
रात का हसीन सफ़र और अनजानी हमसफ़र की प्यास—>ट्रेन की गड़गड़ाहट और बाहर पसरी अंधेरी रात का सन्नाटा, राहुल अपनी सीट पर बैठा खिड़की से बाहर देख रहा था। उसके ठीक सामने वाली बर्थ पर नैना बैठी थी, जिसकी उम्र करीब अट्ठाइस साल रही होगी और उसका व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक था। नैना ने एक गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी, जो उसके शरीर के कामुक उभारों को और भी ज्यादा उभार रही थी और केबिन की मद्धम पीली रोशनी उनके बीच एक अजीब सी उत्तेजना पैदा कर रही थी। राहुल बार-बार अपनी नज़रें नैना के चेहरे से हटाकर उसके जिस्म के उतार-चढ़ाव पर ले जा रहा था, जहाँ साड़ी का पल्लू बार-बार सरक कर उसके गोरे बदन की झलक दिखा रहा था।
नैना का बदन किसी तराशी हुई मूरत जैसा था, साड़ी के तंग ब्लाउज से उसके बड़े-बड़े और रसीले ‘तरबूज’ बाहर आने को बेताब लग रहे थे और राहुल की धड़कनें तेज़ हो रही थीं। जब वो लंबी सांस लेती, तो उन ‘तरबूजों’ की हलचल राहुल के दिल के तार छेड़ देती थी और ब्लाउज के पतले कपड़े के ऊपर से उसके उभरे हुए ‘मटर’ साफ़ महसूस हो रहे थे। उन दोनों गोलों के बीच की गहरी घाटी इतनी सम्मोहक थी कि राहुल का मन बार-बार वहाँ हाथ ले जाने को मचल रहा था। राहुल की नज़रें जब थोड़ी नीचे की ओर गई, तो उसने देखा कि नैना की जांघें कितनी गदरायी हुई और चिकनी थीं, जो ट्रेन के झटकों के साथ साड़ी के सरकने से धीरे-धीरे अनावृत हो रही थीं।
दोनों के बीच धीरे-धीरे बातचीत शुरू हुई और बातों-बातों में एक अनजाना सा जुड़ाव महसूस होने लगा, जैसे दोनों ही बरसों से एक-दूसरे को जानते हों। नैना ने बताया कि उसका पति उसे वक्त नहीं देता और वो अपनी ज़िंदगी में बहुत अकेली महसूस करती है, उसकी आँखों में एक अजीब सी प्यास और तड़प साफ़ झलक रही थी। राहुल ने सहानुभूति दिखाते हुए धीरे से नैना का हाथ अपने हाथ में लिया, तो उसे उसकी हथेली में पसीना और एक तेज़ कंपन महसूस हुआ जिसने माहौल को और भी गर्म कर दिया। नैना ने अपनी शरमाई हुई आँखें झुका लीं, लेकिन उसने अपना हाथ राहुल के हाथ से पीछे नहीं खींचा, बल्कि उसकी उंगलियों को अपनी उंगलियों में फंसा लिया जैसे वो इसी स्पर्श का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी।
केबिन के अंदर का तापमान जैसे अचानक बढ़ गया था और दोनों के बीच की झिझक अब धीरे-धीरे कम होने लगी थी, मन का द्वंद्व अब इच्छाओं के सामने घुटने टेक रहा था। राहुल अपनी सीट से उठकर नैना के पास जाकर बैठ गया और उसकी गर्दन पर अपनी गर्म सांसें छोड़ने लगा, जिससे नैना के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। नैना ने हल्के से विरोध का नाटक किया लेकिन फिर राहुल के कंधे पर अपना सिर टिका दिया, उसकी खुशबू राहुल को पागल कर रही थी। राहुल ने साहस जुटाकर उसके गालों को छुआ और फिर धीरे-धीरे उसके चेहरे को चूमना शुरू किया, जिससे नैना की दबी हुई आहें केबिन की शांति को भंग करने लगीं।
राहुल के हाथ अब नैना के रेशमी बदन पर घूमने लगे थे और उसने बड़ी फुर्ती से साड़ी के पल्लू को पूरी तरह से किनारे हटा दिया, जिससे उसके विशाल ‘तरबूज’ अब राहुल की नज़रों के सामने थे। राहुल ने अपने हाथों में उन गर्म और नरम ‘तरबूजों’ को भरा और उन्हें धीरे-धीरे दबाने लगा, जिससे नैना के मुँह से सिसकारी निकल पड़ी। उसने ‘तरबूजों’ के शिखर पर मौजूद उन गुलाबी ‘मटर’ को अपनी उंगलियों से सहलाया और फिर धीरे से अपने मुँह में भर लिया, जिससे नैना उत्तेजना में अपनी कमर ऊपर की ओर उठाने लगी। नैना ने राहुल के बालों को अपने हाथों में जकड़ लिया और उसे और भी ज़ोर से अपने जिस्म से चिपका लिया, मानो वो अपने अंदर की सारी आग आज इसी पल में शांत करना चाहती हो।
नैना की उत्तेजना अब चरम पर थी और उसने कांपते हाथों से राहुल की पैंट की चेन खोली, जहाँ राहुल का ‘खीरा’ अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ आज़ाद होने के लिए छटपटा रहा था। नैना ने जैसे ही उस गर्म और सख़्त ‘खीरे’ को अपने हाथों में लिया, उसकी आँखों में एक चमक सी आ गई और उसने उसे सहलाना शुरू कर दिया। राहुल ने बिना देर किए नैना की साड़ी और पेटीकोट को ऊपर की ओर खिसकाया, जहाँ उसकी रेशमी ‘खाई’ के आसपास सुनहरे ‘बाल’ मद्धम रोशनी में चमक रहे थे। राहुल ने अपनी उंगलियों को उस गीली और फिसलन भरी ‘खाई’ में डाला और धीरे-धीरे उसे कुरेदना शुरू किया, जिससे नैना का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया और वो राहुल का नाम पुकारने लगी।
अब इंतज़ार की घड़ियाँ खत्म हो चुकी थीं और राहुल ने नैना को सीट पर लेटाकर उसे ‘सामने से खोदने’ की मुद्रा में व्यवस्थित किया। उसने अपने विशाल ‘खीरे’ को नैना की तंग और गर्म ‘खाई’ के द्वार पर रखा और एक ही झटके में उसे गहराई तक उतार दिया, जिससे नैना के गले से एक लंबी और तीखी कराह निकली। राहुल ने लंबी-लंबी सांसें लेते हुए धीरे-धीरे अपनी गति बढ़ाई और उस ‘खाई’ की गहराई को नापना शुरू किया, हर धक्का नैना को सुख के सागर में ले जा रहा था। नैना ने अपनी टांगें राहुल की कमर के चारों ओर कस लीं और कहने लगी, “राहुल, मुझे और ज़ोर से खोदो, आज मेरी इस बरसों की प्यास को इस ‘खीरे’ से बुझा दो, मुझे पूरा भर दो अपने आप से!”
खुदाई की यह प्रक्रिया अब और भी हिंसक और तेज़ होती जा रही थी, राहुल के हर धक्के के साथ नैना के ‘तरबूज’ ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके शरीर से पसीना बहकर आपस में मिल रहा था। राहुल ने अब नैना की पोजीशन बदली और उसे ‘पिछवाड़े से खोदने’ के लिए तैयार किया, नैना के सुडौल ‘पिछवाड़े’ को ऊपर उठाकर उसने अपना सख़्त ‘खीरा’ दोबारा उसकी ‘खाई’ में उतार दिया। यह नया कोण नैना को और भी ज्यादा मज़ा दे रहा था और केबिन में चपा-चप की आवाज़ गूँजने लगी थी, जो राहुल की मर्दानगी का सबूत दे रही थी। नैना मदहोशी में डूब चुकी थी और उसके शरीर का हर अंग अब बस राहुल के धक्कों की लय पर झूम रहा था, उसकी सिसकारियां अब तेज़ चीखों में बदलने लगी थीं।
अंत में, दोनों ही अपनी चरम सीमा पर पहुँच गए थे, राहुल का ‘खीरा’ नैना की ‘खाई’ के अंदर बुरी तरह धड़क रहा था और नैना का शरीर कंपन के साथ सिकुड़ने लगा था। राहुल ने एक आखिरी और गहरा धक्का मारा और उसके ‘खीरे’ से गरम ‘रस निकलने’ लगा, जिसने नैना की पूरी ‘खाई’ को अंदर तक भिगो दिया। उसी पल नैना का भी ‘रस छूटा’ और वो बेदम होकर राहुल के नीचे ढीली पड़ गई, दोनों की सांसें बहुत तेज़ चल रही थीं और केबिन में बस उनकी भारी सांसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। उस पल में जैसे वक्त ठहर गया था और दोनों ने एक-दूसरे को कसकर गले लगा लिया, जैसे वो इस शारीरिक मिलन के बाद रूहानी तौर पर भी जुड़ गए हों।
कुछ देर बाद जब उनकी सांसें सामान्य हुई, तो नैना ने राहुल के माथे का पसीना पोंछा और उसे एक गहरी मुस्कान दी, जिसमें तृप्ति और सुकून साफ़ नज़र आ रहा था। राहुल ने नैना के बिखरे हुए बालों को संवारा और उसे वापस अपनी बाहों में भर लिया, ट्रेन अपनी रफ्तार से मंजिल की ओर बढ़ रही थी लेकिन इन दोनों की मंज़िल तो जैसे इसी केबिन में मिल गई थी। नैना के शरीर की गर्मी और राहुल की बाहों का घेरा उन्हें एक सुरक्षा और अपनापन महसूस करा रहा था, जैसे ये एक रात का रिश्ता नहीं बल्कि सदियों की तलाश का अंत था। उस रात की यादें और वो जिस्मानी खुदाई की महक शायद उन दोनों के दिलों में हमेशा के लिए एक मीठी कसक बनकर ज़िंदा रहने वाली थी।