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अजनबी कविता संग चु@@ई

अजनबी कविता संग चु@@ई—>उस रात की ट्रेन की यात्रा मेरे जीवन की सबसे यादगार रातों में से एक थी। रात के करीब दस बज रहे थे जब मैं अपनी सीट ढूँढता हुआ कोच के अंदर दाखिल हुआ। जैसे ही मैं अपनी बर्थ के पास पहुँचा, मेरी नज़र नीचे वाली बर्थ पर बैठी एक बेहद खूबसूरत और कामुक महिला पर पड़ी। उसने गहरे नीले रंग का पटियाला सूट पहन रखा था, जो उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को बड़ी ही खूबसूरती से बयां कर रहा था। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो किसी भी मर्द का दिल धड़काने के लिए काफी थी। उसका नाम कविता था, जैसा कि मैंने बाद में बातचीत के दौरान जाना।

कविता की शारीरिक बनावट किसी भी कवि की कल्पना को साकार करने जैसी थी। उसके शरीर का हर अंग जैसे सांचे में ढला हुआ था। जब वह अपनी सीट पर बैठती, तो उसके रेशमी सूट के नीचे दबे हुए उसके दो बड़े और रसीले तरबूज साफ झलकते थे। जैसे-जैसे वह सांस लेती, वे तरबूज ऊपर-नीचे होते और उनकी गहराई देखने वाले को मदहोश कर देती। उसके तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर के दाने जैसे उभार उसके सूट के कपड़े को चीरकर बाहर आने को बेताब लग रहे थे। उसका पिछवाड़ा काफी चौड़ा और मांसल था, जो बर्थ पर बैठते समय पूरी जगह घेर लेता था। उसकी कमर पतली थी, लेकिन उसके कूल्हों का घेरा उसे एक बेहद आकर्षक और भरा-पूरा रूप दे रहा था।

हम दोनों के बीच बातचीत की शुरुआत बहुत ही औपचारिक तरीके से हुई थी। मैंने अपना सामान बर्थ के नीचे रखा और उससे पूछा कि क्या वह भी दिल्ली जा रही है। उसने अपनी मखमली आवाज़ में हाँ कहा और मुस्कुरा दी। उसकी उस एक मुस्कुराहट ने मेरे दिल में हलचल मचा दी। हम करीब एक घंटे तक बातें करते रहे, और इस दौरान मुझे महसूस हुआ कि वह भी उतनी ही अकेली और प्यासी महसूस कर रही थी जितना कि मैं। हमारे बीच एक अनजाना सा खिंचाव पैदा हो रहा था। ट्रेन की धीमी आवाज़ और खिड़की से आती ठंडी हवा ने माहौल को और भी रूमानी बना दिया था। हमारी आँखों का मिलना अब सिर्फ इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक गहरी इच्छा का संकेत बन चुका था।

जैसे-जैसे रात गहराती गई, कोच की लाइटें बंद कर दी गईं। अब सिर्फ नीली नाइट लाइट जल रही थी, जिसमें कविता का गोरा बदन और भी ज्यादा चमक रहा था। हम दोनों आमने-सामने बैठे थे, और हमारे घुटने कभी-कभी आपस में टकरा जाते थे। उस स्पर्श में एक बिजली सी दौड़ जाती थी। मैंने देखा कि कविता भी अब झिझक नहीं रही थी, बल्कि वह जानबूझकर अपना पैर मेरे पैर के करीब ला रही थी। उसकी सांसें अब तेज़ होने लगी थीं और उसके तरबूज तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहे थे। आकर्षण अब अपनी चरम सीमा पर था, और मन का संघर्ष खत्म हो चुका था।

मैंने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसके घुटने पर रखा। कविता ने आँखें बंद कर लीं और एक गहरी आह भरी। मेरा हाथ धीरे-धीरे उसके सूट के ऊपर से ही उसकी जांघों की ओर बढ़ने लगा। वह कांप रही थी, लेकिन उसने मुझे रोका नहीं। जब मेरा हाथ उसके सूट के गले से अंदर गया, तो मुझे उसके गर्म और मुलायम तरबूज महसूस हुए। वे इतने कोमल थे कि मेरा मन किया कि मैं उन्हें बस दबाता ही रहूँ। मैंने उसके तरबूज के ऊपर उभरे हुए मटर को अपनी उंगलियों के बीच लेकर सहलाना शुरू किया। कविता के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली सिसकी निकली और उसने मेरा हाथ और जोर से अपने तरबूजों पर भींच लिया।

अब कंट्रोल करना मुश्किल था। मैंने उसे अपने करीब खींचा और उसके होंठों का रस चखने लगा। हमारा मिलन इतना गहरा था कि हमें आस-पास की दुनिया का कोई होश नहीं रहा। मैंने धीरे से उसके सूट के बटन खोले और उसके दोनों विशाल तरबूज आज़ाद कर दिए। वे चाँदनी में चमक रहे थे। मैंने झुककर उसके मटर को अपने मुँह में लिया और चूसने लगा। कविता की कराहें अब तेज़ हो गई थीं। मेरा हाथ नीचे गया और उसकी सलवार के अंदर दाखिल हुआ। वहां घने बालों के बीच उसकी गहरी और गीली खाई मेरा इंतज़ार कर रही थी। जब मैंने अपनी उंगली से उसकी खाई को खोदना शुरू किया, तो वह पूरी तरह से कामुकता के सागर में डूब गई।

कविता ने अब अपनी उंगलियों से मेरी पैंट की चैन खोली और मेरा सख्त और लंबा खीरा बाहर निकाला। उसने मेरे खीरे को अपने कोमल हाथों में लिया और उसे सहलाने लगी। उसका स्पर्श इतना कामुक था कि मेरा पूरा शरीर कांप उठा। उसने नीचे झुककर मेरे खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे धीरे-धीरे चूसने लगी। खीरे के ऊपर उसकी जीभ का स्पर्श मुझे जन्नत का अहसास करा रहा था। वह मेरे खीरे को बड़ी बारीकी से चाट रही थी और उसे अपने गले तक उतार रही थी। मेरी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा था और मैं बस उसके इस प्यार में डूबा रहना चाहता था।

अब वक्त आ गया था असल खुदाई का। मैंने कविता को बर्थ पर लिटाया और उसकी जांघें चौड़ी कर दीं। उसकी खाई अब रस से पूरी तरह सराबोर थी। मैंने अपने खीरे की नोक को उसकी खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से धक्का दिया। कविता ने कसकर मुझे पकड़ लिया और उसके मुँह से एक लंबी आह निकली। जैसे-जैसे मेरा खीरा उसकी तंग और गर्म खाई के अंदर जा रहा था, मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी दिव्य सुख की ओर बढ़ रहा हूँ। मैंने सामने से खुदाई करना शुरू किया। हमारे शरीर एक-दूसरे से पूरी तरह चिपक गए थे और पसीने से तरबतर हो चुके थे। हर धक्के के साथ कविता का पिछवाड़ा बर्थ से ऊपर उठ जाता था।

खुदाई की प्रक्रिया अब तेज़ हो चुकी थी। कविता चिल्ला रही थी, ‘हाँ, समीर… और तेज़… मुझे और खोदो!’ मैंने उसे पलट दिया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। उसका मांसल पिछवाड़ा हर धक्के के साथ हिल रहा था, जो देखने में बेहद उत्तेजक लग रहा था। मेरा खीरा उसकी खाई की गहराई को नाप रहा था। कमरे में सिर्फ हमारे शरीरों के टकराने की आवाज़ और हमारी सिसकियाँ गूँज रही थीं। हम दोनों ही अब चरम सीमा के करीब थे। कविता की खाई अब इतनी कस गई थी कि मुझे महसूस हो रहा था कि मेरा रस अब कभी भी छूट सकता है।

अंत में, जब हमारी उत्तेजना सातवें आसमान पर थी, कविता ने मुझे कसकर जकड़ लिया। उसकी खाई के अंदर की मांसपेशियां बुरी तरह से फड़क रही थीं। उसने चिल्लाते हुए अपना सारा रस छोड़ दिया। उसी समय, मेरा खीरा भी उसके अंदर गर्म रस की धारा छोड़ने लगा। हम दोनों एक-दूसरे में सिमटे हुए कई मिनटों तक वैसे ही पड़े रहे। हम दोनों की हालत पस्त थी, शरीर पसीने से भीगा हुआ था और साँसें फूल रही थीं। उस खुदाई के बाद जो सुकून हमें मिला, वह बयान करना मुश्किल था। कविता मेरी बाहों में सो गई और मैंने महसूस किया कि यह अजनबी मुलाकात अब एक गहरा रिश्ता बन चुकी थी। अगली सुबह जब हम स्टेशन पर उतरे, तो हमारी आँखों में एक-दूसरे के लिए वही राज छुपा था, जो उस रात की खुदाई ने हमें दिया था।

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