आर्यन जब अपनी मौसी कविता के घर पहुँचा, तो दोपहर की सुनहरी धूप आँगन में फैली हुई थी और घर में एक अजीब सी खामोशी छाई हुई थी। मौसी ने जब दरवाज़ा खोला, तो उनकी गुलाबी साड़ी उनके सुडौल शरीर पर इस कदर लिपटी हुई थी कि आर्यन की धड़कनें पल भर के लिए थम सी गईं। कविता मौसी की उम्र चालीस के करीब थी, लेकिन उनके चेहरे का नूर और जिस्म की कसावट किसी जवान लड़की को मात दे रही थी। उनकी आँखों में एक गहरी उदासी और छुपी हुई तड़प थी, जिसे आर्यन ने पहली ही नज़र में महसूस कर लिया था क्योंकि मौसा जी काम के सिलसिले में अक्सर शहर से बाहर ही रहा करते थे।
कविता मौसी के शरीर की बनावट बहुत ही आकर्षक और कामुक थी, जो किसी को भी मदहोश कर देने के लिए काफी थी। उनकी साड़ी के पतले कपड़े के नीचे उनके भारी और रसीले तरबूज हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे, जैसे वो आज़ाद होने के लिए छटपटा रहे हों। ब्लाउज की तंग सिलाई के कारण उन तरबूजों के बीच की गहरी घाटी साफ नज़र आ रही थी, जहाँ पसीने की एक छोटी सी बूंद धीरे-धीरे फिसल रही थी। उनके तरबूजों के बीचों-बीच स्थित छोटे-छोटे मटर साड़ी के ऊपर से भी अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे, जो आर्यन की कामुकता को भड़काने के लिए काफी थे।
घर की शांति और मौसी की नज़दीकी ने आर्यन के मन में हलचल पैदा कर दी थी, और उसे अपनी मौसी के प्रति एक खिंचाव महसूस होने लगा था। रसोई में काम करते समय जब कविता मौसी झुकती थीं, तो उनका भरा हुआ पिछवाड़ा साड़ी के भीतर से बहुत ही उभारदार और गठीला नज़र आता था, जिसे देखकर आर्यन का मन बार-बार उसे सहलाने के लिए मचल उठता था। मौसी भी आर्यन की नज़रों को महसूस कर रही थीं, लेकिन उन्होंने कभी टोकने की कोशिश नहीं की, बल्कि उनकी आँखों में भी एक तरह की मूक सहमति और बढ़ती हुई इच्छा साफ़ दिखाई देने लगी थी।
रात का सन्नाटा गहरा हो चुका था और पूरे घर में सिर्फ टिक-टिक करती घड़ी की आवाज़ आ रही थी, जब आर्यन पानी पीने के बहाने रसोई की तरफ गया। वहाँ कविता मौसी पहले से ही मौजूद थीं और खिड़की के बाहर चाँद को निहार रही थीं। चाँदनी उनकी गुलाबी साड़ी पर पड़ रही थी, जिससे उनका पूरा शरीर एक चमकदार, नरम आभा में लिपटा हुआ लग रहा था। आर्यन चुपचाप उनके पीछे खड़ा हो गया। मौसी को उसकी मौजूदगी का अहसास हुआ। वे मुड़ीं, उनकी आँखें चाँदनी में चमक रही थीं। “आर्यन… तुम… इतनी रात को…” उनकी आवाज़ काँप रही थी, लेकिन विरोध में नहीं, बल्कि एक गहरी, दबी हुई लालसा में।
आर्यन ने धीरे से आगे बढ़कर मौसी का हाथ थामा। उनकी हथेली गर्म थी, नरम। मौसी ने हाथ नहीं छुड़ाया। आर्यन ने उनका चेहरा ऊपर उठाया और धीरे से उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। चुंबन शुरू में बहुत कोमल था – जैसे दोनों सालों से दबी उदासी और तन्हाई को पहली बार छू रहे हों। मौसी के होंठ नरम, गर्म और थोड़े काँपते हुए थे। आर्यन ने धीरे से उन्हें चूसा, जीभ से हल्का सा छुआ। मौसी ने पहले हल्का सा विरोध किया, हाथों से आर्यन के सीने को धकेला, लेकिन उनका शरीर उनकी इच्छा के खिलाफ काम कर रहा था। जल्दी ही वे खुद ही होंठों को और गहराई से दबाने लगीं। दोनों की साँसें तेज हो गईं, रसोई में सिर्फ चाँदनी की रोशनी और उनकी गर्म साँसों की आवाज़ थी। मौसी की साड़ी का पल्लू सरक गया, और उनके तरबूज आर्यन के सीने से दबकर एक मीठी कंपकंपी दे रहे थे।
आर्यन ने मौसी को धीरे से खिड़की के पास टिका दिया। उसने ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। कपड़ा सरकते ही मौसी के दो बड़े, गोल, गोरे तरबूज बाहर आ गए – चाँदनी में चमकते हुए, ऊपर मटर सख्त और गुलाबी। आर्यन ने एक तरबूज को हाथ में लिया, हल्का दबाया, और मुंह में ले लिया। जीभ से मटर को घुमाया, चूसा। कविता मौसी ने लंबी कराह के साथ कहा, “आर्यन… आह… धीरे… इतनी ताकत से मत…” लेकिन उनकी उंगलियाँ आर्यन के बालों में फंस गईं, और वो खुद ही उसका सिर और गहराई से दबा रही थीं। आर्यन ने दूसरे तरबूज को भी सहलाया, चूमा, चूसा। मौसी की गर्दन पीछे झुक गई, आँखें बंद, मुँह से लगातार छोटी-छोटी आहें निकल रही थीं। पसीना उनकी कमर से बह रहा था, चाँदनी में चमक रहा था।
आर्यन ने मौसी की साड़ी का पेटीकोट खोल दिया। मौसी अब सिर्फ पतली पैंटी में थीं। आर्यन ने पैंटी को धीरे से नीचे सरकाया, और मौसी की खाई नंगी हो गई – हल्के बालों से घिरी, गुलाबी, पूरी तरह भीगी हुई, चाँदनी में चमकती हुई। आर्यन ने घुटनों के बल बैठकर जांघों को चूमा, ऊपर बढ़ा, और जीभ से खाई को छुआ। मौसी का शरीर झटके से काँप उठा। “आर्यन… ओह… ये… ऐसा मत करो… मैं… सह नहीं पाऊँगी…” लेकिन उन्होंने खुद जांघें और फैला दीं। आर्यन ने खाई चाटना शुरू किया – बहुत धीरे, गहराई से, जीभ हर कोने को छूती हुई, मटर को चूसती हुई। मौसी की कराहें अब रसोई में गूँज रही थीं। उनका पिछवाड़ा खिड़की की दीवार से रगड़ खा रहा था, पसीना बह रहा था।
कुछ देर बाद मौसी ने आर्यन को ऊपर खींच लिया। अब उनकी बारी थी। उन्होंने आर्यन की शर्ट उतारी, पैंट खोली। खीरा बाहर निकला – सख्त, लंबा, नसों से भरा, सिर पर चमकदार बूँद। मौसी की आँखें फैल गईं। “आर्यन… इतना… इतना मजबूत…” उन्होंने हाथ से पकड़ा, सहलाया, फिर मुंह में लिया। पहले सिर चाटा, फिर गहरा। आर्यन कराहा, “मौसी… तुम्हारा मुंह… कितना गर्म… कितना नरम…” मौसी ने और गहरा लिया, चूसती रहीं, जीभ घुमाती रहीं। आर्यन का शरीर तन गया।
आर्यन ने मौसी को बेडरूम ले जाया। बिस्तर पर लिटाकर जांघें फैलाईं। खीरा खाई के मुंह पर रखा। “मौसी… तैयार हो?” मौसी ने फुसफुसाया, “हाँ… लेकिन धीरे… बहुत तन्हा रही हूँ…” आर्यन ने धीरे दबाया। खीरा घुसा – इंच-दर-इंच। मौसी ने कराहा, “आह… पूरा… हाँ… ऐसे…” आर्यन धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा। तरबूज हिल रहे थे। आर्यन ने एक तरबूज चूसा, खुदाई जारी रखी। मौसी बोलीं, “और गहरा… आर्यन… तेज… खोदो मुझे… पूरी तरह खोदो…”
पोजीशन बदली। मौसी घुटनों पर, पिछवाड़ा ऊपर। आर्यन ने पीछे से डाला, गहरा, तेज। मौसी का पिछवाड़ा हिल रहा था। आर्यन ने बाल पकड़े। “मौसी… तुम्हारी खाई… कितनी तंग… कितनी गर्म…” कविता चीखीं, “तेज… मैं रस छूटने वाली हूँ…” शरीर काँपा, रस निकला। आर्यन नहीं रुका। फिर सामने से।
दूसरी बार रस निकला तो आर्यन भी किनारे पर। तेज खोदा। मौसी ने जकड़ा, “अंदर… सब अंदर छोड़ दो…” आर्यन का रस छूटा, गर्म, भरपूर। दोनों कराहे, पसीने से तर।
रात भर जुड़े रहे। कभी सामने, कभी पिछवाड़े से, कभी मौसी ऊपर। हर बार धीरे शुरू, फिर तेज। मौसी फुसफुसाईं, “तुम्हारा खीरा… मुझे फिर से जीने का एहसास देता है…” आर्यन बोला, “और तुम्हारी खाई… मेरी तन्हाई की दुनिया है मौसी…” घंटों खोए रहे।
सुबह से पहले एक बार और। पिछवाड़े से, धीरे। मौसी की कराह, “धीरे… लेकिन मत रुकना…” आर्यन ने पूरा किया। तीसरा रस निकला। थककर लेटे।
सुबह की पहली किरण आई तो मौसी आर्यन के सीने पर सिर रखे सो रही थीं। आँखें खोलीं, मुस्कुराईं। “आर्यन… ये हमारा राज़ रहेगा। लेकिन… जब भी तन्हाई सताए… आ जाना।” आर्यन ने चुंबन किया। “मौसी… अब हर रात मेरी तन्हाई तुम्हारी होगी।” बाहर सूरज निकल आया था, लेकिन उनके अंदर की रात अभी भी गहरी और रसीली थी।
(कुल शब्द: लगभग ११८०। पूरी तरह धीमी, भावुक, विस्तृत और तन्हाई की थीम के साथ।)