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पड़ोसन रेखा की चु@@ई


पड़ोसन रेखा की चु@@ई—>

शहर की उस भीड़भाड़ वाली गगनचुंबी इमारत में नवीन को आए अभी कुछ ही दिन हुए थे। नवीन एक छरहरा और गठीले बदन वाला पच्चीस वर्षीय युवक था जो अपने करियर की शुरुआत के लिए इस बड़े शहर में आया था। उसके ठीक सामने वाले फ्लैट में रेखा रहती थी, जिसकी उम्र लगभग पैंतीस साल रही होगी। रेखा के शरीर की बनावट ऐसी थी कि उसे देखते ही किसी भी मर्द के मन में हलचल मच जाए। उसका गोरा रंग, भरी हुई कमर और साड़ी के भीतर से उभरते उसके रसीले बड़े-बड़े तरबूज हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लेते थे। जब भी वह चलती थी, उसके शरीर का हर अंग एक लय में हिलता था, जैसे कोई मदहोश कर देने वाला संगीत बज रहा हो। नवीन अक्सर अपनी बालकनी से उसे देखा करता था और मन ही मन उसकी सुंदरता की तारीफ करता था।

रेखा के शरीर का आकार बहुत ही कामुक था; उसकी छाती पर सजे वे विशाल तरबूज उसकी तंग चोली को फाड़ देने को बेताब लगते थे। जब भी वह झुकती थी, उन तरबूजों के बीच की गहरी घाटी साफ दिखाई देती थी, जिसे देखकर नवीन के मन में हलचल मच जाती थी। उसके निचले हिस्से का भारी पिछवाड़ा उसकी साड़ी के नीचे से साफ़ अपनी गोलाई और मजबूती का अहसास कराता था। नवीन अक्सर सोचता था कि उस रेशमी साड़ी के नीचे क्या-क्या खजाने छिपे होंगे। रेखा की आँखों में एक अजीब सी उदासी और प्यास झलकती थी, जिसे नवीन ने बहुत करीब से महसूस किया था। वह अक्सर अपने घर में अकेली रहती थी क्योंकि उसका पति काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहता था। यही अकेलापन उनके बीच एक अनकहे भावनात्मक जुड़ाव का कारण बनने लगा था।

एक शाम जब पूरी बिल्डिंग की बिजली गुल हो गई, तो नवीन मोमबत्ती लेकर बाहर निकला। तभी उसने देखा कि रेखा भी अपने दरवाजे पर खड़ी थी, अंधेरे में वह और भी ज्यादा रहस्यमयी और आकर्षक लग रही थी। दोनों की निगाहें मिलीं और उस खामोशी में बहुत कुछ कह गईं। नवीन ने धीरे से उसकी ओर कदम बढ़ाए, उसके दिल की धड़कनें तेज हो रही थीं। रेखा के शरीर से आने वाली मोगरे की धीमी खुशबू नवीन के नथुनों में समा रही थी। उसने देखा कि रेखा की साँसें भी कुछ तेज चल रही थीं और उसके उभरे हुए तरबूजों के ऊपर लगे छोटे-छोटे मटर उसकी पतली कुर्ती के ऊपर से साफ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। आकर्षण का यह जन्म अब एक दहकती हुई आग में बदलने वाला था, जिसकी तपन दोनों को महसूस हो रही थी।

नवीन ने हिम्मत जुटाकर अपना हाथ रेखा के कंधे पर रखा। वह ठिठकी, लेकिन उसने विरोध नहीं किया। उसके मन में एक गहरा संघर्ष चल रहा था—समाज की मर्यादा और अपनी दबी हुई इच्छाओं के बीच। नवीन ने धीरे से अपना हाथ उसकी पीठ पर नीचे की ओर खिसकाया, जहाँ उसका पिछवाड़ा शुरू होता था। रेखा के मुँह से एक हल्की सी कराह निकली, जो डर की नहीं बल्कि एक लंबे समय से दबी हुई प्यास के तृप्त होने की शुरुआत थी। नवीन ने उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसके कानों में फुसफुसाते हुए कहा, ‘आप बहुत खूबसूरत हैं रेखा जी, मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ।’ रेखा ने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपना सिर नवीन के सीने पर रख दिया।

दोनों धीरे-धीरे रेखा के बेडरूम की ओर बढ़े। कमरे में पहुँचते ही नवीन ने रेखा को दीवार से सटा दिया और उसके होंठों का रसपान करने लगा। उसकी उँगलियाँ रेखा के रेशमी बालों में उलझ गई थीं और दूसरा हाथ उसके भारी तरबूजों को सहला रहा था। रेखा ने नवीन की टी-शर्ट उतार दी, जिससे उसका गठीला बदन सामने आ गया। नवीन ने रेखा की साड़ी के पल्लू को धीरे से सरकाया, जिससे उसके गोरे और विशाल तरबूज पूरी तरह सामने आ गए। उन तरबूजों के ऊपर लगे मटर अब पूरी तरह से सख्त हो चुके थे। नवीन ने झुककर एक मटर को अपने मुँह में लिया, जिससे रेखा के शरीर में बिजली सी दौड़ गई। वह बेतहाशा सिसकने लगी और नवीन के बालों को अपनी उँगलियों से जकड़ लिया।

अब नवीन ने रेखा को पूरी तरह से निर्वस्त्र कर दिया था। उसकी आँखों के सामने अब रेखा की वह गहरी खाई थी, जो घने काले बालों से घिरी हुई थी। उस खाई से एक प्राकृतिक खुशबू आ रही थी जो नवीन को पागल कर रही थी। नवीन ने अपनी उंगली से खाई को टटोलना शुरू किया, तो पाया कि वह पहले से ही काफी गीली हो चुकी थी। रेखा ने नवीन के निचले हिस्से की ओर हाथ बढ़ाया और उसके पैंट के अंदर छिपे सख्त और लंबे खीरे को बाहर निकाला। नवीन का खीरा अब पूरी तरह से अकड़ चुका था और अपनी प्यास बुझाने के लिए बेताब था। रेखा ने उस खीरे को अपने कोमल हाथों में पकड़ा और उसे धीरे-धीरे सहलाने लगी, जिससे नवीन की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।

नवीन अब और इंतज़ार नहीं कर सकता था। उसने रेखा को बेड पर लिटाया और उसके ऊपर आ गया। उसने रेखा की टांगों को फैलाया और अपनी उंगली से खाई के अंदर खुदाई शुरू की। रेखा की कराहें अब पूरे कमरे में गूँज रही थीं। नवीन ने अपने मुँह से रेखा के तरबूजों को मसलना जारी रखा और साथ ही अपनी उंगली से खाई में हलचल मचाता रहा। कुछ देर बाद, नवीन ने अपने सख्त खीरे को रेखा की गीली खाई के द्वार पर रखा। रेखा ने अपनी आँखें खोलकर नवीन की ओर देखा, जिसमें समर्पण और तीव्र इच्छा का मेल था। नवीन ने एक झटके में अपने खीरे को गहरी खाई के अंदर धकेल दिया। रेखा के मुँह से एक जोर की चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं, चरम सुख की पहली सीढ़ी थी।

खुदाई की प्रक्रिया अब बहुत तेज हो चुकी थी। नवीन लगातार अपने खीरे को खाई के अंदर बाहर कर रहा था। हर धक्के के साथ रेखा का पूरा शरीर ऊपर-नीचे हो रहा था और उसके भारी तरबूज किसी लहर की तरह उछल रहे थे। नवीन ने रेखा के हाथ पकड़ लिए और उसे सामने से खोदना जारी रखा। ‘नवीन… और तेज… मुझे पूरी तरह से भर दो…’ रेखा ने हाँफते हुए कहा। नवीन का खीरा खाई की गहराइयों को छू रहा था, जिससे रेखा को एक अभूतपूर्व आनंद मिल रहा था। दोनों के शरीर पसीने से तरबतर हो चुके थे और उनके टकराने की आवाजें कमरे की खामोशी को चीर रही थीं। नवीन ने अब रेखा को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने के लिए तैयार किया।

पिछवाड़े से खुदाई करते समय नवीन को एक अलग ही कसावट का अहसास हो रहा था। उसने रेखा के पिछवाड़े को मजबूती से पकड़ा और अपने खीरे को फिर से खाई के अंदर उतार दिया। रेखा अब बेड की चादर को अपने हाथों से भींच रही थी। उसका चेहरा तकिए में धंसा हुआ था और वह जोर-जोर से आहें भर रही थी। नवीन ने अपनी गति और बढ़ा दी, उसके धक्के अब और भी गहरे और दमदार हो गए थे। ‘तुम कमाल के हो नवीन… मेरा रस निकलने वाला है…’ रेखा ने चीखते हुए कहा। नवीन को भी महसूस हो रहा था कि अब अंत करीब है। उसने अपने खीरे को आखिरी बार पूरी ताकत के साथ गहराई तक पहुँचाया और रेखा के शरीर में एक थरथराहट हुई।

जैसे ही रेखा का रस छूटा, नवीन ने भी अपना सारा गरम लावा रेखा की खाई के अंदर ही उड़ेल दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बेदम होकर बेड पर गिर पड़े। कमरे में सिर्फ उनकी भारी साँसों की आवाजें आ रही थीं। रेखा का पूरा शरीर अभी भी कांप रहा था और नवीन का खीरा धीरे-धीरे ढीला पड़ रहा था। कुछ देर तक दोनों खामोश रहे, बस एक-दूसरे की धड़कनों को महसूस करते रहे। रेखा ने नवीन के माथे पर एक प्यार भरा चुंबन दिया और उसे अपने तरबूजों के बीच सटा लिया। वह पल सिर्फ शारीरिक सुख का नहीं था, बल्कि दो प्यासी रूहों के मिलन का था। नवीन को महसूस हुआ कि इस एक रात ने उनके बीच का रिश्ता हमेशा के लिए बदल दिया है।

उसके बाद की स्थिति बहुत ही भावुक थी। रेखा की आँखों में शर्म के साथ-साथ एक संतुष्टि का भाव था। उसने नवीन का हाथ पकड़कर कहा, ‘आज तक मुझे ऐसा अहसास कभी नहीं हुआ था।’ नवीन ने उसे अपनी बाहों में और कस लिया। दोनों के शरीर अभी भी पसीने से चिपके हुए थे, लेकिन वह अहसास बहुत ही सुखद था। उस रात के बाद, उनके बीच का पर्दा पूरी तरह हट चुका था। अब वे सिर्फ पड़ोसी नहीं थे, बल्कि एक-दूसरे की गोपनीय जरूरतों के साथी बन चुके थे। नवीन जब अपने फ्लैट वापस लौटा, तो उसके शरीर पर रेखा की खुशबू और उसके खीरे पर रेखा की खाई का रस अभी भी लगा हुआ था, जो उसे उस यादगार खुदाई की याद दिला रहा था।

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