रात के गहराते सन्नाटे में राजधानी एक्सप्रेस अपनी पूरी रफ़्तार से पटरियों पर दौड़ रही थी और ट्रेन की गड़गड़ाहट के बीच केबिन में एक अजीब सी खामोशी छाई हुई थी। अर्जुन अपने सामने वाली बर्थ पर बैठी उस सुंदर महिला को देख रहा था जिसका नाम नैना था और जिससे उसकी बातचीत बस कुछ ही घंटों पहले शुरू हुई थी। नैना की उम्र करीब तीस के आसपास रही होगी लेकिन उसके चेहरे की चमक और शरीर की बनावट किसी कमसिन कली जैसी थी जो पूरी तरह खिलने को बेताब हो। जैसे-जैसे रात बढ़ रही थी उन दोनों के बीच की झिझक कम हो रही थी और एक अनकहा आकर्षण हवा में घुलने लगा था। अर्जुन ने महसूस किया कि उसकी धड़कनें नैना के हर एक हरकत के साथ तेज़ हो रही थीं।
नैना के शरीर की बनावट किसी मूर्तिकार की उत्कृष्ट कृति जैसी थी जो किसी को भी मदहोश कर देने के लिए काफी थी। उसकी साड़ी के पतले रेशम से झांकते हुए उसके गोल और उभरे हुए तरबूज अर्जुन की आँखों को अपनी ओर खींच रहे थे जो कि काफी भारी और रसीले लग रहे थे। जब वो गहरी सांस लेती तो उन तरबूज के ऊपर चढ़े हुए ब्लाउज की तनी हुई डोरियां उसके शरीर के उभारों का गवाह देती थीं और बीच में उन तरबूज के ऊपर मटर जैसे सख्त दाने साफ़ झलक रहे थे। उसकी कमर के नीचे का हिस्सा काफी चौड़ा था और उसका पिछवाड़ा किसी संगमरमर की मूर्ति की तरह सुडौल था जिसे साड़ी ने कसकर पकड़ रखा था।
बातों-बातों में जब अर्जुन ने नैना की आँखों में देखा तो उसे वहां एक अजीब सी प्यास नज़र आई जो शायद सालों से दबी हुई थी। नैना ने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा और खिसकाया जिससे उसके तरबूज का ऊपरी हिस्सा और भी साफ़ दिखने लगा और अर्जुन के मन में एक हलचल सी मच गई। उन दोनों के बीच एक भावनात्मक जुड़ाव सा बनने लगा था क्योंकि नैना ने अपने अकेलेपन और अपनी अधूरी इच्छाओं के बारे में धीरे-धीरे बताना शुरू कर दिया था। ट्रेन के झटकों के साथ जब नैना का शरीर हिलता था तो अर्जुन की नज़रें उसके उन मटर जैसे दानों पर टिक जाती थीं जो अब और भी ज्यादा सख्त हो चुके थे।
अचानक ट्रेन ने एक तेज़ मोड़ लिया और नैना लड़खड़ाकर अर्जुन की ओर झुक गई जिससे अर्जुन का हाथ अनजाने में उसके एक तरबूज को छू गया। वो छुअन इतनी बिजली जैसी थी कि अर्जुन के पजामे के अंदर उसका खीरा अंगड़ाई लेने लगा और अपनी पूरी लम्बाई के साथ खड़ा हो गया। नैना ने तुरंत खुद को संभाला नहीं बल्कि वो अर्जुन की आँखों में देखती रही और उसने अर्जुन का हाथ हटाया नहीं बल्कि उसे और मजबूती से अपने तरबूज पर दबा लिया। अर्जुन को महसूस हुआ कि वो तरबूज कितने मुलायम और गर्म थे और उन पर मौजूद मटर अब पूरी तरह से खड़े होकर अर्जुन की हथेलियों को गुदगुदा रहे थे।
अर्जुन की हिम्मत बढ़ गई और उसने धीरे से अपना दूसरा हाथ नैना की जाँघों पर रखा और उसे धीरे-धीरे ऊपर की ओर सरकाने लगा जहाँ उसकी रेशमी खाई छिपी हुई थी। नैना की साँसें तेज़ हो गईं और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं जैसे वो इस पल का बरसों से इंतज़ार कर रही हो। अर्जुन का हाथ अब नैना की जाँघों के बीच पहुँच चुका था जहाँ उसे घने बालों के बीच छिपी हुई उस गीली और गर्म खाई का अहसास हुआ जो अब पूरी तरह से रस छोड़ने को तैयार थी। अर्जुन ने अपनी उंगली से खोदना शुरू किया तो नैना के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकली जिसने पूरे केबिन के तापमान को बढ़ा दिया।
नैना ने अब अर्जुन के पजामे की तनी खोल दी और उसके विशाल और सख्त खीरे को बाहर निकाल लिया जो अब प्यास से तड़प रहा था। उसने बिना किसी झिझक के उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे इतनी शिद्दत से चूसना शुरू किया कि अर्जुन की आँखों के सामने सितारे नाचने लगे। खीरा चूसने की आवाज़ें और नैना के मुँह की गर्माहट अर्जुन को पागल कर रही थी और वो नैना के बालों को पकड़कर उसे और अंदर तक धकेलने लगा। कुछ देर बाद नैना रुकी और उसने अपनी साड़ी उतार फेंकी जिससे उसके शरीर का हर एक अंग अब अर्जुन की नज़रों के सामने बिल्कुल नग्न था।
अर्जुन ने नैना को बर्थ पर लिटाया और उसकी गहरी खाई को अपनी जुबान से चाटना शुरू कर दिया जिसे देखकर नैना तड़पने लगी। खाई चाटने के दौरान जब अर्जुन की जीभ उस खाई के अंदरूनी हिस्सों को छूती तो नैना अपना पिछवाड़ा हवा में उठा देती और अर्जुन के सिर को अपनी ओर और ज़ोर से खींचती। कुछ देर बाद अर्जुन ने अपने खीरे को नैना की खाई के द्वार पर टिकाया और धीरे से अंदर धकेलने की कोशिश की। नैना की खाई काफी तंग थी लेकिन अर्जुन के खीरे ने अपनी जगह बना ली और एक ज़ोरदार धक्के के साथ वो पूरा का पूरा उस गीली खाई के अंदर समा गया।
अब खुदाई की प्रक्रिया पूरी रफ़्तार से शुरू हो चुकी थी और केबिन में सिर्फ उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ और नैना की मदहोश कर देने वाली सिसकियां गूँज रही थीं। अर्जुन सामने से खोदना जारी रखे हुए था और हर धक्के के साथ उसका खीरा नैना की खाई की गहराई को नाप रहा था। नैना ने अपने दोनों पैर अर्जुन के कंधों पर रख दिए जिससे खुदाई और भी गहरी होने लगी और उसके तरबूज अर्जुन के सीने से टकराकर ऊपर-नीचे उछल रहे थे। अर्जुन ने बीच-बीच में उसे घुमाया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया जिससे नैना का पूरा बदन थरथराने लगा और वो पागलों की तरह अर्जुन का नाम पुकारने लगी।
खुदाई अपने चरम पर पहुँच चुकी थी और दोनों का पसीना एक-दूसरे के शरीर में मिल रहा था। अर्जुन ने अपनी रफ़्तार और बढ़ा दी और नैना की खाई अब पूरी तरह से रस से लथपथ हो चुकी थी जो कि अर्जुन के खीरे के साथ बाहर निकल रहा था। अचानक नैना ने अर्जुन को कसकर जकड़ लिया और उसका शरीर धनुष की तरह तन गया क्योंकि उसकी खाई से रस निकलना शुरू हो गया था। ठीक उसी पल अर्जुन ने भी एक आखरी गहरा धक्का मारा और उसके खीरे ने भी अपना सारा गर्म रस नैना की खाई के सबसे गहरे कोने में छोड़ दिया जिससे दोनों को एक असीम सुख की प्राप्ति हुई।
सब कुछ शांत होने के बाद वे दोनों एक-दूसरे की बाहों में सिमटे हुए लेटे थे और ट्रेन अब भी अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही थी। नैना का सिर अर्जुन के सीने पर था और वो धीरे-धीरे अर्जुन के खीरे को सहला रही थी जो अब शांत हो चुका था। उस रात की उस अनजानी खुदाई ने उनके बीच एक ऐसा रिश्ता बना दिया था जिसे शब्द नहीं दिए जा सकते थे। अर्जुन ने नैना के माथे को चूमा और महसूस किया कि ये सिर्फ शारीरिक मिलन नहीं बल्कि दो अकेली रूहों का एक-दूसरे में समा जाना था जिसकी यादें उम्र भर उनके दिलों में ताज़ा रहने वाली थीं।
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