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साली की मदहोश खुदाई


साली की मदहोश खुदाई—>

बरसात की उस भीगी हुई शाम में समीर अपनी साली कविता के घर पहुँचा था। कविता के पति शहर से बाहर थे और घर में सिर्फ कविता ही अकेली थी। जैसे ही समीर ने घर में कदम रखा, बाहर मूसलाधार बारिश शुरू हो गई, मानो कुदरत ने भी उन दोनों को एक साथ वक्त बिताने का इशारा कर दिया हो। कविता ने समीर का स्वागत एक ऐसी मुस्कान से किया जिसमें एक अजीब सी कशिश और शरारत छुपी हुई थी। उसने हल्की बैंगनी रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी थी, जो उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को बखूबी बयां कर रही थी। समीर की नजरें जैसे ही कविता के उभरे हुए तरबूजों पर पड़ीं, उसके दिल की धड़कनें तेज हो गईं, क्योंकि साड़ी के पतले कपड़े से उन तरबूजों की गोलाई साफ झलक रही थी।

कविता रसोई में चाय बनाने चली गई और समीर वहीं सोफे पर बैठकर उसे निहारने लगा। कविता का शरीर किसी तराशी हुई मूरत जैसा था, उसका पिछवाड़ा साड़ी में बहुत ही आकर्षक और भारी नजर आ रहा था, जो हर कदम पर थिरक रहा था। समीर ने महसूस किया कि उसके पजामे के अंदर उसका खीरा धीरे-धीरे अंगड़ाई लेने लगा है। जब कविता चाय लेकर आई और समीर के पास सोफे पर बैठी, तो उसके जिस्म की भीनी-भीनी खुशबू समीर के नथुनों से टकराई। चाय का कप देते समय कविता की उंगलियां समीर के हाथ से छुईं और एक बिजली सी दोनों के बदन में दौड़ गई। समीर ने देखा कि ठंडी हवा के झोंकों की वजह से कविता के तरबूजों के ऊपर मौजूद मटर अब साफ उभर आए थे, जो साड़ी के आर-पार अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे।

समीर ने हिम्मत जुटाकर कविता का हाथ थाम लिया और उसे अपनी ओर खींचा। कविता ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उसकी आंखों में एक गहरी प्यास दिखाई दी। समीर ने धीरे से कविता के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके लबों का शहद चखना शुरू कर दिया। दोनों के बीच बरसों से दबी हुई इच्छाएं अब ज्वालामुखी बनकर फटने को तैयार थीं। समीर के हाथ कविता की पीठ पर रेंगने लगे और धीरे-धीरे नीचे उतरकर उसके भारी पिछवाड़े को सहलाने लगे। कविता के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकली और उसने समीर को और भी कसकर अपनी बाहों में भर लिया। समीर ने अब कविता के ब्लाउज के हुक खोल दिए, जिससे उसके विशाल और दूधिया तरबूज आजाद होकर बाहर आ गए।

समीर ने बिना देर किए उन तरबूजों को अपने हाथों में भर लिया और उनके ऊपर लगे मटर जैसे निप्पलों को अपने मुँह में लेकर रस लेने लगा। कविता कामुकता की लहरों में बह रही थी, उसका शरीर पसीने से भीगने लगा था और उसकी सांसें भारी हो गई थीं। समीर का खीरा अब पूरी तरह से कड़क और लंबा हो चुका था, जो पजामे को फाड़कर बाहर आने को बेताब था। उसने कविता की साड़ी और पेटीकोट को पूरी तरह उतार दिया, जिससे उसकी गहरी और रसीली खाई समीर के सामने उजागर हो गई। उस खाई के आसपास हल्के-हल्के बाल थे, जो उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रहे थे। समीर ने अपनी उंगली से खाई को टटोलना शुरू किया, तो पाया कि वह पहले से ही काफी गीली और रसीली हो चुकी थी।

समीर ने अब अपना खीरा पूरी तरह आजाद कर लिया और कविता के मुँह के पास ले गया। कविता ने बिना किसी झिझक के उस गरम और सख्त खीरे को अपने मुँह में भर लिया और उसे बड़ी शिद्दत से चूसने लगी। समीर को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह स्वर्ग के द्वार पर खड़ा हो। कुछ देर खीरा चूसने के बाद, समीर ने कविता को बिस्तर पर सीधा लिटाया और उसके दोनों पैरों को चौड़ा कर दिया। उसने अपने खीरे की नोक को कविता की रसीली खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से एक धक्का दिया। कविता के मुँह से एक तीखी कराह निकली क्योंकि समीर का खीरा काफी विशाल था, लेकिन धीरे-धीरे वह उस सुखद अहसास में डूबने लगी और पूरी खुदाई की प्रक्रिया शुरू हो गई।

समीर अब पूरी ताकत से कविता की खाई में खुदाई कर रहा था। हर धक्के के साथ एक थप-थप की आवाज कमरे में गूँज रही थी और कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे। समीर ने अब कविता को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने के लिए तैयार किया। उसने कविता को डॉगी स्टाइल में किया और अपने खीरे को पीछे से उसकी तंग खाई में उतार दिया। कविता बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींच रही थी और समीर के धक्कों का आनंद ले रही थी। समीर की गति अब और तेज हो गई थी, वह पागलों की तरह कविता को खोद रहा था। दोनों का शरीर पसीने से लथपथ था और कमरे में सिर्फ उनके जिस्मों के टकराने और भारी सांसों की आवाजें आ रही थीं।

अंत में, जब समीर को लगा कि उसका रस निकलने वाला है, उसने अपनी गति को चरम पर पहुँचा दिया। कविता भी अब अपने रस छूटने के करीब थी, वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी और समीर को अपने पिछवाड़े की ओर और कसने को कहने लगी। अचानक, समीर के खीरे से गरम रस की फुहारें कविता की खाई के अंदर छूटने लगीं और साथ ही कविता का भी रस निकल गया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर निढाल होकर गिर पड़े। समीर का खीरा अब धीरे-धीरे नरम हो रहा था लेकिन वह अभी भी कविता की खाई के अंदर ही था। दोनों की धड़कनें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं, लेकिन उस रात की खुदाई के निशान उनके शरीरों और रूह पर हमेशा के लिए अंकित हो गए थे।

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