तन्हा दोपहर और सुनिता बुआ की प्यासी खाई—>
दोपहर की उस खामोश तन्हाई में सुनिता बुआ सोफे पर लेटी हुई थीं, और घर के बाकी लोग किसी शादी में गए हुए थे। राघव कमरे में दाखिल हुआ तो उसकी नजर सीधे बुआ के जिस्म पर पड़ी, जो पसीने की हल्की बूंदों से चमक रहा था। बुआ की उम्र लगभग अड़तीस साल थी, लेकिन उनके बदन की कसावट किसी जवान लड़की को मात दे सकती थी। उनकी पतली कमर के नीचे उनके भारी कूल्हे और ऊपर की तरफ उभरे हुए गोल-मटोल तरबूज उस सूती साड़ी को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे। राघव का मन डोल गया, उसकी नजरें बुआ के उन गुलाबी मटर पर टिक गईं जो ब्लाउज के पतले कपड़े के नीचे से अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे।
राघव धीरे से उनके पास गया और उनके पैरों के पास बैठ गया, उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसने हिम्मत जुटाकर बुआ के पैरों को सहलाना शुरू किया, उसकी उंगलियां उनकी मखमली त्वचा पर रेंग रही थीं। बुआ ने अपनी आंखें धीरे से खोलीं, उनके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं बल्कि एक अजीब सी कशिश और जरूरत थी। उन्होंने राघव को रोका नहीं, बल्कि अपनी टांगें थोड़ी और फैला दीं जिससे उनकी रेशमी साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसक गया और उनकी गहरी खाई का हल्का सा अहसास होने लगा। राघव की सांसें तेज हो गईं, उसने देखा कि बुआ के चेहरे पर हया और चाहत का मिला-जुला संगम था।
राघव ने अपना हाथ ऊपर की ओर बढ़ाया और बुआ के उभरे हुए तरबूज पर रख दिया। जैसे ही उसकी हथेली ने उस भारीपन को छुआ, बुआ के मुंह से एक धीमी कराह निकली। राघव ने उन तरबूजों को हल्के से दबाना शुरू किया, उनका मांस इतना मुलायम और रसीला था कि राघव को लगा वह स्वर्ग छू रहा है। बुआ ने अपनी कमर ऊपर की ओर उचकाई और राघव का हाथ अपने ब्लाउज के अंदर डाल दिया। अब राघव के हाथ सीधे उन गर्म तरबूजों और उनके सख्त हो चुके मटर पर थे। वह अपनी उंगलियों से उन मटर को सहलाने लगा, जिससे बुआ की सिसकियाँ और तेज हो गईं।
अब संयम का बांध टूट चुका था, राघव ने जल्दी से अपने कपड़े उतारे और उसका विशाल खीरा पूरी तरह से अकड़ कर सीधा खड़ा हो गया। बुआ की नजरें जब राघव के उस लोहे जैसे सख्त खीरे पर पड़ीं, तो उनकी आंखों में चमक आ गई। उन्होंने झुककर उस खीरे को अपने हाथों में लिया और उसे सहलाने लगीं। फिर धीरे-धीरे उन्होंने उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया। राघव की आंखें बंद हो गईं जब बुआ ने अपनी जीभ से उस खीरे के ऊपरी हिस्से को सहलाया और उसे गहराई तक चूसने लगीं। कमरे में सिर्फ बुआ के चूसने की और राघव की आहों की आवाजें गूँज रही थीं।
थोड़ी देर बाद राघव ने बुआ को सोफे पर सीधा लिटाया और उनकी साड़ी पूरी तरह हटा दी। बुआ की रेशमी खाई अब उसके सामने थी, जो पूरी तरह से गीली और रसीली हो चुकी थी। राघव ने अपनी उंगली से उस खाई की गहराई को नापना शुरू किया, बुआ के शरीर में एक करंट सा दौड़ गया। उन्होंने राघव के सिर को पकड़कर अपनी खाई की ओर दबाया। राघव ने अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया, उसका स्वाद इतना मादक था कि वह पागल होने लगा। बुआ बार-बार अपनी कमर ऊपर उठा रही थीं और ‘ओह राघव, मुझे और खोदो’ की गुहार लगा रही थीं।
आखिरकार, राघव ने अपने भारी खीरे को बुआ की प्यासी खाई के मुहाने पर रखा और एक ही झटके में उसे अंदर उतार दिया। बुआ के मुंह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि चरम सुख की थी। राघव ने धीरे-धीरे खुदाई शुरू की, हर धक्के के साथ उसका खीरा बुआ की खाई की गहराइयों को छू रहा था। बुआ ने अपनी टांगें राघव की कमर के चारों ओर लपेट लीं ताकि वह और गहराई तक खोद सके। कमरे की हवा में पसीने और कामुकता की खुशबू घुल गई थी, और हर धक्के के साथ ‘चप-चप’ की मदहोश करने वाली आवाजें आ रही थीं।
राघव अब अपनी पूरी ताकत से खुदाई कर रहा था, उसने बुआ को उल्टा किया और उनके पिछवाड़े की तरफ से खुदाई करने लगा। बुआ के भारी तरबूज नीचे लटक रहे थे और राघव उन्हें पीछे से पकड़कर जोर-जोर से झटके मार रहा था। बुआ की कराहें अब चीखों में बदल रही थीं, वे पूरी तरह से बेसुध होकर इस खुदाई का आनंद ले रही थीं। कुछ देर बाद राघव को महसूस हुआ कि उसका रस अब छूटने वाला है, उसने अपनी गति और बढ़ा दी। बुआ भी अपनी चरम सीमा पर थीं, उन्होंने अपनी खाई को कस लिया और जैसे ही राघव ने अंतिम धक्का मारा, दोनों का रस एक साथ निकल गया और वे एक-दूसरे की बाहों में ढह गए।
खुदाई खत्म होने के बाद कमरे में एक सुकून भरी खामोशी छा गई। बुआ का पूरा शरीर पसीने से तर-बतर था और उनकी सांसें अभी भी तेज थीं। राघव उनके बगल में लेट गया और उन्हें अपनी बाहों में भर लिया। बुआ ने अपना सिर राघव के सीने पर रखा और धीरे से मुस्कराईं। वह पल शारीरिक सुख से कहीं बढ़कर था, उसमें एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव महसूस हो रहा था। बुआ ने राघव के माथे को चूमा और कहा कि आज उनकी बरसों की प्यास शांत हुई है। दोनों उसी हाल में एक-दूसरे से लिपटे रहे, उस पल को हमेशा के लिए अपने जेहन में कैद करते हुए।