Join WhatsApp Click Here
Join Telegram Click Here

जवान भाभी की चु@@ई

जवान भाभी की चु@@ई—>समीर शहर से अपनी पढ़ाई पूरी करके छुट्टियों में अपने बड़े भाई के घर वापस आया था। उसके भाई सुमित एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे और अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहते थे। घर पर उसकी खूबसूरत भाभी, कविता, अकेली रहती थी। कविता की उम्र अभी मुश्किल से तीस साल रही होगी, लेकिन उसका शरीर किसी कच्ची कली की तरह खिला हुआ था। समीर जब भी उसे देखता, उसके मन में अजीब सी हलचल होने लगती थी। वह जितना खुद को रोकने की कोशिश करता, उसकी नजरें बार-बार कविता के उभरे हुए अंगों पर ही जाकर टिक जाती थीं। कविता भी समीर की मौजूदगी का आनंद लेती थी, क्योंकि घर की खामोशी उसे अक्सर डराती थी। दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता पनप रहा था, जो शर्म और मर्यादा की सीमाओं को धीरे-धीरे धुंधला कर रहा था।

कविता का शरीर किसी तराशी हुई मूरत जैसा था, उसकी कमर पतली थी लेकिन उसके तरबूज काफी बड़े और कसरती थे जो हर आहट पर हिलते महसूस होते थे। जब वह साड़ी पहनती थी, तो उसके पिछवाड़े का घेरा साड़ी के कपड़े को फाड़ने की हद तक तना रहता था। समीर अक्सर उसे रसोई में काम करते हुए देखता, जहाँ उसके तरबूजों का उभार साड़ी के पल्लू से झांकता रहता था। उसकी गोरी पीठ और उस पर गिरते काले बाल समीर की धड़कनें बढ़ा देते थे। कविता को भी पता था कि देवर की नजरें कहाँ टिकी हैं, इसलिए वह भी कभी-कभी जानबूझकर झुककर काम करती, जिससे उसके तरबूजों के बीच की गहरी खाई साफ नजर आती थी। समीर का खीरा पैंट के अंदर ही अंगड़ाई लेने लगता था और वह चाहकर भी अपनी उत्तेजना को छिपा नहीं पाता था।

एक दोपहर जब बाहर तेज धूप थी और घर में सन्नाटा छाया हुआ था, सुमित किसी काम से बाहर गए हुए थे। समीर हॉल में सोफे पर लेटा हुआ था और कविता पास ही बैठकर सब्जी काट रही थी। समीर की नजरें बार-बार कविता के पैरों से होते हुए उसके भारी पिछवाड़े पर जा रही थीं, जो जमीन पर बैठने के कारण और भी फैल गया था। कविता ने महसूस किया कि समीर उसे देख रहा है, उसने मुस्कुराकर समीर की तरफ देखा और अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा और ढीला कर दिया। समीर की सांसें तेज हो गईं जब उसने देखा कि कविता के तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर जैसे उभार साफ दिखाई दे रहे थे। कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया था और दोनों के बीच एक कामुक सन्नाटा पसर गया था, जिसमें सिर्फ उनकी धड़कनों की आवाज सुनाई दे रही थी।

समीर धीरे से सोफे से उठा और कविता के करीब जाकर बैठ गया। उसने अपना हाथ धीरे से कविता के कंधे पर रखा, कविता कांप गई लेकिन उसने उसे हटाया नहीं। समीर ने अपनी उंगलियों से कविता की गर्दन को छुआ, जिससे उसे एक बिजली का झटका सा लगा। समीर ने फुसफुसाते हुए कहा, ‘भाभी, आप आज बहुत खूबसूरत लग रही हैं।’ कविता ने शर्माते हुए अपनी नजरें झुका लीं और धीमी आवाज में कहा, ‘समीर, यह तुम क्या कह रहे हो? हम दोनों का रिश्ता मर्यादा का है।’ लेकिन उसकी आंखों में मनाही नहीं, बल्कि एक गहरी प्यास झलक रही थी। समीर ने हिम्मत जुटाई और कविता के चेहरे को अपने हाथों में लेकर उसके होंठों का मधु रसपान करने लगा। कविता पहले तो झिझकी, लेकिन फिर उसने भी समीर की गर्दन में अपनी बाहें डाल दीं और इस मिलन में खो गई।

दोनों के बीच का आकर्षण अब बेकाबू हो चुका था। समीर ने कविता को अपनी गोद में उठा लिया और बेडरूम की तरफ ले गया। जैसे ही उसने कविता को बिस्तर पर लेटाया, उसने उसके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने शुरू कर दिए। जैसे ही ब्लाउज खुला, कविता के दो बड़े और गोल तरबूज बाहर निकल आए, जिन पर छोटे-छोटे गुलाबी मटर चमक रहे थे। समीर ने अपना मुंह एक तरबूज पर जमा दिया और उसे चूसने लगा, जबकि दूसरे को अपने हाथ से दबाने लगा। कविता सिसकियां भरने लगी और उसके मुँह से ‘आह समीर’ निकलने लगा। समीर का खीरा अब पूरी तरह से पत्थर की तरह सख्त हो चुका था और वह अपनी खाई को खोजने के लिए बेताब था। कविता ने भी समीर की पैंट खोल दी और उसके विशाल खीरे को बाहर निकाला, जिसे देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

समीर ने अब कविता की साड़ी और पेटीकोट को भी शरीर से अलग कर दिया। अब कविता पूरी तरह से कुदरती अवस्था में उसके सामने थी। उसके पैरों के बीच की खाई रेशमी बालों से ढकी हुई थी, जो समीर को अपनी ओर खींच रही थी। समीर ने अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया, जिससे कविता बिस्तर पर तड़पने लगी। उसने समीर के बालों को कसकर पकड़ लिया और अपनी कमर को ऊपर उठाने लगी। ‘ओह समीर, तुम तो मुझे पागल कर दोगे,’ वह कराहते हुए बोली। समीर ने अपनी उंगली से खाई के अंदर गहराई तक खुदाई की कोशिश की, जिससे वहाँ से चिपचिपा रस निकलने लगा। कविता पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वह अब और इंतजार नहीं कर सकती थी, उसने समीर को अपने ऊपर खींच लिया और उसे खुद में समाने का इशारा किया।

समीर ने अपने खीरे को कविता की खाई के मुहाने पर रखा और एक जोरदार धक्का दिया। खीरा आधा अंदर चला गया, जिससे कविता के मुँह से एक चीख निकल गई, ‘उई माँ, धीरे समीर!’ समीर ने कुछ पल रुककर उसे चूमना शुरू किया ताकि वह शांत हो सके। फिर उसने धीरे-धीरे सामने से खुदाई शुरू की। हर धक्के के साथ समीर का खीरा गहराई तक जा रहा था और कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे। कमरे में केवल शरीर के टकराने की ‘चप-चप’ और उनकी सिसकियों की आवाज गूँज रही थी। समीर ने अब कविता के पैरों को अपने कंधों पर रख लिया और पूरी ताकत से खुदाई करने लगा। कविता के अंदर से रस का सैलाब उमड़ रहा था और वह समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा रही थी।

थोड़ी देर बाद समीर ने कविता को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने की स्थिति में ला दिया। कविता के भारी पिछवाड़े को देखकर समीर की उत्तेजना और बढ़ गई। उसने पीछे से अपनी खाई में खीरा उतारा और फिर से खुदाई की गति तेज कर दी। कविता बेड के सिरहाने को पकड़कर जोर-जोर से कराह रही थी, ‘हाँ समीर, ऐसे ही, और तेज… और गहरा!’ समीर का शरीर पसीने से तरबतर था, लेकिन उसकी ऊर्जा खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। उसने कविता के दोनों तरबूजों को पीछे से ही थाम लिया और उन्हें बुरी तरह मसलने लगा। हर धक्के के साथ समीर का खीरा कविता की गहराई को नाप रहा था, और जल्द ही दोनों अपने चरम आनंद के करीब पहुँचने लगे।

जैसे ही खुदाई अपनी चरम सीमा पर पहुँची, समीर ने अपनी गति और बढ़ा दी। कविता का शरीर जोर-जोर से कांपने लगा और उसने समीर को कसकर पकड़ लिया। कुछ ही पलों में समीर का रस फूटने लगा और उसने अपना सारा गर्म रस कविता की गहराई में छोड़ दिया। साथ ही कविता का भी रस निकल गया और वह बेदम होकर बिस्तर पर गिर पड़ी। दोनों एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए भारी सांसें ले रहे थे। कमरे की हवा में प्यार और कामुकता की गंध घुली हुई थी। समीर ने कविता के माथे को चूमा और वह उसके सीने पर अपना सिर रखकर सो गई। उस दिन के बाद से उनके बीच का यह गुप्त खेल अक्सर चलने लगा, जिसने उनकी बोरियत भरी जिंदगी में एक नया रोमांच भर दिया था।

Leave a Comment

You cannot copy content of this page