निशा जब पहली बार समीर की छोटी सी मगर सुरुचिपूर्ण दुकान में दाखिल हुई, तो उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि यह मुलाकात उसके जीवन के सबसे भावुक अध्याय की शुरुआत होगी। बाहर शहर का शोर-शराबा था, लेकिन अंदर रेशम के थान, मखमली कपड़ों की महक और पुरानी लकड़ी की मेजों की एक शांत और रहस्यमयी दुनिया बसी हुई थी। समीर अपनी मेज पर झुककर बड़े ध्यान से किसी कपड़े पर रेखाएं खींच रहा था, उसकी एकाग्रता ऐसी थी कि उसे निशा के आने का पता ही नहीं चला। निशा ने कुछ देर तक उसे काम करते देखा, उसकी लंबी उँगलियां और गहरी आँखों में एक कलाकार की तड़प साफ झलक रही थी, जो उसे अन्य पुरुषों से बिल्कुल अलग और आकर्षक बना रही थी।
समीर ने जब सिर उठाया, तो उसकी नज़रें निशा की गहरी आँखों से टकराईं और जैसे पल भर के लिए समय ठहर सा गया। निशा का व्यक्तित्व बहुत ही सौम्य और गरिमामय था, उसके शरीर की बनावट किसी नक्काशीदार मूर्ति की तरह थी, जिसे कुदरत ने बड़ी फुर्सत से तराशा हो। उसने एक हल्के नीले रंग की साड़ी पहनी थी, जो उसकी पतली कमर और सुडौल कंधों पर बहुत ही करीने से लिपटी हुई थी। समीर को लगा कि उसे अपनी अगली कृति के लिए प्रेरणा मिल गई है, क्योंकि निशा का हर अंग, उसकी गर्दन का मोड़ और उसकी चाल की खामोश लचक, किसी कविता की पंक्तियों की तरह सुंदर और अर्थपूर्ण लग रही थी।
उनके बीच औपचारिक बातचीत शुरू हुई, लेकिन हर शब्द के पीछे एक अनकहा खिंचाव महसूस हो रहा था जो दोनों के दिलों को धीरे-धीरे जोड़ रहा था। समीर ने जब निशा के नाप लेने की बात कही, तो एक अजीब सी झिझक और रोमांच ने कमरे की हवा को भारी कर दिया। निशा के दिल की धड़कनें तेज हो गईं, क्योंकि उसने पहले कभी किसी पुरुष को अपने इतने करीब आने की अनुमति नहीं दी थी। समीर ने अपना फीता उठाया और धीरे से निशा के पास आया, उसकी सांसों की गर्मी निशा को अपने चेहरे पर महसूस हो रही थी, जिससे उसके शरीर में एक हल्की सी कंपकंपी दौड़ गई और उसने अपनी नज़रें नीचे झुका लीं।
समीर के हाथ बहुत सधे हुए थे, लेकिन जैसे ही उसने निशा के कंधों का नाप लेने के लिए अपने हाथ बढ़ाए, उसकी उँगलियों का पोर निशा की त्वचा से स्पर्श कर गया। वह स्पर्श बहुत ही कोमल था, लेकिन उसका असर किसी बिजली के झटके की तरह था जिसने दोनों के भीतर सोई हुई इच्छाओं को जगा दिया था। निशा ने अपनी आँखें मूँद लीं और एक गहरी आह भरी, जो समीर के कानों तक पहुँची और उसे और भी उत्तेजित कर गई। समीर ने महसूस किया कि निशा की त्वचा मखमल से भी ज़्यादा नरम है और उसकी खुशबू किसी जंगली चमेली की तरह उसे मदहोश कर रही है, जिससे उसका ध्यान काम से भटकने लगा था।
“निशा जी, आपकी पसंद बहुत ही खास है, लेकिन इस रेशम को आपके जिस्म पर ढलने के लिए बहुत ही बारीकी की ज़रूरत होगी,” समीर ने धीमी और भारी आवाज़ में कहा। निशा ने अपनी पलकें उठाईं और देखा कि समीर की आँखों में सिर्फ एक कलाकार की दृष्टि नहीं थी, बल्कि उनमें एक गहरा आकर्षण और प्यार भी छुपा हुआ था। उसने कांपते हुए स्वर में जवाब दिया, “समीर, मैं चाहती हूँ कि यह लिबास ऐसा बने जो मेरे मन की हर बात को बयां कर सके, क्या तुम इस गहराई तक जा सकोगे?” समीर ने मुस्कुराते हुए उसके करीब एक कदम और बढ़ाया, जिससे उनकी साँसें एक-दूसरे में उलझने लगीं।
वक्त बीतता गया और हर मुलाकात के साथ उनकी नज़दीकियाँ बढ़ती गईं, जैसे मिट्टी में दबी हुई कोई पुरानी जड़ धीरे-धीरे बाहर आ रही हो। एक शाम जब बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और दुकान में मद्धम रोशनी जल रही थी, निशा अपनी पोशाक की फिटिंग के लिए आई थी। समीर ने उसे आईने के सामने खड़ा किया और पीछे से उसकी कमर पर हाथ रखा ताकि कपड़े की ढलान देख सके। वह स्पर्श अब सिर्फ पेशेवर नहीं था, उसमें अधिकार और समर्पण का मिला-जुला अहसास था, जिसने निशा के मन के सारे बांध तोड़ दिए और उसने पीछे मुड़कर समीर की बाहों में खुद को सुरक्षित महसूस किया।
समीर ने बहुत ही धीरे से निशा के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसकी आँखों में झांकते हुए कहा, “निशा, यह सिर्फ कपड़े की सिलाई नहीं है, यह तो मेरे दिल की खुदाई है जो तुम्हारे प्यार में हर दिन और गहरी होती जा रही है।” निशा की आँखों में आँसू आ गए और उसने समीर के सीने पर अपना सिर रख दिया, जहाँ उसे उसकी तेज चलती धड़कनें सुनाई दे रही थीं। उस पल में दुनिया की सारी दीवारें गिर गईं और सिर्फ दो रूहें बची थीं जो एक-दूसरे में समा जाने के लिए व्याकुल थीं। समीर ने झुककर निशा के माथे को चूमा, जिससे उसके पूरे शरीर में एक सुखद लहर दौड़ गई।
धीरे-धीरे उनकी नज़दीकियाँ शारीरिक और आत्मिक एकता की ओर बढ़ने लगीं, जहाँ हर स्पर्श एक नई कहानी सुना रहा था। समीर ने अपनी उँगलियों से निशा के बालों की लटों को हटाया और उसकी गर्दन पर अपनी गर्म साँसों का अहसास छोड़ा, जिससे निशा के मुँह से एक दबी हुई कराह निकल गई। उसने समीर के हाथों को थाम लिया और उन्हें अपने शरीर के उतार-चढ़ाव पर महसूस करने लगी, जैसे वह उसे अपनी पूरी सत्ता सौंप रही हो। समीर ने उसे अपनी बाहों में उठा लिया और पास पड़ी मखमली कालीनों की ढेरी पर बिठा दिया, जहाँ चाँदनी की हल्की किरणें उनके प्यार की गवाह बन रही थीं।
उस रात समीर और निशा ने प्रेम की उन गहराइयों को छुआ जहाँ शब्द खत्म हो जाते हैं और सिर्फ अहसास बाकी रह जाते हैं। समीर का हर स्पर्श निशा के शरीर पर एक नई इबारत लिख रहा था, उसकी उँगलियाँ जैसे उसके बदन की खुदाई कर रही थीं ताकि उसके भीतर छिपे हुए प्रेम के अमृत को बाहर निकाल सकें। निशा ने भी पूरी शिद्दत के साथ समीर का साथ दिया, उसकी साँसों की लय समीर की धड़कनों के साथ मिल गई थी। उनके शरीरों से निकलने वाला पसीना और उनके मिलन की वह महक पूरे कमरे में एक जादुई वातावरण बना रही थी, जिसमें वे दोनों पूरी तरह खो चुके थे।
प्रेम की उस अग्नि में तपकर दोनों और भी निखर गए थे, उनके बीच की हर झिझक और शर्म अब एक गहरे विश्वास में बदल चुकी थी। समीर ने निशा के कानों के पास फुसफुसाते हुए कहा, “तुम मेरी सबसे सुंदर रचना हो, और इस प्रेम की खुदाई का कोई अंत नहीं है।” निशा ने अपनी आँखें खोलकर उसे देखा, उसकी आँखों में तृप्ति और असीम प्यार की चमक थी। उसने समीर को और भी ज़ोर से गले लगा लिया, जैसे वह उसे कभी खुद से अलग नहीं होने देना चाहती हो। उस मिलन के बाद की शांति बहुत ही सुखद और सुकून देने वाली थी, जिसमें दोनों बस एक-दूसरे को निहार रहे थे।
अगले दिन जब सूरज की पहली किरण दुकान की खिड़की से अंदर आई, तो निशा ने खुद को समीर की बाहों में पाया, वह अहसास बहुत ही पवित्र और नया था। उसे महसूस हुआ कि कल तक वह जो थी, अब उससे कहीं ज़्यादा पूर्ण और समृद्ध हो गई है, क्योंकि उसे वह प्यार मिल गया था जिसकी तलाश उसे बरसों से थी। समीर ने जागते ही निशा के हाथों को चूम लिया और वादा किया कि यह प्रेम कहानी अब कभी खत्म नहीं होगी। उनकी इस प्रेम की खुदाई ने उनके जीवन के खालीपन को खुशियों और उमंगों से भर दिया था, जिससे उनकी दुनिया हमेशा के लिए बदल गई।