सुष्मिता जी की उम्र कोई तीस के आसपास रही होगी, लेकिन उनके शरीर की बनावट किसी अठारह साल की कली जैसी कसी हुई थी। जब वो साड़ी पहनकर मेरे सामने पढ़ाने बैठती थीं, तो उनके साड़ी के पल्लू से झांकते हुए वो दो विशाल तरबूज मेरी आँखों को अपनी ओर खींच लेते थे। उन रसीले तरबूजों के ऊपर जब साड़ी का कपड़ा रगड़ता था, तो उनके बीच की गहरी घाटी और उन पर उभरे हुए छोटे-छोटे मटर साफ दिखाई देते थे। मेरी धड़कनें तेज़ हो जाती थीं और मेरा मन बस उन मटरों को अपने दांतों के बीच दबाने के लिए तड़पने लगता था। सुष्मिता जी की आँखों में एक अजीब सी गहराई थी, जो मुझे अपनी ओर खींचती थी और मैं बस उन्हें देखता ही रह जाता था।
उनका पिछवाड़ा इतना सुडौल और भरा हुआ था कि जब वो ब्लैकबोर्ड की तरफ मुड़ती थीं, तो साड़ी के नीचे उनके कूल्हों की हरकत साफ़ नज़र आती थी। मेरा खीरा साफ़ तौर पर अपनी जगह बनाने के लिए छटपटाने लगता था और मुझे अपनी पेंट में खिंचाव महसूस होने लगता था। सुष्मिता जी अक्सर पढ़ाते समय अपने बालों को पीछे की ओर करती थीं और उनकी गर्दन का वो कोमल अहसास मुझे मदहोश कर देता था। उनका शरीर एक ढली हुई मूरत की तरह था, जहाँ हर घुमाव एक नई कहानी कहता था। उनके गोरे बदन पर साड़ी का वो गहरा रंग उनकी कामुकता को और भी ज्यादा बढ़ा देता था, जिससे मेरा काबू खुद पर से खोने लगता था।
उस दिन दोपहर की गर्मी कुछ ज्यादा ही थी और सुष्मिता जी ने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा ढीला छोड़ा हुआ था। उनके दोनों तरबूज अपनी आधी आज़ादी का जश्न मना रहे थे और जैसे ही वो मेरी तरफ झुकीं, उनकी गहरी खाई की झलक मुझे साफ दिखाई दे गई। मेरी साँसें तेज़ हो गईं और मैंने महसूस किया कि मेरा खीरा अब पूरी तरह से अकड़ चुका है। मैंने उनकी आँखों में देखा, और पहली बार मुझे वहाँ भी वही प्यास दिखाई दी जो मेरे मन में थी। उन्होंने अपनी आवाज़ को थोड़ा धीमा किया और मुझसे कहा, ‘आर्यन, आज पढ़ाई में मन नहीं लग रहा क्या?’ उनकी उस कांपती हुई आवाज़ ने मेरे शरीर में बिजली सी दौड़ा दी थी।
मैंने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उनकी मेज़ पर रखे हाथ के ऊपर रख दिया। उन्होंने अपना हाथ हटाया नहीं, बल्कि उनकी उंगलियों ने मेरे हाथ को कसकर पकड़ लिया। वो स्पर्श इतना गर्म और गहरा था कि मेरी रूह तक कांप गई। ‘सुष्मिता जी, मैं बहुत समय से कुछ कहना चाहता था,’ मैंने फुसफुसाते हुए कहा। उन्होंने अपनी पलकें झुका लीं और उनके चेहरे पर एक हल्की सी लाली छा गई। ‘मैं जानती हूँ आर्यन, तुम्हारी आँखों ने सब कुछ पहले ही कह दिया था,’ उन्होंने जवाब दिया। हम दोनों के बीच का वो मौन अब टूट चुका था और एक नए रिश्ते की शुरुआत हो चुकी थी जो कि सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं थी।
मैंने अपनी कुर्सी उनके और करीब की और अपना हाथ उनकी पतली कमर पर रख दिया। उनके शरीर में एक सिहरन दौड़ गई और उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। साड़ी के रेशमी कपड़े के ऊपर से ही मुझे उनकी त्वचा की गर्माहट महसूस हो रही थी। मैंने धीरे-धीरे अपना हाथ ऊपर की ओर बढ़ाया और उनके एक विशाल तरबूज को अपनी हथेली में भर लिया। वो इतना मुलायम और भारी था कि मेरा मन किया बस उसे वहीं दबाता रहूँ। सुष्मिता जी के मुँह से एक हल्की सी कराह निकली, ‘आह, आर्यन… ये तुम क्या कर रहे हो?’ लेकिन उनकी पकड़ मेरी शर्ट पर और भी मज़बूत हो गई थी, जो उनकी रज़ामंदी साफ़ बता रही थी।
अब मैं रुकने वाला नहीं था, मैंने अपने होंठ उनके गर्दन के पास ले जाकर उनके कान के नीचे हल्के से रसपान किया। उनकी साँसें अब मेरे कानों में गरम हवा की तरह टकरा रही थीं। मैंने धीरे से उनके ब्लाउज के हुक खोलना शुरू किया और जैसे ही वो खुले, उनके दोनों तरबूज आज़ाद होकर बाहर आ गए। वो इतने गोरे और बड़े थे कि मैं उन्हें बस देखता ही रह गया। उनके ऊपर के मटर अब पूरी तरह से तन चुके थे और उत्तेजना में कांप रहे थे। मैंने झुककर एक मटर को अपने मुँह में लिया और उसे हल्के से चूसने लगा, जिससे सुष्मिता जी का पूरा बदन धनुष की तरह तन गया।
सुष्मिता जी ने मेरे सिर को अपने तरबूजों के बीच भींच लिया और उनकी उंगलियां मेरे बालों में कस गईं। ‘आह, आर्यन… बहुत अच्छा लग रहा है, और चूसो,’ उन्होंने बेसुध होकर कहा। मैंने बारी-बारी से दोनों तरबूजों का रस लिया और फिर मेरा हाथ धीरे से उनकी साड़ी के नीचे सरकने लगा। जैसे ही मेरा हाथ उनकी रेशमी और नम खाई तक पहुँचा, मुझे महसूस हुआ कि वो पहले से ही बहुत गीली हो चुकी थी। वहां छोटे-छोटे मुलायम बाल थे जो उंगलियों को सहला रहे थे। मैंने अपनी एक उंगली को उनकी खाई के अंदर डाला, तो उन्होंने एक लंबी आह भरी और अपने कूल्हों को मेरे हाथ की तरफ धकेला।
मेरी उंगली उनकी खाई की गहराई को नाप रही थी और सुष्मिता जी मदहोश होकर बिस्तर पर लेट गईं। मैंने उनकी साड़ी और पेटीकोट को पूरी तरह से उतार फेंका और अब वो मेरे सामने पूरी तरह से प्राकृतिक अवस्था में थीं। उनका गोरा बदन रोशनी में चमक रहा था और उनका पिछवाड़ा बिस्तर पर फैल गया था। मैंने अपनी पैंट उतारी और मेरा लंबा और सख्त खीरा उछलकर बाहर आ गया। उसे देखते ही सुष्मिता जी की आँखें फैल गईं, ‘इतना बड़ा, आर्यन! क्या ये मेरी छोटी सी खाई में समा पाएगा?’ मैंने मुस्कुराते हुए उनके पास जाकर उनके खीरे को उनके मुँह के पास किया और उन्होंने उसे तुरंत अपनी गिरफ्त में ले लिया।
वो मेरे खीरे को इतनी शिद्दत से चूस रही थीं कि मुझे स्वर्ग का अहसास हो रहा था। उनकी जीभ मेरे खीरे के चारों तरफ घूम रही थी और वो उसे गहराई तक अपने गले में ले रही थीं। कुछ देर बाद मैंने उन्हें रोका और उन्हें बिस्तर पर सीधा लिटा दिया। मैंने उनके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रखा, जिससे उनकी खाई पूरी तरह से मेरे सामने खुल गई। मैंने अपने खीरे की नोक को उनकी गीली खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से दबाव डाला। जैसे ही मेरा खीरा थोड़ा अंदर गया, सुष्मिता जी ने दर्द और आनंद के मिश्रण में एक चीख मारी, ‘आहह… धीरे आर्यन, बहुत टाइट है ये।’
मैंने धीरे-धीरे धक्के मारना शुरू किया और जल्द ही मेरा आधा खीरा उनकी तंग खाई के अंदर समा गया। उनकी अंदरूनी दीवारों ने मेरे खीरे को चारों तरफ से जकड़ लिया था। मैंने अपनी रफ्तार बढ़ाई और अब मैं पूरी ताकत से खुदाई करने लगा। हर धक्के के साथ मेरे अंडकोष उनके पिछवाड़े से टकरा रहे थे और एक गूंजने वाली आवाज़ पैदा हो रही थी। सुष्मिता जी के हाथ बिस्तर की चादर को कसकर जकड़े हुए थे और उनका सिर इधर-उधर हिल रहा था। ‘हाँ, आर्यन… ऐसे ही… मुझे पूरी तरह खोद दो… मैं तुम्हारी हूँ,’ वो चिल्ला रही थीं।
खुदाई की गति अब बहुत तेज़ हो चुकी थी और पूरा कमरा हम दोनों की साँसों और मांस के टकराने की आवाजों से गूंज रहा था। मैंने सुष्मिता जी को घुमाया और उन्हें पिछवाड़े से खोदने की स्थिति में ला दिया। उनका भारी पिछवाड़ा ऊपर की ओर उठा हुआ था और मेरी आँखों के सामने उनकी खाई और पिछवाड़े का छेद साफ़ दिख रहा था। मैंने पीछे से अपना खीरा फिर से उनकी खाई में उतारा और ज़ोर-ज़ोर से धक्के मारने लगा। सुष्मिता जी के तरबूज नीचे की ओर लटक रहे थे और हर धक्के के साथ झूल रहे थे। यह नज़ारा इतना कामुक था कि मेरा उत्तेजना का स्तर चरम पर पहुँच गया।
हम दोनों पसीने से लथपथ थे और सुष्मिता जी अब झड़ने के करीब थीं। उनकी खाई की मांसपेशियां मेरे खीरे को बुरी तरह भींच रही थीं। ‘आर्यन, मैं निकलने वाली हूँ… आह… मेरा रस छूट रहा है,’ वो चिल्लाईं और उनका पूरा शरीर कांपने लगा। उनकी खाई से ढेर सारा रस निकलने लगा जिसने मेरे खीरे को और भी चिकना कर दिया। ठीक उसी पल मैंने भी अपने धक्कों की रफ्तार को बेकाबू कर दिया और कुछ ही सेकंड में मेरा सारा गरम सफेद रस उनकी खाई की गहराइयों में फूट पड़ा। हम दोनों एक-दूसरे से लिपटकर बिस्तर पर ढेर हो गए, हमारी धड़कनें एक साथ रेस लगा रही थीं।
काफी देर तक हम दोनों ऐसे ही लेटे रहे, बस एक-दूसरे की साँसों को महसूस करते हुए। सुष्मिता जी के चेहरे पर एक असीम शांति और संतुष्टि थी। उन्होंने मेरा माथा चूमा और धीरे से कहा, ‘तुमने आज मुझे वो सुख दिया है जिसकी मुझे सालों से तलाश थी।’ मैंने उन्हें अपनी बाहों में और कस लिया और महसूस किया कि यह सिर्फ शरीर का मिलन नहीं था, बल्कि दो रूहों का एक-दूसरे में समा जाना था। उस कमरे की हवा में अभी भी हमारे मिलन की खुशबू और खुदाई की वो गर्मी बसी हुई थी, जो हमें फिर से एक-दूसरे के करीब आने का बुलावा दे रही थी।