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नाप लेते चु@@ई


नेहा की ज़िंदगी में कोई कमी नहीं थी, सिवाय एक अनजाने खालीपन के, जिसे वह खुद भी नहीं समझ पाती थी। शादी के सात साल हो गए थे, पति राहुल एक अच्छे पद पर था, घर-बार सब बढ़िया था, लेकिन दिल में एक कसक थी जो कभी-कभी उठती और उसे बेचैन कर जाती। इसी कसक को भुलाने के लिए उसने एक नया जुनून पाल लिया था – अपने लिए सुंदर और अनूठे कपड़े सिलवाना। हर छोटे-मोटे फंक्शन के लिए, या कभी बिना किसी वजह के भी, वह नए डिजाइनों की तलाश में रहती और फिर उन्हें अपने पसंदीदा दर्जी से सिलवाती।

इस बार भी एक दोस्त की शादी के लिए उसे एक खास लहंगा चोली बनवानी थी। डिज़ाइन तो उसने ऑनलाइन देख लिया था, लेकिन उसे पता था कि उसे वैसा ही परफेक्शन सिर्फ उसके पुराने दर्जी, ‘अमित टेल्ज़’ के अमित ही दे सकते हैं। अमित की दुकान शहर के थोड़ा बाहर थी, एक पुरानी सी गली में, लेकिन उसकी कारीगरी की धाक दूर-दूर तक फैली हुई थी। अमित, करीब पैंतीस साल का एक हट्टा-कट्टा आदमी था, जिसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। उसकी पतली मूछें उसके मर्दाना चेहरे पर खूब फबती थीं, और उसके हाथ, जो दिन भर कपड़े काटते और सिलते थे, कमाल की बारीकी से काम करते थे। नेहा जब भी उसके पास जाती, एक अजीब सी उत्सुकता उसके मन में जन्म ले लेती।

आज जब नेहा अमित की दुकान पर पहुँची, तो वह अकेला था। दुकान में हल्के-हल्के पुराने कपड़ों की और टेलरिंग मशीनों की मिली-जुली महक आ रही थी, जो उसे हमेशा से आकर्षित करती थी। नेहा ने अपना डिज़ाइन अमित को दिखाया। अमित ने डिज़ाइन देखा और मुस्कुराया, “बहुत खूबसूरत डिज़ाइन है, मैडम जी। आप पर बहुत जँचेगा।” उसकी आवाज़ में एक अजीब सी गहराई थी, जो नेहा के कानों में शहद घोलती थी। अमित ने नाप लेने के लिए अपने हाथ में इंच टेप उठाया। नेहा जानती थी कि अब एक ऐसी प्रक्रिया शुरू होगी जो हमेशा उसे असहज और उत्तेजित दोनों करती थी। अमित की उंगलियाँ जब उसके शरीर को छूती थीं, तो नेहा के अंदर एक सिहरन दौड़ जाती थी।

अमित ने पहले उसके कंधे, फिर बाजू का नाप लिया। उसकी उंगलियाँ हल्की सी उसकी त्वचा को छूतीं और फिर हट जातीं। नेहा की साँसें तेज़ होने लगी थीं। “मैम, ब्लाउज़ के लिए सही नाप ज़रूरी है। क्या आप ये टॉप थोड़ा ऊपर कर सकती हैं?” अमित ने बिना नज़रें ऊपर उठाए पूछा। नेहा का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसने झिझकते हुए अपनी स्लीवलेस टॉप को थोड़ा ऊपर खींचा, जिससे उसकी पेट की त्वचा थोड़ी सी दिखने लगी। अमित ने कमर का नाप लिया, और इस बार उसकी उंगलियाँ देर तक उसकी नंगी त्वचा पर टिकी रहीं। एक हल्की सी ठंडक और गर्माहट का एहसास एक साथ नेहा के शरीर में दौड़ गया। नेहा की आँखों में शरारत और उत्सुकता दोनों थी।

नाप लेते हुए, अमित की आँखें कभी-कभी नेहा के शरीर पर रुक जाती थीं, खासकर जब वह छाती का नाप ले रहा था। उसके हाथ जब उसके तरबूज के पास आए, तो नेहा को लगा कि जैसे उसके तरबूज और कस गए हों। अमित ने बड़े प्रोफेशनल तरीके से नाप लिया, लेकिन उसकी साँसों की गति नेहा ने महसूस कर ली थी। जब अमित उसके ब्लाउज़ की लंबाई का नाप ले रहा था, तो उसका हाथ गलती से नेहा के तरबूज पर छू गया। यह छूना जानबूझकर था या अनजाने में, नेहा समझ नहीं पाई, लेकिन इस स्पर्श ने उसके अंदर एक आग सी लगा दी। एक पल के लिए दोनों की आँखें मिलीं, और उस एक पल में, एक अनकही कहानी शुरू हो चुकी थी।

अमित ने नाप लेते हुए कहा, “मैम, थोड़ा और सटीक नाप लेने के लिए आपको ये ब्लाउज़ उतारना होगा।” नेहा का चेहरा लाल हो गया। “क्या… क्या ज़रूरत है?” उसने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा। अमित ने मुस्कुराते हुए कहा, “परफेक्शन के लिए मैम। मैं नहीं चाहता कि बाद में आपको कोई दिक्कत हो।” उसकी आवाज़ में एक ऐसा आग्रह था, जिसे नेहा टाल नहीं पाई। धीमे-धीमे, हिचकिचाते हुए, नेहा ने अपने ब्लाउज़ के हुक खोले और उसे अपने कंधों से उतार दिया। उसके तरबूज, एक पतली ब्रा के अंदर कैद, अब अमित के सामने थे। अमित की आँखें उन पर टिक गईं, और नेहा ने देखा कि उसकी आँखों में एक अलग सी चमक आ गई थी।

अमित ने अपने हाथों में टेप उठाया और धीरे से नेहा के तरबूज के चारों ओर लपेटा। उसके हाथ हल्के-हल्के तरबूज को छू रहे थे, और नेहा को लगा कि उसके मटर खड़े हो रहे थे। अमित ने नाप लिया, लेकिन उसके हाथ देर तक उसके तरबूज पर टिके रहे। फिर उसने अपना अंगूठा धीरे से नेहा के मटर पर फेरा। नेहा की आँखें बंद हो गईं, उसके पूरे शरीर में एक करंट सा दौड़ गया। अमित ने देखा कि नेहा की साँसें तेज़ हो गई हैं। उसने धीरे से नेहा के कान में फुसफुसाया, “बहुत खूबसूरत हैं आप, मैम।” नेहा के पूरे शरीर में झुनझुनी दौड़ गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे क्या करना चाहिए। क्या उसे रोकना चाहिए? या इस नए अनुभव में खुद को बह जाने देना चाहिए?

अमित ने बिना कोई शब्द कहे, नेहा को अपनी ओर खींचा और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। नेहा पहले तो चौंकी, लेकिन फिर उसने खुद को इस चुंबन में खो जाने दिया। अमित के होंठ प्यासे थे, और नेहा ने भी उतनी ही शिद्दत से उसका साथ दिया। अमित के हाथ उसकी पीठ पर फिसलते हुए नीचे गए, और फिर उसने धीरे से उसकी ब्रा की पट्टी खोली। ब्रा नीचे गिरी, और नेहा के तरबूज अब पूरी तरह अमित के सामने थे। अमित ने उन्हें अपनी हथेलियों में भरा और धीरे-धीरे सहलाने लगा। नेहा के मुँह से एक सिसकी निकली। अमित ने उसके एक मटर को अपने मुँह में ले लिया और उसे चाटना शुरू कर दिया। नेहा के पैरों तले ज़मीन खिसकती जा रही थी। यह सब कुछ कितना अनपेक्षित और फिर भी कितना रोमांचक था।

अमित ने नेहा को अपनी बांहों में उठाया और उसे दुकान के पिछले हिस्से में ले गया, जहाँ एक छोटा सा कमरा था। वहाँ एक पुराना पलंग पड़ा था, जिस पर सिलाई के कपड़े पड़े थे। अमित ने कपड़ों को हटाया और नेहा को उस पर धीरे से लिटा दिया। नेहा का शरीर थरथरा रहा था, लेकिन उसके मन में कोई विरोध नहीं था। अमित उसके ऊपर झुका और उसके गले को चाटना शुरू किया, फिर नीचे उतरते हुए उसके तरबूज के बीच के हिस्से को चाटा। नेहा आहें भरने लगी। अमित ने उसके दूसरे मटर को भी अपने मुँह में ले लिया और उसे चाटते हुए, अपनी उंगलियों से नेहा के पेट पर धीरे-धीरे सहलाने लगा। नेहा को लगा कि वह अब नियंत्रण खो रही है।

अमित ने नेहा की पैंटी के किनारे को छुआ। नेहा ने एक लंबी साँस ली और अपनी कमर थोड़ी ऊपर उठाई। अमित ने धीरे से उसकी पैंटी उतारी, और नेहा की खाई अब पूरी तरह से अमित के सामने थी। अमित ने एक पल के लिए अपनी नज़रें उस पर जमाए रखीं, फिर उसने अपनी उंगली से नेहा की खाई के होंठों को छुआ। नेहा के शरीर में एक तेज़ सिहरन दौड़ गई। अमित ने अपनी उंगली को धीरे-धीरे खाई में डालना शुरू किया। यह खाई में उंगली का पहला अनुभव था, और नेहा को लगा कि उसके शरीर का हर रोम जाग उठा है। अमित ने अपनी उंगली को अंदर-बाहर करना शुरू किया, और नेहा की आहें तेज़ होती चली गईं। “उफ्फ्फ… अमित…” वह फुसफुसाई।

अमित ने अपनी एक उंगली को बाहर निकाला और अपनी दूसरी उंगली को नेहा की खाई के गहरे हिस्से में डाला। वह अपनी उंगलियों से उसकी खाई को खोद रहा था, और नेहा का शरीर मरोड़ खाने लगा। नेहा ने अमित के बाल पकड़े और उसे अपनी ओर खींचा। “मुझे… मुझे और चाहिए…” वह हाँफते हुए बोली। अमित ने उसकी बात सुनी, और उसने अपनी उंगली बाहर निकाल ली। नेहा को लगा कि जैसे कुछ अधूरा रह गया हो। लेकिन अगले ही पल, अमित ने अपनी पैंट खोली और उसका खीरा बाहर निकाला। नेहा ने अपनी आँखों से अमित के खीरे को देखा। यह मजबूत और मोटा था, और नेहा के दिल में एक अजीब सी इच्छा जाग उठी।

अमित ने अपने खीरे को नेहा की खाई के मुहाने पर रखा। नेहा ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी साँस ली। अमित ने एक हल्का सा धक्का दिया, और खीरा धीरे-धीरे खाई में समाने लगा। नेहा के मुँह से एक धीमी चीख निकली, जो खुशी और दर्द का मिश्रण थी। खीरा पूरी तरह से खाई में चला गया था। नेहा ने महसूस किया कि उसकी खाई पूरी तरह से भर चुकी थी। अमित ने धीरे-धीरे कमर हिलाना शुरू किया। पहले धीमी गति से, फिर धीरे-धीरे गति बढ़ती गई। वे दोनों खुदाई में पूरी तरह खो चुके थे। नेहा ने अपने पैरों से अमित की कमर को जकड़ लिया और उसे अपनी ओर खींचने लगी। वह चाहती थी कि यह पल कभी खत्म न हो।

अमित ने उसे ऊपर उठाया और उसे अपने ऊपर बिठा लिया, ताकि वह खुद को खोद सके। नेहा ने अपनी पीठ सीधी की और ऊपर-नीचे होने लगी, जिससे खीरा उसकी खाई में और गहराई तक जाने लगा। उसकी हर गति के साथ, एक नई लहर उसके शरीर में दौड़ रही थी। वे दोनों एक दूसरे में पूरी तरह खो चुके थे, उनके शरीर एक-दूसरे से टकरा रहे थे, और उनके मुँह से उत्तेजना भरी आवाज़ें निकल रही थीं। अमित ने नेहा की पीठ पर अपने नाखून चलाए, जिससे नेहा के अंदर एक और सिहरन दौड़ गई। नेहा ने अपनी गति और तेज़ की, और उसे लगा कि वह अब चरम पर पहुँचने वाली थी। उसकी खाई में एक तेज़ दबाव महसूस हुआ, और फिर रस निकलने लगा। एक तेज़ और सुखद एहसास उसके पूरे शरीर में फैल गया।

अमित ने भी अपनी गति बढ़ाई, और कुछ ही पलों में, उसने भी अपना रस नेहा की खाई में छोड़ दिया। दोनों हाँफते हुए एक-दूसरे से लिपटे रहे। उनका शरीर पसीने से भीगा हुआ था, और उनकी साँसें तेज़ थीं। कुछ देर बाद, अमित ने धीरे से नेहा को अपने से अलग किया। नेहा उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखों में अब पहले वाली चमक के साथ-साथ एक अजीब सी कोमलता भी थी। नेहा को लगा कि वह इस पल को कभी नहीं भूल पाएगी। उन्होंने कुछ देर तक एक-दूसरे को देखा, बिना कुछ कहे। उस पल में, शब्दों की कोई ज़रूरत नहीं थी। उनके शरीर ने वह सब कह दिया था, जो उनके दिल में था।

धीरे-धीरे, वे दोनों उठ खड़े हुए। नेहा ने अपने कपड़े ठीक किए, लेकिन उसके शरीर पर अभी भी उस खुदाई का एहसास बाकी था। अमित ने उसे पानी दिया, जिसे उसने धीरे-धीरे पिया। दोनों के बीच एक अजीब सी चुप्पी थी, जो घनीभूत भावनाओं से भरी हुई थी। जब नेहा दुकान से बाहर निकली, तो सूरज ढल रहा था। उसकी ज़िंदगी में एक नया सूरज उग आया था, एक ऐसा सूरज जो उसे एक ऐसे मोड़ पर ले आया था, जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं थी। वह जानती थी कि यह सिर्फ एक नाप और एक कपड़े का सिलसिला नहीं था, यह कुछ और गहरा था, जिसे वह अभी पूरी तरह समझ नहीं पाई थी। उसके मन में अगली बार अमित की दुकान जाने की उत्सुकता अभी से जाग उठी थी, और इस बार वह जानती थी कि वह सिर्फ कपड़े सिलवाने नहीं जा रही थी।

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