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मीना चाची की खुदाई


मीना चाची की खुदाई—>

बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और आसमान में बिजली की कड़क के साथ ठंडी हवाएं चल रही थीं, लेकिन घर के अंदर का माहौल बहुत ही गर्म और उत्तेजक था। अजय अपने चाचा के घर कुछ दिनों के लिए रहने आया था, जहाँ उसकी बेहद खूबसूरत और जवान मीना चाची अकेली थीं क्योंकि चाचा किसी व्यापारिक काम से बाहर गए हुए थे। मीना चाची की उम्र करीब पैंतीस साल थी, लेकिन उनका शरीर किसी बीस साल की कंवारी लड़की जैसा कसा हुआ और सुडौल था। उनकी सांवली और चमकदार त्वचा पर जब पसीने की बूंदें चमकती थीं, तो अजय का दिल काबू से बाहर होने लगता था। आज बारिश की वजह से मौसम में जो नमी थी, उसने दोनों के दिलों में दबी हुई इच्छाओं को जैसे हवा दे दी थी और अजय की निगाहें बार-बार चाची के शरीर के उतार-चढ़ाव पर जाकर टिक रही थीं।

मीना चाची ने उस दिन एक हल्के बैंगनी रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी थी जो उनके शरीर से चिपक गई थी और उनके अंगों की बनावट को साफ बयां कर रही थी। उनके भारी और गोल ‘तरबूज’ साड़ी के नीचे से ऐसे उभर रहे थे जैसे वो बाहर आने के लिए बेताब हों, और ब्लाउज का गहरा गला उनके बीच की गहरी घाटी को पूरी तरह उजागर कर रहा था। अजय जब भी उनके पास से गुजरता, उसे उनके शरीर से उठती मदहोश करने वाली खुशबू पागल कर देती थी। चाची भी अजय की नज़रों को महसूस कर रही थीं और उनकी आँखों में भी एक अजीब सी प्यास झलक रही थी जो शायद वर्षों से दबी हुई थी। रसोई में काम करते हुए जब वो झुकतीं, तो उनका विशाल ‘पिछवाड़ा’ साड़ी में कस जाता था, जिसे देखकर अजय का ‘खीरा’ अपनी जगह पर अंगड़ाई लेने लगता था और उसके अंदर एक अजीब सी बेचैनी भर जाती थी।

शाम ढलते-ढलते घर की बिजली गुल हो गई और पूरे घर में अंधेरा छा गया, सिर्फ मोमबत्ती की मद्धम रोशनी ही कमरों को रोशन कर रही थी। मीना चाची ने अजय को आवाज दी और कहा कि उन्हें डर लग रहा है, जिसके बाद अजय उनके कमरे में चला गया जहाँ वो बिस्तर पर बैठी अपनी साड़ी के पल्लू से हवा कर रही थीं। अजय ने देखा कि गर्मी की वजह से उनके ‘तरबूज’ के ऊपर पसीने की धार बह रही थी जो सीधे उनकी नाभि की गहराई में जाकर समा रही थी। अजय की हिम्मत आज जवाब दे रही थी और उसने धीरे से चाची के कंधे पर हाथ रखा, तो उनकी पूरी देह कांप उठी। चाची ने मना नहीं किया बल्कि अपनी आँखें बंद कर लीं और एक ठंडी आह भरी, जो इस बात का संकेत था कि वो भी उसी आग में जल रही हैं जिसमें अजय जल रहा था।

अजय के हाथों का स्पर्श पाकर मीना चाची का शरीर पिघलने लगा और उन्होंने धीरे से अपना सिर अजय के सीने पर रख दिया। अजय ने उनके चेहरे को ऊपर उठाया और उनके गुलाबी होंठों का रस चखने लगा, यह स्वाद इतना मीठा था कि दोनों सुध-बुध खो बैठे। धीरे-धीरे अजय के हाथ नीचे की ओर बढ़े और उन्होंने चाची के ब्लाउज के ऊपर से ही उनके ‘तरबूज’ को अपनी मुट्ठी में भर लिया। चाची के मुँह से एक सिसकारी निकली और उन्होंने अजय को और जोर से जकड़ लिया। अजय ने उनके ‘तरबूज’ को मसलना शुरू किया और उनके ऊपरी हिस्से पर मौजूद ‘मटर’ को अपनी उंगलियों से सहलाने लगा, जिससे चाची की सांसें तेज हो गईं और वो बिस्तर पर लेट गईं, अजय को अपने ऊपर खींचते हुए।

अब कमरा उनकी आहों और चुंबनों की आवाजों से गूंज रहा था। अजय ने बड़ी बेताबी से चाची की साड़ी के बंधनों को ढीला किया और उन्हें उनके कपड़ों से पूरी तरह आजाद कर दिया। चाची का नग्न शरीर मोमबत्ती की रोशनी में किसी सुनहरी प्रतिमा जैसा लग रहा था। अजय ने देखा कि उनकी ‘खाई’ के आसपास के ‘बाल’ बहुत करीने से कटे हुए थे और वहाँ से एक प्राकृतिक गंध आ रही थी जो उसे उत्तेजित कर रही थी। अजय ने अपना चेहरा उनकी ‘खाई’ के पास ले जाकर उसे ‘खीरा चाटना’ जैसा महसूस किया, लेकिन असल में वो अपनी जीभ से उनकी ‘खाई’ का स्वाद ले रहा था। चाची की कमर ऊपर उठने लगी और वो अजय के बालों को अपनी उंगलियों में फंसाकर ज़ोर-ज़ोर से कराहने लगीं, उनकी ‘खाई’ अब पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और रस बहने लगा था।

अजय ने अब अपना ‘खीरा’ बाहर निकाला जो पूरी तरह से तन चुका था और लोहे जैसा सख्त हो गया था। मीना चाची ने जब उस विशाल ‘खीरे’ को देखा तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं, उन्होंने उसे अपने हाथों में पकड़ा और उसका ऊपर का हिस्सा अपने मुँह में लेकर उसे ‘चूसना’ शुरू कर दिया। अजय की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा और उसे लगा कि उसका रस अभी निकल जाएगा, लेकिन उसने खुद पर काबू पाया। चाची बड़ी कुशलता से उस ‘खीरे’ को अपने मुँह की गर्मी दे रही थीं और उनकी जीभ उसके चारों ओर घूम रही थी। अजय ने उन्हें रोका और सीधा लिटाकर उनकी टांगों को अपने कंधों पर रख लिया ताकि वो ‘सामने से खुदाई’ शुरू कर सके।

जैसे ही अजय ने अपने ‘खीरे’ का ऊपरी सिरा चाची की ‘खाई’ के द्वार पर रखा, चाची ने एक लंबी सांस ली और अजय की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। अजय ने धीरे से दबाव बनाया और ‘खीरा’ धीरे-धीरे उस तंग और गर्म ‘खाई’ के अंदर धंसने लगा। चाची के मुँह से ‘उफ़… आह… अजय’ जैसी आवाजें निकलने लगीं और उन्होंने अपनी आँखें जोर से मीच लीं। जब आधा ‘खीरा’ अंदर चला गया, तो अजय थोड़ी देर के लिए रुक गया ताकि चाची उस दबाव को सह सकें। चाची ने धीरे से अपनी कमर हिलाई और अजय को और गहरा जाने का इशारा किया। अजय ने अब एक ही झटके में पूरा ‘खीरा’ उनकी ‘खाई’ की गहराई तक उतार दिया, जिससे चाची की एक चीख निकल गई जो सुख और हल्के दर्द का मिश्रण थी।

अब कमरे में सिर्फ ‘खुदाई’ की आवाजें आ रही थीं। अजय पूरी ताकत के साथ धक्के लगा रहा था और हर धक्के के साथ चाची के ‘तरबूज’ ऊपर-नीचे उछल रहे थे। अजय ने उनके एक ‘मटर’ को अपने मुँह में भर लिया और उसे चूसते हुए अपनी रफ्तार और बढ़ा दी। चाची भी अब पूरी लय में आ चुकी थीं और नीचे से अपनी कमर को ऊपर उठाकर अजय का साथ दे रही थीं। दोनों के शरीर पसीने से लथपथ थे और उनकी त्वचा के आपस में टकराने की चप-चप की आवाज गूंज रही थी। चाची बार-बार कह रही थीं, ‘और ज़ोर से खोदो अजय… मुझे पूरी तरह से भर दो… आज मुझे तुम्हारी ही ज़रूरत थी।’ अजय ने उनकी स्थिति बदली और उन्हें घुटनों के बल करके ‘पिछवाड़े से खुदाई’ शुरू की, जिससे ‘खीरा’ और भी गहराई तक जाने लगा।

काफी देर तक चली इस जबरदस्त ‘खुदाई’ के बाद दोनों का शरीर कांपने लगा। अजय को महसूस हुआ कि उसके ‘खीरे’ के अंदर से लावा निकलने वाला है और ठीक उसी समय चाची की ‘खाई’ ने भी संकुचन शुरू कर दिया। चाची जोर-जोर से कांपने लगीं और चिल्लाईं, ‘अजय… मेरा रस निकल रहा है!’ और तभी अजय ने भी अपना सारा गरम ‘रस’ उनकी ‘खाई’ की गहराई में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े, उनकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। चाची ने अजय को कसकर गले लगा लिया और उसके माथे को चूमते हुए कहा कि आज उन्होंने वो सुख पाया है जो उन्हें कभी नहीं मिला था। उस रात बारिश थम गई थी, लेकिन उन दोनों के बीच शुरू हुई इस नई कहानी की शुरुआत अभी बाकी थी, जो अब हर उस रात दोहराई जाने वाली थी जब चाचा घर पर नहीं होते थे।

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