रिया उस छोटे से तटीय गांव के आखिरी घर में अकेली थी। रात के १ बजे समंदर की लहरें इतनी तेज थीं कि उनकी आवाज दीवारों से टकराकर घर के अंदर तक गूंज रही थी। हवा में नमक और बारिश की महक घुली हुई थी। रिया की हल्की नीली साड़ी समंदर की छींटों से भीगकर उसके शरीर से चिपक गई थी। साड़ी का पल्लू इतना भारी हो गया था कि वह बार-बार सरक रहा था, और उसके तरबूज पूरी तरह उभरे हुए थे – हर सांस के साथ हिलते हुए, मटर सख्त होकर कपड़े के नीचे से दबाव डाल रहे थे। वह बालकनी पर खड़ी थी, लहरों को देख रही थी, लेकिन मन कहीं और था – लंबे समय से दबी हुई एक भूख, जो आज रात समंदर की तरह उफान पर थी।
तभी पीछे से किसी की आवाज आई। “रिया… इतनी रात में बाहर?” रिया मुड़ी। सामने अरुण खड़ा था – गांव का मछुआरा, जिसकी नाव दिन में उसे समंदर पर ले गई थी। अरुण का शरीर मजबूत था, धूप से झुलसा हुआ, बाल समंदर के पानी से गीले, और आँखों में एक गहरी, जंगली चमक। उसके कपड़े भी भीगे हुए थे, शरीर से चिपके हुए – हर मांसपेशी साफ दिख रही थी। “नाव में पानी भर गया… मैं यहां रुक सकता हूं? बाहर तूफान है।” उसकी आवाज में एक कच्ची, भूखी गर्माहट थी। रिया ने कुछ नहीं कहा। बस दरवाजा खुला छोड़ दिया और अंदर चली गई। उसका मन डर रहा था, लेकिन शरीर पहले से ही उसकी तरफ खिंच रहा था।
दोनों कमरे में बैठ गए। छोटी सी लैंप जल रही थी, जिसकी रोशनी में अरुण का चेहरा और गहरा लग रहा था। लहरों की आवाज इतनी तेज थी कि बाहर की दुनिया गायब हो चुकी थी। बातें शुरू हुईं – समंदर की कहानियां, रिया की अकेली रातें, अरुण का समंदर से गहरा रिश्ता। लेकिन शब्द जल्दी खत्म हो गए। नजरें ज्यादा बोलने लगीं। अरुण ने धीरे से कहा, “तुम्हारी आँखों में समंदर है… लेकिन उसमें एक तूफान भी छिपा है।” रिया ने कुछ नहीं कहा। बस सिर झुका लिया। अरुण का हाथ बढ़ा और रिया की उंगलियों को छुआ। उस स्पर्श में समंदर की सारी नमी और गर्मी थी – खारा, गहरा, बेकाबू। रिया की सांस रुक गई। उसकी खाई में अब गर्म, चिपचिपा रस महसूस हो रहा था – जैसे कोई लहर अंदर से उठ रही हो।
अरुण धीरे से करीब आया। उनकी सांसें अब एक हो चुकी थीं। पहले संतरा चूसना धीमा था, लेकिन इतना गहरा कि जैसे समंदर की पूरी गहराई एक साथ सोखी जा रही हो। अरुण के होंठ रिया के होंठों को ऐसे चूस रहे थे जैसे कोई पका, नमकीन फल पहली बार चखा जा रहा हो – धीरे-धीरे, हर स्वाद को लंबे समय तक जीभ पर रखते हुए, जीभ अंदर तक घुसकर खेल रही थी, नच रही थी। रिया की आँखें बंद हो गईं। उसके शरीर में एक मीठी, तेज लहर दौड़ गई – पैरों से सिर तक। अरुण का हाथ उसकी कमर पर फिसला, फिर पीठ पर। उसने साड़ी का पल्लू धीरे से खींचा। साड़ी सरककर गिर गई। रिया के तरबूज लैंप की पीली रोशनी में नंगे चमक रहे थे। मटर इतने सख्त थे कि हल्की सी हवा से भी कांप रहे थे। अरुण ने दोनों हाथों से एक तरबूज को थामा – हल्के से दबाया, फिर जोर से मसला, निचोड़ा। रिया के मुंह से एक गहरी, लंबी कराह निकली – “आआह्ह्ह… अरुण…”। अरुण ने मटर को मुंह में लिया, जीभ से गोल-गोल घुमाया, धीरे-धीरे, लंबे समय तक चूसा – जैसे कभी छोड़ना ही न चाहता हो। रिया ने अरुण के बालों में उंगलियां फंसाईं, उसे इतनी जोर से खींचा कि उसकी सांस रुक गई।
अरुण ने रिया को पुराने लकड़ी के बिस्तर पर लिटा दिया। समंदर की लहरें दीवारों से टकरा रही थीं, लेकिन दोनों के शरीरों से निकलती गर्मी ने ठंड को कहीं दूर भगा दिया। अरुण ने अपनी शर्ट उतारी। उसका खीरा समंदर की तरह तना हुआ था – मजबूत, गहरा, नमकीन गंध वाला। रिया ने उसे देखा। शर्म से आँखें बंद कीं, लेकिन फिर खोलकर घूरती रही – उत्सुकता, लालसा, डर सब मिलकर एक नई लहर जगा रहे थे। अरुण ने रिया की पेटीकोट ऊपर की। खाई पर बाल गीले, चिपके हुए, समंदर की नमी से भरे हुए थे। अरुण ने पहले उंगली से छुआ, फिर दो उंगलियां धीरे से अंदर डालीं – गहराई तक। रिया की कमर इतनी जोर से उठी कि बिस्तर हिल गया। “अरुण… और… समंदर की तरह गहरा…” उसकी आवाज अब फुसफुसाहट नहीं, बल्कि एक गहरी, जरूरत भरी पुकार थी। अरुण ने खाई चाटना शुरू किया – जीभ धीरे-धीरे अंदर जाती, बाहर आती, हर कोने को, हर सिलवट को चाटती, सोखती। रिया का पूरा शरीर लहरा रहा था, कांप रहा था। खुजली इतनी गहरी, इतनी मीठी, इतनी असहनीय थी कि वह चीखने को तैयार थी।
अरुण ने अपना खीरा रिया की खाई के मुंह पर टिकाया। बहुत धीरे से दबाया। खीरा अंदर सरकता हुआ महसूस हुआ – हर इंच एक नई लहर ला रहा था। रिया ने दर्द और सुख की मिली-जुली लहर से अंगुलियां अरुण की पीठ पर इतनी जोर से गाड़ दीं कि निशान पड़ गए। अरुण रुक-रुक कर अंदर जा रहा था, हर पल को, हर सेंटीमीटर को महसूस करते हुए। जब खीरा पूरी तरह अंदर समा गया तो दोनों एक पल के लिए रुक गए – सांसें मिली हुईं, दिल एक ही लय में धड़क रहे। फिर अरुण ने पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। रिया घुटनों के बल थी, अरुण पीछे से। हर गहरे, जोरदार धक्के के साथ रिया के तरबूज इतनी तेजी से लहरा रहे थे कि लैंप की रोशनी में वे नाचते दिख रहे थे। अरुण एक हाथ से उन्हें मसल रहा था, निचोड़ रहा था, दूसरा हाथ रिया की कमर पर इतना कसकर जकड़े हुए था कि नीले निशान पड़ने वाले थे। रिया की कराहें अब समंदर की हर लहर में घुल गई थीं – लहरें टकरातीं, हवा सिसकारती, सब उनके सुख में शामिल हो गए थे। पसीना दोनों के शरीर पर नदियों सा बह रहा था।
रफ्तार अब पूरी तरह समुद्री तूफान की तरह हो चुकी थी। रिया महसूस कर रही थी कि उसकी खाई खीरे की कैद बन गई है – उसे इतनी कसकर जकड़े हुए कि हर थ्रस्ट पर और गहरा खींच रही है, और गहरा निचोड़ रही है। अरुण हर बार पूरी ताकत से, पूरी गहराई से धक्का दे रहा था। अचानक रिया का पूरा शरीर एक तेज, अनियंत्रित लहर में आ गया। रस छूट गया – गर्म, तेज, मीठी, लगातार लहरें खाई से निकलकर खीरे को पूरी तरह भिगो रही थीं, चिपका रही थीं। अरुण भी कुछ ही सेकंड बाद जोर से, पूरी ताकत से कांप उठा और अपना रस अंदर छोड़ दिया – गहरा, गर्म, भरपूर, जैसे समंदर का कोई पुराना रहस्य दोनों के बीच हमेशा के लिए समा गया हो। दोनों थककर, हांफते हुए बिस्तर पर गिर पड़े। लंबे समय तक एक-दूसरे से चिपके रहे, सांसें धीमी होती रहीं।
बाहर समंदर अब थोड़ा शांत हो रहा था। लहरें अभी भी गूंज रही थीं। रिया ने अरुण की चौड़ी, पसीने से भीगी छाती पर सिर रखा। अरुण ने उसके गीले बालों में उंगलियां फिराईं, धीरे-धीरे सहलाया। रिया की आवाज बहुत धीमी, कांपती हुई थी, “सुबह तुम नाव लेकर चले जाओगे?” अरुण ने उसके माथे पर होंठ रखे, लंबे समय तक चूमे और फुसफुसाया, “नहीं रिया। इस समंदर में अब सिर्फ हम हैं… और यह रात हमेशा, हमेशा हमारी रहेगी।” दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा – गहराई से, बिना कुछ कहे। वो रात समंदर की सबसे गहरी, सबसे उफानी, सबसे मीठी रात बन गई।
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