी उंगलियों से मसला, जिससे कविता मदहोश हो गई। खुदाई इतनी गहरी और दमदार थी कि कविता की खाई से अब काफी रस निकलने लगा था। समीर का खीरा भी अब अपने चरम पर था और वह फटने को तैयार था।

अंत में समीर ने फिर से सामने से खोदना शुरू किया और अपनी गति को चरम पर ले गया। दोनों के शरीर पसीने से लथपथ थे और उनकी सांसें उखड़ रही थीं। अचानक समीर के खीरे ने एक ज़ोरदार झटका खाया और कविता की खाई के भीतर सारा रस छोड़ दिया। उसी समय कविता का भी रस निकलना शुरू हुआ और वह समीर को कसकर लिपट गई। दोनों कुछ देर तक उसी अवस्था में लेटे रहे, शांत और संतुष्ट। इस गहरी खुदाई के बाद उनके मन का बोझ उतर चुका था और एक नई तरह की शांति ने उनकी आत्माओं को घेर लिया था।

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