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नेहा और पुरानी खुदाई


नेहा और पुरानी खुदाई—>

समीर ने जब सालों बाद नेहा को उस पुराने पुश्तैनी हवेली के सामने खड़ा देखा, तो उसके दिल की धड़कनें एक पल के लिए थम सी गईं। नेहा की सादगी में भी एक ऐसी कशिश थी जो समीर को अपनी ओर खींच रही थी। उसकी रेशमी साड़ी का गहरा नीला रंग उसके गोरे रंग पर खूब फब रहा था, और हवा के झोंकों के साथ उसकी लटें उसके सुकोमल चेहरे को चूम रही थीं। समीर के लिए यह महज एक मुलाकात नहीं थी, बल्कि अपने दिल के कोने में दबी हुई पुरानी चाहतों की फिर से खुदाई करने जैसा एक बहुत ही गहरा और भावुक अनुभव था जिसे वह बरसों से टालता आ रहा था।

नेहा का व्यक्तित्व अब पहले से कहीं ज्यादा निखरा हुआ और सम्मोहक लग रहा था। उसकी सुराहीदार गर्दन पर पसीने की कुछ नन्ही बूंदें सूरज की मद्धम रोशनी में मोतियों की तरह चमक रही थीं, जो उसकी खूबसूरती में एक नैसर्गिक आकर्षण जोड़ रही थीं। समीर की नजरें उसकी गहरी आँखों और उन गुलाबी होठों पर टिक गईं जो बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह रहे थे। वह अपनी भावनाओं को पूरी तरह काबू करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन नेहा की जादुई निकटता उसके भीतर एक अजीब सी बेचैनी, मीठी कंपन और तीव्र आकर्षण पैदा कर रही थी, जिसे वह शब्दों में बयां करने में खुद को असमर्थ पा रहा था।

दोनों पुराने बगीचे के उस कोने की तरफ बढ़े जहाँ बचपन में उन्होंने एक यादों का डिब्बा जमीन के नीचे गाड़ा था। नेहा ने मुस्कुराते हुए समीर की ओर देखा और कहा कि आज वक्त आ गया है उस पुरानी खुदाई का, ताकि हम देख सकें कि वक्त ने हमारी यादों को कितना बदला है। समीर को उसकी आवाज़ में वही खनक महसूस हुई जो सालों पहले उसे मदहोश कर दिया करती थी। जैसे-जैसे वे जमीन के पास बैठे, उनके शरीर के बीच की दूरी कम होने लगी। समीर को नेहा के शरीर से उठने वाली चन्दन की धीमी खुशबू और उसकी गरम सांसों का अहसास होने लगा, जिससे उसके मन में एक मीठी सी टीस उठने लगी थी।

जैसे ही समीर ने मिट्टी हटाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया, अचानक उसका हाथ नेहा के नर्म और नाजुक हाथ से टकरा गया। वह स्पर्श इतना बिजली जैसा था कि दोनों के शरीरों में एक तेज कंपकंपी दौड़ गई। नेहा ने अपनी नजरें झुका लीं, लेकिन उसका हाथ समीर के हाथ के नीचे ही दबा रहा। उस एक पल में दुनिया जैसे रुक गई थी। समीर को नेहा की तेज होती धड़कनें साफ सुनाई दे रही थीं और उसके खुद के दिल का हाल भी कुछ ऐसा ही था। वह स्पर्श महज शारीरिक नहीं था, बल्कि उसमें सालों का इंतजार, अनकही बातें और एक अटूट भावनात्मक जुड़ाव समाया हुआ था।

धीरे-धीरे समीर की उंगलियां नेहा की हथेली पर रेंगने लगीं, जैसे वह उसकी त्वचा के हर अहसास को हमेशा के लिए अपने भीतर कैद कर लेना चाहता हो। नेहा की सांसें अब और भी ज्यादा भारी होने लगी थीं और उसकी पलकों की जुम्बिश समीर को और भी करीब आने का न्यौता दे रही थी। हवा में एक अजीब सी मादकता घुल गई थी। समीर ने साहस जुटाकर नेहा के चेहरे को धीरे से ऊपर उठाया। उसकी आँखों में शर्म और चाहत का एक अद्भुत संगम था। उस निकटता में दोनों की सांसें एक-दूसरे में विलीन होने लगी थीं और उनके बीच की झिझक की दीवार धीरे-धीरे ढह रही थी।

समीर ने अपना दूसरा हाथ नेहा की कमर पर रखा, जहाँ साड़ी का रेशमी स्पर्श और उसकी त्वचा की गर्मी ने समीर के भीतर एक ज्वालामुखी सा दहका दिया। नेहा ने धीरे से समीर के कंधे पर अपना सिर टिका दिया और एक लंबी, सुकून भरी आह भरी। उस पल में उन्होंने दुनिया को भुला दिया था। हर स्पर्श के साथ उनकी निकटता बढ़ती जा रही थी और उनके शरीरों का मिलन एक पवित्र कविता की तरह लग रहा था। यह प्यार की वह पराकाष्ठा थी जहाँ जिस्मों से ज्यादा रूहें एक-दूसरे में समा जाने को बेताब थीं और हवा उनकी हर सांस और आह की गवाह बन रही थी।

जब उनकी निकटता अपनी पूर्णता पर पहुँची, तो सब कुछ बहुत ही शांत और सुंदर हो गया। नेहा की आँखों से खुशी के दो आंसू ढुलक कर समीर के हाथ पर गिरे, जो उनके गहरे प्रेम और समर्पण की गवाही दे रहे थे। समीर ने उसे अपनी बाहों में और भी कस लिया, जैसे वह उसे कभी खुद से दूर नहीं होने देगा। उस मिलन के बाद की शांति बहुत ही सुकूनदेह थी। दोनों एक-दूसरे की बाहों में बंधे हुए भविष्य के सपने देख रहे थे। नेहा की आँखों में अब एक नया विश्वास था और समीर के दिल में उस पुरानी खुदाई से निकला हुआ वह अनमोल प्यार, जो अब ताउम्र उसके साथ रहने वाला था।

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