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सूनी रात में पड़ोसिन के साथ खिड़की वाली खुदाई

रोहन पिछले कई महीनों से अपने फ्लैट के सामने रहने वाली शालू भाभी को चुपके-चुपके देख रहा था। शालू एक बहुत ही आकर्षक और भरी हुई देह वाली महिला थी, जिसके शरीर का हर अंग जैसे किसी सांचे में ढला हुआ था। जब वह अपनी बालकनी में आती, तो उसके रेशमी बालों के बीच से झलकते उसके विशाल और सुडौल तरबूज रोहन की धड़कनें बढ़ा देते थे। उन तरबूजों की गोलाई इतनी गहरी थी कि रोहन अक्सर घंटों उन्हें निहारते हुए अपनी कल्पनाओं में खो जाता था। शालू की पतली कमर और उसके पीछे का भारी पिछवाड़ा उसे एक कामुक देवी जैसा रूप देता था, जिससे रोहन का मन हमेशा विचलित रहता था।

शालू के स्वभाव में एक अजीब सी खामोशी थी, जो रोहन को अपनी ओर और भी ज्यादा खींचती थी। एक शाम जब बारिश थमी ही थी, रोहन ने देखा कि शालू अपनी साड़ी का पल्लू संभालते हुए खिड़की के पास खड़ी थी। उसकी पतली साड़ी गीली होने के कारण उसके बदन से चिपक गई थी, जिससे उसके तरबूजों के ऊपर मौजूद नन्हे मटर साफ झलक रहे थे। उन मटरों की कड़वाहट और उभार देखकर रोहन के शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। रोहन की नजरें जैसे वहीं जम गई थीं और उसे महसूस हुआ कि शालू भी उसकी इस प्यासी नजर को भांप रही थी, लेकिन उसने अपनी नजरें नहीं हटाईं।

उन दोनों के बीच एक अनकहा और गहरा भावनात्मक खिंचाव पैदा होने लगा था। रोहन ने हिम्मत जुटाई और एक बहाने से शालू के घर का दरवाजा खटखटाया। जब शालू ने दरवाजा खोला, तो उसके शरीर से आने वाली धीमी मोगरे की खुशबू ने रोहन को मदहोश कर दिया। दोनों की नजरें मिलीं और उस एक पल में शर्म और झिझक की सारी दीवारें गिर गईं। रोहन ने देखा कि शालू की सांसें तेज चल रही थीं और उसके उभरे हुए तरबूज उसकी धड़कनों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। रोहन ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा, तो शालू का पूरा शरीर एक बार कांप उठा, पर उसने हाथ पीछे नहीं खींचा।

रोहन ने अपनी उंगलियां शालू की मखमली कमर पर फेरीं, जिससे शालू के मुंह से एक धीमी आह निकल गई। उसने धीरे-धीरे शालू को अपनी ओर खींचा और उसके रसीले होंठों को अपने मुंह में भर लिया। चुंबन शुरू में बहुत नरम था, जैसे दोनों सालों से दबी हुई भावनाओं को पहली बार छू रहे हों। शालू के होंठ गर्म और थोड़े कांपते हुए थे। रोहन ने धीरे से उन्हें चूसा, जीभ से हल्का सा छुआ। शालू ने पहले हल्का विरोध किया, हाथों से रोहन के सीने को धकेला, लेकिन उसका शरीर उसकी इच्छा के खिलाफ काम कर रहा था। जल्दी ही वह खुद ही होंठों को और गहराई से दबाने लगी। दोनों की साँसें तेज हो गईं, कमरे में सिर्फ बारिश के बाद की ठंडक और उनके शरीरों की गर्मी थी। शालू की साड़ी का पल्लू अब पूरी तरह सरक चुका था, और उसके तरबूज रोहन के सीने से दबकर एक मीठी पीड़ा दे रहे थे। पसीने की बूंदें शालू की गर्दन से नीचे बह रही थीं, जो रोहन की जीभ को और लुभा रही थीं।

रोहन ने शालू को खिड़की के पास ले जाकर खड़ा कर दिया, जहां से बाहर रात की खामोशी झांक रही थी। उसने धीरे से साड़ी का ब्लाउज खोला। हुक एक-एक करके खुले, और शालू के दो बड़े, गोल तरबूज बाहर आ गए – गोरे, चमकते हुए, ऊपर मटर सख्त और गुलाबी। रोहन ने एक तरबूज को हाथ में लिया, हल्का दबाया, और मुंह में ले लिया। जीभ से मटर को घुमाया, चूसा। शालू ने लंबी कराह के साथ कहा, “रोहन… आह… धीरे… इतनी जोर से मत…” लेकिन उसकी उंगलियाँ रोहन के बालों में फंस गईं, और वो खुद ही उसका सिर और गहराई से दबा रही थी। रोहन ने दूसरे तरबूज को भी सहलाया, चूमा, चूसा। शालू की गर्दन पीछे झुक गई, आँखें बंद, मुँह से लगातार छोटी-छोटी आहें निकल रही थीं।

रोहन ने शालू की साड़ी का पेटीकोट खोल दिया। शालू अब सिर्फ पतली पैंटी में थीं। रोहन ने पैंटी को धीरे से नीचे सरकाया, और शालू की खाई नंगी हो गई – हल्के बालों से घिरी, गुलाबी, पूरी तरह भीगी हुई, जैसे बारिश के बाद का फूल। रोहन ने घुटनों के बल बैठकर जांघों को चूमा, ऊपर बढ़ा, और जीभ से खाई को छुआ। शालू का शरीर झटके से काँप उठा। “रोहन… ओह… ये… ऐसा मत करो… मैं… मैं सह नहीं पाऊँगी…” लेकिन उन्होंने खुद जांघें और फैला दीं। रोहन ने खाई चाटना शुरू किया – बहुत धीरे, गहराई से, जीभ हर कोने को छूती हुई, मटर को चूसती हुई। शालू की कराहें अब कमरे में गूँज रही थीं। उनका पिछवाड़ा खिड़की की दीवार से रगड़ खा रहा था, पसीना बह रहा था। बाहर रात की हवा खिड़की से आ रही थी, लेकिन अंदर की गर्मी उसे भी गर्म कर रही थी।

कुछ देर बाद शालू ने रोहन को ऊपर खींच लिया। अब उनकी बारी थी। उन्होंने रोहन की शर्ट उतारी, पैंट खोली। खीरा बाहर निकला – सख्त, लंबा, नसों से भरा, सिर पर चमकदार बूँद। शालू की आँखें फैल गईं। “रोहन… इतना… इतना मजबूत…” उन्होंने हाथ से पकड़ा, सहलाया, फिर मुंह में लिया। पहले सिर चाटा, फिर गहरा। रोहन कराहा, “भाभी… तुम्हारा मुंह… कितना गर्म… कितना नरम…” शालू ने और गहरा लिया, चूसती रहीं, जीभ घुमाती रहीं। रोहन का शरीर तन गया।

रोहन ने शालू को बिस्तर पर ले जाया। जांघें फैलाईं, खीरा खाई के मुंह पर रखा। “भाभी… तैयार हो?” शालू ने फुसफुसाया, “हाँ… लेकिन धीरे… बहुत अकेली रही हूँ…” रोहन ने धीरे दबाया। खीरा घुसा – इंच-दर-इंच। शालू ने कराहा, “आह… पूरा… हाँ… ऐसे…” रोहन धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा। तरबूज हिल रहे थे। रोहन ने एक तरबूज चूसा, खुदाई जारी रखी। शालू बोलीं, “और गहरा… रोहन… तेज… खोदो मुझे… पूरी तरह…”

पोजीशन बदली। शालू घुटनों पर, पिछवाड़ा ऊपर। रोहन ने पीछे से डाला, गहरा, तेज। शालू का पिछवाड़ा हिल रहा था। रोहन ने बाल पकड़े। “भाभी… तुम्हारी खाई… कितनी तंग… कितनी गर्म…” शालू चीखीं, “तेज… मैं रस छूटने वाली हूँ…” शरीर काँपा, रस निकला। रोहन नहीं रुका। फिर सामने से।

दूसरी बार रस निकला तो रोहन भी किनारे पर। तेज खोदा। शालू ने जकड़ा, “अंदर… सब अंदर…” रोहन का रस छूटा, गर्म, भरपूर। दोनों कराहे, पसीने से तर।

रात भर जुड़े रहे। कभी सामने, कभी पिछवाड़े से, कभी शालू ऊपर। हर बार धीरे शुरू, फिर तेज। शालू फुसफुसाईं, “तुम्हारा खीरा… मुझे फिर से जीने का एहसास देता है…” रोहन बोला, “और तुम्हारी खाई… मेरी रातों की खिड़की है भाभी…” घंटों खोए रहे।

सुबह से पहले एक बार और। पिछवाड़े से, धीरे। शालू की कराह, “धीरे… लेकिन मत रुकना…” रोहन ने पूरा किया। तीसरा रस निकला। थककर लेटे।

सुबह शालू रोहन के सीने पर सिर रखे सोई थीं। आँखें खोलीं, मुस्कुराईं। “रोहन… ये हमारा राज़ रहेगा। लेकिन… जब भी रात सूनी लगे… खिड़की पर आ जाना।” रोहन ने चुंबन किया। “भाभी… अब हर रात मेरी खिड़की तुम्हारी तरफ खुलेगी।” बाहर सुबह की पहली किरण आई, लेकिन उनके अंदर की रात अभी भी गहरी और गर्म थी।

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