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कविता की तीखी चु@@ई

कविता की तीखी चु@@ई—>उस दोपहर की खामोशी में एक अजीब सी गर्माहट थी। समीर अपने ससुराल आया हुआ था और घर के बाकी सब लोग किसी पास के रिश्तेदार की शादी में गए हुए थे। समीर की साली कविता, जिसकी उम्र लगभग चौबीस साल थी, घर पर ही रुकी हुई थी क्योंकि उसे कॉलेज का कुछ जरूरी असाइनमेंट पूरा करना था। समीर अपनी सांवली और सुडौल साली को हमेशा से ही छुप-छुपकर देखता रहता था। कविता का शरीर किसी तराशे हुए पत्थर की तरह था। उसकी कमर पतली थी, लेकिन उसके ऊपर लदे दो भारी और गोल तरबूज किसी का भी मन भटकाने के लिए काफी थे। जब भी वह चलती, उसके तरबूज एक लय में ऊपर-नीचे होते थे, जिसे देखकर समीर के मन में हलचल मच जाती थी। उस दिन कविता ने एक पतली और पारभासी साड़ी पहनी हुई थी, जिसमें से उसकी गोरी कमर और गहरा पिछवाड़ा साफ झलक रहा था। समीर उसे हॉल में सोफे पर बैठे हुए देख रहा था, जहाँ वह अपनी फाइलों में डूबी हुई थी। समीर के शरीर में एक अजीब सी बेचैनी होने लगी थी, उसके पाजामे के अंदर उसका खीरा अंगड़ाइयां लेने लगा था।

समीर धीरे से उठकर कविता के पास गया और उसके बगल में सोफे पर बैठ गया। कविता ने उसे देखा और एक प्यारी सी मुस्कान दी। “जीजू, आप सोए नहीं? दोपहर की नींद तो आपको बहुत पसंद है,” कविता ने अपनी मधुर आवाज में कहा। उसकी आवाज में एक ऐसी कशिश थी जो सीधे समीर के दिल को छू गई। समीर ने उसे करीब से देखा, उसकी साड़ी का पल्लू थोड़ा नीचे खिसका हुआ था जिससे उसके भारी तरबूजों का ऊपरी हिस्सा और उनके बीच की गहरी घाटी साफ दिखाई दे रही थी। समीर ने अपनी नजरें चुराने की कोशिश की लेकिन उसका मन तो वहीं अटका हुआ था। उसने गहरी सांस ली और कहा, “नींद नहीं आ रही थी कविता, बस तुम्हारा काम देख रहा था कि तुम कितनी मेहनत कर रही हो।” कविता हंसी और उसके हंसते ही उसके तरबूज किसी रसभरे फल की तरह हिलने लगे। समीर की धड़कनें तेज हो गई थीं। उसे कविता के शरीर से आने वाली हल्की सी इत्र और पसीने की मिली-जुली खुशबू मदहोश कर रही थी।

बातों-बातों में समीर ने अपना हाथ धीरे से कविता के कंधे पर रख दिया। कविता एक पल के लिए रुकी, उसने समीर की आँखों में देखा। उन आँखों में सिर्फ प्यार नहीं, बल्कि एक गहरी प्यास थी। समीर ने अपना हाथ थोड़ा नीचे फिसलाया और उसकी रेशमी पीठ को सहलाने लगा। कविता के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसने अपनी फाइलें एक तरफ रख दीं। “जीजू… ये आप क्या कर रहे हैं?” उसने धीमी आवाज में पूछा, जिसमें विरोध से ज्यादा समर्पण का भाव था। समीर ने उसे और करीब खींच लिया। “तुम्हें पता है कविता, तुम कितनी खूबसूरत हो? जब से यहाँ आया हूँ, बस तुम्हें ही देख रहा हूँ।” समीर ने अपनी उंगलियों से उसके चेहरे के बालों को हटाया। उसके चेहरे पर शर्म की लाली छा गई थी। उसने अपनी नजरें झुका लीं, लेकिन समीर ने उसकी ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया और उसके गुलाबी होंठों को अपनी नजरों से चूमने लगा।

समीर की साँसें अब भारी होने लगी थीं। उसने कविता के गुलाबी होंठों पर अपने होंठ रख दिए। यह कोई साधारण चुंबन नहीं था, बल्कि बरसों की दबी हुई इच्छा का विस्फोट था। कविता ने पहले तो थोड़ा झिझक दिखाया, लेकिन फिर उसने भी समीर की गर्दन में अपनी बाहें डाल दीं और उसके चुंबन का जवाब देने लगी। दोनों एक-दूसरे के होंठों का रस पीने लगे। समीर का हाथ अब उसकी साड़ी के अंदर जा चुका था और वह उसके एक भारी तरबूज को अपनी हथेलियों में भरकर दबाने लगा। कविता के मुँह से एक हल्की सी कराह निकली, “आह… जीजू… धीरे।” समीर ने उसके तरबूज के ऊपर के मटर जैसी कठोर हो चुकी घुंडी को अपनी उंगलियों से सहलाया। वह मटर अब पूरी तरह से खड़ी हो चुकी थी, जो इस बात का सबूत थी कि कविता भी उतनी ही उत्तेजित है।

समीर ने उसे गोद में उठा लिया और बेडरूम की तरफ ले गया। बेड पर लिटाते ही उसने कविता की साड़ी के पल्लू को पूरी तरह से हटा दिया। अब उसके सामने कविता का आधा नग्न शरीर था। उसकी चोली के अंदर कैद वे बड़े-बड़े तरबूज बाहर आने के लिए बेताब दिख रहे थे। समीर ने जल्दी से उसकी चोली के हुक खोले और जैसे ही चोली ढीली हुई, वे विशाल तरबूज उछलकर बाहर आ गए। समीर उन्हें देखकर दंग रह गया। वे इतने सफेद और चिकने थे कि उन पर हाथ रखते ही फिसल रहे थे। समीर ने अपना मुँह एक तरबूज पर जमा दिया और उसके मटर को चूसने लगा। कविता ने अपनी पीठ धनुष की तरह ऊपर उठा ली और समीर के बालों को मजबूती से पकड़ लिया। “ओह जीजू… आप तो जान ही निकाल देंगे… कितना सुख दे रहे हो आप,” वह सिसकियाँ लेते हुए बोली।

समीर का खीरा अब पूरी तरह से सख्त होकर पाजामे को फाड़ देने पर तुला था। उसने अपने कपड़े उतारे और कविता के सामने पूरी तरह नग्न खड़ा हो गया। कविता ने जब समीर का वह लंबा और मोटा खीरा देखा, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गई। उसने कभी नहीं सोचा था कि जीजू का खीरा इतना विशाल होगा। समीर ने उसके हाथों को अपने खीरे पर रखा। कविता ने डरते-डरते उसे छुआ और सहलाने लगी। “ये तो बहुत बड़ा है जीजू… मेरी खाई में कैसे जाएगा?” उसने घबराते हुए पूछा। समीर मुस्कुराया और उसके माथे को चूमा। “सब ठीक हो जाएगा छोटी, बस मुझ पर भरोसा रखो।” उसने कविता के पैरों को फैलाया और उसकी रेशमी खाई की तरफ बढ़ा। वहाँ घने काले बाल थे, जो उस खाई की रखवाली कर रहे थे। समीर ने अपनी उंगलियों से उन बालों को सहलाया और धीरे से अपनी एक उंगली उसकी गीली खाई के अंदर डाल दी।

कविता जोर से उछल पड़ी। उसकी खाई पहले से ही शहद की तरह चिपचिपे रस से लबालब थी। समीर ने अपनी उंगली से अंदर-बाहर करना शुरू किया, जिससे एक छप-छप की आवाज आने लगी। “आह… जीजू… वहाँ बहुत खुजली हो रही है… और तेज करिए,” कविता अब पूरी तरह से कामुकता के वश में थी। समीर ने अपनी उंगलियों की रफ्तार बढ़ा दी और साथ ही साथ उसके तरबूजों को भी अपने मुँह से सहलाता रहा। कुछ ही देर में कविता का शरीर कांपने लगा और उसकी खाई से ढेर सारा रस निकलने लगा। वह थककर समीर की बाहों में गिर गई। लेकिन समीर का खीरा अभी भी अपनी बारी का इंतजार कर रहा था। उसने कविता को सीधा लेटने को कहा और उसके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया।

समीर ने अपने खीरे की नोक को कविता की गीली और गुलाबी खाई के मुहाने पर टिकाया। उसने धीरे से धक्का दिया। जैसे ही खीरे का अगला हिस्सा अंदर गया, कविता की चीख निकल गई। “उफ़… जीजू… मर गई… बहुत चौड़ा है आपका खीरा!” समीर वहीं रुक गया और उसे चूमने लगा ताकि उसका ध्यान भटक सके। उसने धीरे-धीरे और दबाव बनाया। आधा खीरा अब खाई की गहराइयों में समा चुका था। कविता की खाई इतनी तंग थी कि समीर को लग रहा था जैसे कोई गर्म मखमल उसे चारों तरफ से जकड़ रहा हो। उसने एक जोरदार धक्का और दिया और पूरा का पूरा खीरा जड़ तक कविता की खाई में समा गया। कविता की आँखों से आँसू छलक आए, लेकिन उसमें दर्द के साथ-साथ एक अद्भुत आनंद भी था।

समीर ने अब खुदाई की प्रक्रिया शुरू की। वह धीरे-धीरे बाहर आता और फिर पूरी ताकत से अंदर जाता। हर धक्के के साथ कविता के तरबूज जोर-जोर से हिलते और आपस में टकराते। कमरे में सिर्फ उनके जिस्मों के टकराने की और सिसकियों की आवाजें गूँज रही थीं। “जीजू… हाँ… ऐसे ही… मुझे खोदते रहो… बहुत मजा आ रहा है,” कविता ने चिल्लाते हुए कहा। समीर की खुदाई अब तेज हो चुकी थी। वह पूरी लय में था। उसने कविता को उल्टा कर दिया और अब पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। इस पोजीशन में उसका खीरा और भी गहराई तक जा रहा था। समीर ने उसके पिछवाड़े के दोनों गोलों को पकड़कर जोर-जोर से झटके दिए। कविता बेड की चादर को दांतों से दबाए हुए सिर्फ कराह रही थी।

खुदाई अपनी चरम सीमा पर थी। समीर का पसीना टपककर कविता की पीठ पर गिर रहा था। समीर को महसूस हुआ कि अब उसका रस निकलने वाला है। उसने रफ्तार और बढ़ा दी। कविता भी अपने रस छोड़ने के करीब थी। वह जोर-जोर से अपनी कमर हिला रही थी ताकि समीर का खीरा उसकी खाई के हर कोने को छू सके। अचानक कविता का पूरा शरीर अकड़ गया और उसकी खाई ने समीर के खीरे को मजबूती से भींच लिया। उसका रस फव्वारे की तरह बाहर निकल आया। उसी पल समीर ने भी अपना सारा गर्म रस कविता की खाई की गहराइयों में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर निढाल होकर गिर पड़े।

काफी देर तक दोनों वैसे ही लेटे रहे, उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। समीर ने कविता को अपनी बाहों में समेटा और उसके माथे पर एक प्यार भरा चुंबन दिया। कविता ने अपनी आँखें खोलीं और समीर को देखा, उसकी आँखों में अब कोई शर्म नहीं थी, बल्कि एक गहरा संतोष था। “जीजू, आपने आज मुझे वो सुख दिया जो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था,” उसने समीर के सीने पर अपना सिर रखते हुए कहा। समीर ने उसके बालों को सहलाया और मुस्कुराया। बाहर सूरज ढल रहा था, लेकिन उन दोनों के बीच एक नए और अटूट रिश्ते की शुरुआत हो चुकी थी, जो सिर्फ जिस्मानी नहीं बल्कि जज्बाती भी था।

बेडरूम के उस शांत माहौल में अब सिर्फ उनकी धड़कनों की आवाज थी। समीर ने महसूस किया कि यह सिर्फ एक बार की घटना नहीं थी, बल्कि यह उनके बीच के उस अनकहे प्यार की जीत थी जिसे वे अब तक छिपाते आए थे। कविता ने धीरे से अपना हाथ समीर के खीरे पर फेरा जो अब शांत हो चुका था। उसने मुस्कुराकर समीर की ओर देखा और कहा, “अब जब भी घर खाली होगा, मुझे आपकी इस खुदाई की जरूरत पड़ेगी।” समीर ने उसे और कसकर भींच लिया। वे दोनों जानते थे कि यह राज उनके दिलों में ही दफन रहेगा, लेकिन इसकी मिठास उनके जीवन को हमेशा महकाती रहेगी।

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