समीर और रेखा की चु@@ई —> समीर अपने घर की बालकनी में खड़ा होकर बाहर की ओर देख रहा था, लेकिन उसका ध्यान बाहर की हरियाली में नहीं बल्कि अंदर रसोई में काम कर रही अपनी सौतेली माँ रेखा पर था। रेखा की उम्र छत्तीस साल थी, लेकिन उनके शरीर की बनावट और चेहरे की चमक किसी बीस साल की युवती से कम नहीं थी। जब से समीर के पिता व्यापार के सिलसिले में शहर से बाहर गए थे, घर की फिजाओं में एक अजीब सी उत्तेजना और खामोशी घुल गई थी जो समीर को बेचैन कर रही थी। समीर चौबीस साल का एक गठीले शरीर वाला युवक था, जो अपनी माँ की सुंदरता का कायल था और अक्सर चोरी-छिपे उन्हें काम करते हुए निहारता रहता था।
रेखा का शरीर बहुत ही आकर्षक और सुडौल था, उनकी कमर पतली थी और उनके शरीर के ऊपरी हिस्से में दो बड़े और रसीले तरबूज जैसे उभार थे जो उनकी सूती साड़ी के ब्लाउज को फाड़कर बाहर आने को बेताब लगते थे। जब भी वो चलती थीं, उनके पीछे का भारी पिछवाड़ा एक लय में हिलता था, जिसे देख समीर का खून उबाल मारने लगता था। उनकी आँखों में एक अलग तरह की प्यास थी जिसे समीर ने कई बार पकड़ा था, लेकिन सामाजिक मर्यादाओं के कारण वो हमेशा चुप रह जाता था। आज घर में कोई नहीं था और बाहर की गर्मी और अंदर के अकेलेपन ने दोनों के बीच के उस अनकहे खिंचाव को एक नई दिशा देने का मन बना लिया था।
उस शाम घर का माहौल बहुत गर्म था, पंखा चल रहा था पर समीर के मन के अंदर की तपिश कम नहीं हो रही थी। वो धीरे से रसोई की तरफ बढ़ा जहाँ रेखा सब्जी काट रही थीं। उनके शरीर से उठती पसीने और चमेली के तेल की मिली-जुली महक समीर की नाक में समा रही थी। समीर ने पीछे से जाकर उनकी पतली कमर को छुआ, जिससे रेखा अचानक सिहर उठीं और उनके हाथ से चाकू नीचे गिर गया, उनकी साँसों की गति तेज हो गई थी। उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा, लेकिन समीर की उंगलियों का वो स्पर्श उनकी रीढ़ की हड्डी में एक बिजली सी दौड़ा गया था।
रेखा ने पलट कर समीर की आँखों में देखा, उन आँखों में गुस्सा नहीं बल्कि एक समर्पण और बरसों की दबी हुई हसरत साफ झलक रही थी। उन्होंने समीर के चेहरे पर अपना हाथ रखा और बड़े प्यार से सहलाने लगीं, जिससे समीर का पूरा शरीर कांपने लगा। समीर ने बिना कुछ कहे उन्हें अपनी बाहों में भर लिया और उनके चेहरे के करीब जाकर उनके होंठों के पास अपनी सांसें छोड़ने लगा। रेखा ने अपनी आँखें मूंद लीं और समीर को अपने करीब आने का मूक निमंत्रण दे दिया, जैसे वो बरसों से इसी एक पल का इंतजार कर रही हों। समीर ने उनके अधरों का रस पीना शुरू किया, और रेखा ने भी अपनी बाहें उसकी गर्दन में डाल दीं।
समीर के हाथ अब रेखा के रेशमी साड़ी के पल्लू को खिसकाने लगे थे, और जैसे ही पल्लू गिरा, उनके सफेद ब्लाउज में कैद वो विशाल तरबूज समीर की आँखों के सामने थे। समीर ने धीरे से ब्लाउज के हुक खोले, और जैसे ही हुक खुले, रेखा के तरबूज आज़ाद होकर बाहर आ गए। समीर ने अपनी उंगलियों से उनके तरबूजों के ऊपर मौजूद नन्हे मटर के दानों को सहलाया, जिससे रेखा के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकली। रेखा का शरीर धनुष की तरह तन गया था और वो समीर के बालों में अपनी उंगलियां फंसाकर उसे और करीब खींचने लगी थीं।
समीर ने अपना चेहरा नीचे झुकाया और रेखा के उन रसीले तरबूजों को बारी-बारी से अपने मुँह में भरना शुरू किया, जबकि उसके हाथ उनकी कमर और पिछवाड़े को जोर-जोर से मसल रहे थे। रेखा की सिसकारियां अब पूरे कमरे में गूँजने लगी थीं, वो समीर का नाम ले-लेकर उसे पुकार रही थीं। समीर ने अब रेखा की साड़ी और पेटीकोट की डोर खींच दी, जिससे वो वस्त्र उनके पैरों के पास ढेर हो गए। रेखा अब समीर के सामने बिल्कुल वैसी ही थीं जैसे कुदरत ने उन्हें बनाया था, उनकी खाई के पास काले और मुलायम बाल देख समीर की उत्तेजना और बढ़ गई।
समीर ने जल्दी से अपने कपड़े उतारे और उसका खड़ा हुआ लंबा और मोटा खीरा रेखा की आँखों के सामने तनकर खड़ा हो गया। रेखा ने जब पहली बार समीर के उस विशाल खीरे को देखा, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं, उन्होंने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उस गर्म खीरे को अपनी मुट्ठी में भर लिया। समीर को ऐसा लगा जैसे उसे जन्नत मिल गई हो। रेखा ने नीचे झुककर समीर के उस खीरे को अपने मुँह में लेना शुरू किया, उनकी जीभ की गर्मी और थूक की चिकनाहट ने समीर को पागल कर दिया। वो जोर-जोर से सांसें लेने लगा और रेखा का सिर अपने खीरे पर दबाने लगा।
थोड़ी देर तक खीरा चूसने के बाद, समीर ने रेखा को पलटा और उन्हें बिस्तर पर लेटा दिया। उसने रेखा की टांगों को चौड़ा किया और अपनी उंगली से उनकी खाई की गहराई को टटोलने लगा। रेखा की खाई पूरी तरह से गीली और फिसलन भरी हो चुकी थी, जो इस बात का सबूत थी कि वो खुदाई के लिए पूरी तरह तैयार हैं। समीर ने अपनी उंगली से खाई में उंगली करना शुरू किया, जिससे रेखा अपने कूल्हे ऊपर उठाने लगीं और जोर-जोर से कराहने लगीं। समीर ने अब अपनी जीभ नीचे ले जाकर रेखा की खाई चाटना शुरू किया, जिससे रेखा का शरीर बुरी तरह कांपने लगा और उनका रस छूटने ही वाला था।
समीर ने अब और इंतजार नहीं किया, उसने रेखा को घुटनों के बल बिठाया और पीछे से उनके पिछवाड़े की ओर से अपना गरम खीरा उनकी खाई के द्वार पर टिका दिया। समीर ने एक जोरदार धक्का मारा और उसका आधा खीरा रेखा की तंग खाई के अंदर समा गया। रेखा के मुँह से एक तीखी चीख निकली, लेकिन वो दर्द की नहीं बल्कि चरम आनंद की थी। समीर ने फिर से एक और जोरदार धक्का लगाया और पूरा खीरा जड़ तक रेखा की खाई में उतर गया। रेखा ने बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठियों में भींच लिया और उनकी आँखें ऊपर चढ़ गईं।
समीर ने अब पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, उसकी हर चोट पर रेखा का पूरा शरीर हिल रहा था। समीर की जांघें जब रेखा के पिछवाड़े से टकराती थीं, तो एक ‘चप-चप’ की आवाज पूरे कमरे में संगीत की तरह गूँजती थी। समीर ने रेखा के बालों को पकड़ा और उन्हें और तेजी से खोदना शुरू किया। रेखा चिल्ला रही थीं, ‘ओह समीर, और तेज, मुझे पूरी तरह से भर दो, बहुत मजा आ रहा है!’ समीर की रफ्तार अब बेकाबू हो चुकी थी, वो एक जंगली जानवर की तरह रेखा की खाई की खुदाई कर रहा था, और रेखा हर धक्के को अपनी रूह तक महसूस कर रही थीं।
थोड़ी देर बाद समीर ने रेखा को सीधा लेटाया और सामने से खोदना शुरू किया। उसने रेखा की दोनों टांगों को अपने कंधों पर रख लिया जिससे उसकी खाई पूरी तरह से खुल गई और समीर का खीरा गहराई तक चोट करने लगा। समीर ने झुककर रेखा के होंठों को चूसना शुरू किया और साथ ही नीचे अपनी खुदाई की गति बढ़ा दी। रेखा के हाथ समीर की पीठ पर नाखूनों के निशान बना रहे थे, वो चरम सुख की उस दहलीज पर थीं जहाँ से वापस आना नामुमकिन था। समीर का भी बुरा हाल था, उसका पसीना रेखा के बदन पर गिर रहा था जो दोनों के बीच की घर्षण को और कामुक बना रहा था।
खुदाई के दौरान समीर ने रेखा से कहा, ‘माँ, आप कितनी गरम हो, आपकी खाई ने मेरे खीरे को जकड़ लिया है।’ रेखा ने हाँफते हुए जवाब दिया, ‘समीर, मेरा बेटा, तुम बहुत अच्छा खोद रहे हो, मुझे अपना पूरा रस इसी खाई में दे देना, मुझे आज खाली मत छोड़ना।’ यह सुनकर समीर के अंदर एक नई ऊर्जा का संचार हुआ और उसने अपनी गति को चरम सीमा तक पहुँचा दिया। रेखा का शरीर अब धनुष की तरह मुड़ने लगा था, उनकी खाई से ढेर सारा रस निकलने लगा था और वो जोर-जोर से कांपने लगी थीं।
अंत में, समीर को महसूस हुआ कि उसका खीरा अब और ज्यादा देर तक बर्दाश्त नहीं कर पाएगा, उसने रेखा को कसकर अपनी बाहों में जकड़ा और आखिरी के दस-पंद्रह बहुत ही तेज और गहरे धक्के मारे। समीर के खीरे से गरम-गरम रस की पिचकारी छूटी और रेखा की खाई के अंदरूनी हिस्सों को नहला दिया। उसी पल रेखा का भी रस निकला और दोनों एक-दूसरे में लिपटे हुए बिस्तर पर ढह गए। दोनों के शरीरों से पसीना बह रहा था और कमरे में सिर्फ उनके हाँफने की आवाजें आ रही थीं।
काफी देर तक दोनों वैसे ही खामोश लेटे रहे, जैसे वो उस अद्भुत एहसास को अपने अंदर उतार रहे हों। समीर ने रेखा के माथे को चूमा और उन्हें अपनी बाहों में और भींच लिया। रेखा की आँखों में एक अजीब सी संतुष्टि थी, उन्होंने समीर की छाती पर अपना सिर रखा और धीरे से कहा, ‘तुमने आज मुझे वो सुख दिया है जिसकी मुझे बरसों से तलाश थी।’ समीर ने उनके बालों को सहलाते हुए कहा, ‘यह तो बस शुरुआत है माँ, अब हमारी यह खुदाई अक्सर होती रहेगी।’ दोनों के बीच का रिश्ता अब बदल चुका था, जिसमें शर्म की जगह एक गहरा और नशीला राज जुड़ गया था।
उस रात के बाद घर की खामोशी में एक नई गर्माहट आ गई थी। जब भी उनके पिता घर पर नहीं होते, समीर और रेखा अपनी उस गुप्त दुनिया में खो जाते जहाँ सिर्फ उनका प्यार और वो रसीली खुदाई होती थी। रेखा अब पहले से ज्यादा खिल उठी थीं और समीर के अंदर एक नया आत्मविश्वास आ गया था। समाज की नजरों में वो माँ-बेटा थे, लेकिन बंद कमरों के पीछे वो दो प्यासे जिस्म थे जो एक-दूसरे की खाई और खीरे की प्यास बुझाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे।