समीर के घर में सन्नाटा पसरा हुआ था क्योंकि उसके पिता एक हफ्ते के लिए शहर से बाहर किसी बिजनेस ट्रिप पर गए थे। घर में सिर्फ समीर और उसकी जवान सोतेली माँ कविता ही थे। कविता की उम्र अभी मुश्किल से पैंतीस साल की रही होगी, और उसका शरीर किसी ढलती हुई शाम की तरह नहीं बल्कि दोपहर की तीखी धूप की तरह तपा देने वाला था। समीर जब भी कविता को देखता, उसे अपनी भावनाओं पर काबू पाना मुश्किल हो जाता था। उस दिन शाम को जब समीर अपने कमरे से बाहर निकला, तो उसने देखा कि कविता सोफे पर अधलेटी हुई थी और उसकी साड़ी का पल्लू कंधे से सरक कर नीचे गिर गया था।
कविता के शरीर की बनावट बहुत ही आकर्षक और मांसल थी। उसकी साड़ी के नीचे से उभरते हुए उसके बड़े-बड़े तरबूज साफ़ दिखाई दे रहे थे, जो हर आती-जाती सांस के साथ धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रहे थे। समीर की नजरें उन तरबूजों के बीच की उस गहरी घाटी पर टिक गई थीं, जहाँ पसीने की एक बूंद धीरे-धीरे सरकती हुई नीचे जा रही थी। उन तरबूजों के ऊपर साड़ी के पतले कपड़े के आर-पार उन मटर के दानों जैसे उभारों की परछाईं भी समीर को पागल कर रही थी। उसका पिछवाड़ा इतना भारी और सुडौल था कि जब वह चलती थी, तो समीर की धड़कनें तेज हो जाती थीं। आज वह साड़ी में किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी और समीर का मन उस बदन को छूने के लिए मचल उठा था।
समीर धीरे से कविता के पास जाकर बैठ गया, जिससे कविता की नींद कच्ची हो गई और उसने अपनी नशीली आँखें खोलीं। समीर ने महसूस किया कि वातावरण में एक अजीब सी गर्मी बढ़ गई थी। कविता ने अपनी साड़ी ठीक करने की कोशिश नहीं की, बल्कि उसने समीर की ओर एक गहरी नजर से देखा। समीर ने धीमी आवाज में कहा, ‘माँ, आप बहुत सुंदर लग रही हैं।’ इस बात पर कविता के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई और उसने समीर का हाथ थाम लिया। उस एक स्पर्श ने समीर के शरीर में बिजली सी दौड़ा दी। दोनों के बीच एक अनकहा सा भावनात्मक जुड़ाव और कामुकता का जन्म हो रहा था, जिसे वे दोनों ही महसूस कर रहे थे।
समीर का हाथ धीरे-धीरे कविता की मखमली बाहों पर रेंगने लगा, जिससे कविता के बदन में एक कंपकंपी सी छूट गई। समीर को अपनी धड़कनों की आवाज साफ सुनाई दे रही थी और उसे डर भी लग रहा था कि कहीं वह कुछ गलत तो नहीं कर रहा, लेकिन कविता की आँखों में छिपी प्यास ने उसे आगे बढ़ने का हौसला दिया। कविता ने अपनी गर्दन पीछे झुका दी और एक गहरी आह भरी। समीर का हाथ अब उसकी कमर के उस हिस्से पर था जहाँ साड़ी और त्वचा का मिलन हो रहा था। वहाँ की चिकनी त्वचा को छूते ही समीर का खीरा अपनी जगह पर जोर-जोर से फड़फड़ाने लगा था। वह अब खुद को और ज्यादा रोक नहीं पा रहा था।
समीर ने धीरे से अपना चेहरा कविता के चेहरे के पास लाया और उनके होंठों के बीच की दूरी कम होने लगी। कविता ने अपनी आँखें बंद कर लीं और समीर के बालों में अपनी उंगलियां फँसा दीं। जब समीर ने पहली बार उसके होंठों को अपने होंठों में लिया, तो जैसे दोनों के शरीर एक-दूसरे में समा जाने के लिए व्याकुल हो उठे। समीर की जीभ कविता के मुंह के अंदर किसी प्यासे की तरह घूमने लगी। धीरे-धीरे समीर का हाथ नीचे गया और उसने कविता के उन भारी तरबूजों को अपने हाथों में भर लिया। वह उन्हें हल्के-हल्के दबाने लगा, जिससे कविता के मुंह से एक दबी हुई कराह निकली। उन मटर जैसे उभारों को अपनी उंगलियों से सहलाते हुए समीर पूरी तरह से जोश में आ चुका था।
कविता की आहें अब तेज होने लगी थीं। उसने समीर की कमीज के बटन खोल दिए और उसके मजबूत सीने को सहलाने लगी। समीर ने अब कविता की साड़ी के पल्लू को पूरी तरह से हटा दिया और उसके उन नग्न तरबूजों को अपनी आँखों से निहारा। वे इतने सफेद और चमकदार थे कि समीर ने तुरंत अपना मुंह उन पर रख दिया और मटर को चूसने लगा। कविता का शरीर बिस्तर पर धनुष की तरह तन गया था। वह समीर के सिर को अपने तरबूजों पर और जोर से दबा रही थी। समीर ने अपनी जीभ से उसके तरबूजों के हर कोने को चाटना शुरू किया, जिससे कविता का पूरा बदन पसीने से तर-बतर हो गया था और उसकी कामुकता चरम पर पहुँचने लगी थी।
अब समीर ने अपना हाथ कविता के नीचे के हिस्से की ओर बढ़ाया और उसकी पेटीकोट के अंदर अपना हाथ डाल दिया। वहाँ का जंगल यानी कि वे कोमल बाल समीर की उंगलियों को महसूस हो रहे थे। जैसे ही समीर की उंगलियां उस गीली खाई तक पहुँचीं, कविता की एक जोर की चीख निकल गई। उसकी खाई पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहाँ से निकलने वाला रस समीर की उंगलियों को चिपचिपा बना रहा था। समीर ने अपनी उंगली से खोदना शुरू किया, जिससे कविता की सांसें उखड़ने लगीं। वह अपनी कमर को ऊपर-नीचे कर रही थी ताकि समीर की उंगलियां उसकी खाई में और गहराई तक जा सकें। समीर अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था और उसने अपना खीरा बाहर निकाल लिया।
समीर का खीरा अब पूरी तरह से तना हुआ और कठोर हो चुका था। कविता ने जैसे ही उस विशाल खीरे को देखा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। उसने समीर के खीरे को अपने हाथों में पकड़ा और उसे सहलाने लगी। फिर उसने धीरे से उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे चूसना शुरू किया। खीरा चूसते समय उसकी आँखों से समीर की ओर देखना समीर को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रहा था। कविता के मुंह की गर्मी और उसकी जीभ का स्पर्श समीर को स्वर्ग का अहसास करा रहा था। कुछ देर तक खीरा चूसने के बाद समीर ने कविता को बिस्तर पर सीधा लिटा दिया और उसकी टांगों को अपने कंधों पर रख लिया।
अब समय था असली खुदाई का। समीर ने अपने खीरे की नोक को कविता की उस गीली और तंग खाई के मुहाने पर रखा। कविता ने समीर को कसकर पकड़ लिया और कहा, ‘समीर, मुझे अपनी बना लो, आज कोई रोक-टोक नहीं।’ समीर ने एक जोरदार धक्का दिया और उसका आधा खीरा उस तंग खाई के अंदर समा गया। कविता के मुंह से एक दर्द और आनंद मिली-जुली चीख निकली। समीर ने उसे थोड़ा समय दिया ताकि वह उस खिंचाव को बर्दाश्त कर सके, और फिर उसने धीरे-धीरे अपने पूरे खीरे को उसकी खाई के अंदर उतार दिया। दोनों के शरीर आपस में टकरा रहे थे और कमरे में मांस के टकराने की ‘चप-चप’ की आवाज गूंजने लगी थी।
समीर अब सामने से खोदना शुरू कर चुका था। उसकी हर चोट कविता के दिल की धड़कन बढ़ा रही थी। कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और समीर उन्हें अपने हाथों से पकड़कर जोर-जोर से दबा रहा था। ‘उह्ह… समीर… और तेज… मुझे और गहराई तक खोदो…’ कविता चिल्ला रही थी। समीर ने अपनी गति बढ़ा दी और अब वह पूरी ताकत से खुदाई कर रहा था। उसका खीरा हर बार खाई की गहराइयों को छू रहा था, जिससे कविता का रस बार-बार निकल रहा था। कमरे का तापमान बहुत बढ़ गया था और दोनों के शरीर पसीने से भीग कर एक-दूसरे से चिपक रहे थे, जिससे घर्षण और भी ज्यादा बढ़ गया था।
थोड़ी देर बाद समीर ने कविता को पलट दिया और उसे घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब वह पिछवाड़े से खोदने की मुद्रा में आ गया था। कविता का पिछवाड़ा समीर के सामने था, जो खुदाई के लिए पूरी तरह तैयार था। समीर ने अपने खीरे को पीछे से उसकी खाई में डाला और फिर से हमला शुरू कर दिया। इस पोजीशन में समीर को और भी ज्यादा गहराई मिल रही थी। वह कविता के बालों को पकड़कर उसे अपनी ओर खींच रहा था और पीछे से जोरदार धक्के मार रहा था। कविता की चीखें अब बेकाबू हो चुकी थीं, वह बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींच रही थी। उसे ऐसा आनंद मिल रहा था जैसा उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था।
खुदाई की यह प्रक्रिया काफी लंबी चली। दोनों एक-दूसरे की खुशबू और पसीने में पूरी तरह डूब चुके थे। समीर का खीरा अब अपना अंतिम रस छोड़ने के लिए बेकरार था। उसने अपनी गति को और भी ज्यादा तेज कर दिया और कविता की खाई के अंदर ही तेजी से धक्के मारने लगा। कविता भी अपने रस छूटने के करीब थी, उसका पूरा शरीर कांपने लगा था। अचानक कविता ने एक लंबी आह भरी और उसका रस पूरी तरह से छूट गया। ठीक उसी पल समीर ने भी अपना सारा गरम रस कविता की खाई की गहराइयों में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े और जोर-जोर से सांसें लेने लगे।
खुदाई के बाद दोनों के शरीर निढाल हो चुके थे। समीर कविता के ऊपर ही लेटा हुआ था और उनके दिल की धड़कनें एक-दूसरे से बात कर रही थीं। कविता ने समीर के माथे को चूमा और उसे अपनी बाहों में कस लिया। उस कमरे में अब एक अजीब सी शांति थी, लेकिन वह शांति संतुष्टि से भरी हुई थी। समीर को अपनी सोतेली माँ के साथ इस तरह जुड़ने के बाद एक अलग ही तरह का भावनात्मक जुड़ाव महसूस हो रहा था। उनकी वह रात सिर्फ शारीरिक सुख की नहीं, बल्कि एक दबी हुई इच्छा के पूर्ण होने की कहानी बन गई थी। कविता की आँखों में अब एक सुकून था, जैसे उसे वह सब मिल गया हो जिसकी उसे बरसों से तलाश थी।