शहर की चकाचौंध वाली रात थी। दिल्ली की ऊँची इमारतों के बीच, १५वीं मंजिल के उस फ्लैट में, जहां से नीचे की सड़कों पर गाड़ियों की लाइटें नदियों की तरह बह रही थीं, रिया और विक्रम अकेले थे। रिया, अपनी काली टाइट ड्रेस में, बाल खुले छोड़कर बालकनी में खड़ी थी। हवा में ठंडक थी, लेकिन उसके शरीर में एक अलग ही गर्मी फैल रही थी। विक्रम, ऑफिस से लौटा हुआ, शर्ट के ऊपरी दो बटन खुले, सोफे पर बैठा व्हिस्की का ग्लास हाथ में लिए उसे देख रहा था। दोनों के बीच अब सिर्फ दोस्ती नहीं थी – कुछ महीनों से वो अनकही इच्छा बढ़ रही थी, जो आज रात शायद टूटने वाली थी।
रिया ने बालकनी से मुड़कर देखा। विक्रम की आंखें उस पर टिकी थीं – गहरी, भूखी, लेकिन धैर्यवान। वो धीरे से अंदर आई, हाई हील्स की ठक-ठक कमरे में गूंज रही थी। “आज बहुत थक गया ना?” उसने पूछा, आवाज में एक मीठी कंपकंपी। विक्रम ने ग्लास साइड टेबल पर रखा और खड़ा हो गया। “थकान तो दूर हो रही है… बस तुझे देखकर।” उसकी बात में वो सच्चाई थी जो रिया के दिल को छू गई। वो करीब आई, इतनी करीब कि विक्रम को उसकी परफ्यूम की हल्की महक महसूस हुई – जैसे गुलाब और वेनिला का मिश्रण। दोनों की सांसें मिलने लगीं, लेकिन अभी कोई स्पर्श नहीं। सिर्फ नजरें। नजरों में वो सारी बातें जो सालों से दबी पड़ी थीं।
रिया का मन द्वंद्व में था। “ये सही है क्या? हम दोनों… शहर की इस भागदौड़ में… क्या ये सिर्फ एक रात की बात तो नहीं होगी?” लेकिन विक्रम की आंखों में वो गहराई देखकर उसका मन शांत होने लगा। विक्रम ने धीरे से उसका हाथ थामा। उंगलियां आपस में उलझ गईं। रिया की हथेली गर्म थी, पसीने से हल्की नम। वो स्पर्श इतना साधारण था, फिर भी उसके पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई। विक्रम ने उसे अपनी ओर खींचा। अब उनके शरीर सिर्फ कुछ इंच दूर थे। रिया की सांसें तेज हो गईं, छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। विक्रम ने धीरे से उसकी ठुड्डी उठाई और संतरा चूसना शुरू किया – नरम, गहरा, जैसे कोई प्यासा यात्री पहली बार पानी को छू रहा हो। रिया की आंखें बंद हो गईं, होंठ कांप उठे। वो स्पर्श इतना कोमल था कि उसकी रूह तक में कंपन हो गया।
धीरे-धीरे संतरा चूसना गहरा होता गया। विक्रम की जीभ रिया के होंठों पर नाच रही थी, उसे चख रही थी। रिया ने जवाब में उसके होंठों को हल्के से काटा, जैसे कोई मीठा फल चख रही हो। दोनों के बीच अब कोई दूरी नहीं थी। विक्रम की उंगलियां रिया की पीठ पर सरक रही थीं, ड्रेस के पतले कपड़े के ऊपर से उसकी नरम त्वचा को महसूस कर रही थीं। रिया का शरीर हल्का सा कांप उठा। वो शर्म से लाल हो रही थी, लेकिन इच्छा ने शर्म को पीछे धकेल दिया। उसने विक्रम की शर्ट के बटन खोलने शुरू किए – एक-एक करके, धीरे-धीरे। विक्रम की चौड़ी छाती उजागर हुई, जहां पसीना हल्का चमक रहा था। रिया ने अपनी उंगलियां उसकी छाती पर फेरीं, नाखूनों से हल्का सा खरोंचते हुए। विक्रम की सांस रुक गई, एक गहरी आह निकली।
विक्रम ने रिया को गोद में उठाया और बेडरूम की ओर ले गया। शहर की लाइटें खिड़की से आ रही थीं, कमरे में नीली-हरी चमक फैल रही थी। उसने रिया को बिस्तर पर धीरे से लिटाया। रिया की ड्रेस अब कंधों से सरक रही थी। विक्रम ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा – जैसे कोई कलाकार अपनी सबसे खूबसूरत कृति को निहार रहा हो। उसने धीरे से ड्रेस के स्ट्रैप्स नीचे किए। रिया के तरबूज उजागर हुए – गोल, भरे हुए, मटर सख्त और उठे हुए। विक्रम ने एक तरबूज को हाथ में लिया, हल्के से दबाया। रिया की आह निकली, “विक्रम…” उसकी आवाज कांप रही थी। विक्रम ने मटर को अपनी जीभ से छुआ, हल्के से चाटते हुए, जैसे कोई मधुर बूंद चख रहा हो। रिया का शरीर लहरा उठा, पीठ का कमान बन गया। पसीना उसके गले से नीचे सरक रहा था, चमकदार रेखा बनाता हुआ।
विक्रम की उंगलियां अब नीचे सरक रही थीं। रिया की ड्रेस पूरी तरह ऊपर उठ गई। उसने धीरे से रिया की जांघों को सहलाया, अंदर की तरफ बढ़ते हुए। रिया की सांसें भारी हो गईं। वो शर्म से आंखें बंद कर रही थी, लेकिन पैर खुद-ब-खुद फैल रहे थे। विक्रम ने अपनी उंगली रिया की खाई के पास ले जाकर हल्के से छुआ। खाई पहले से ही गीली थी, जैसे बारिश के बाद का फूल। वो धीरे-धीरे उंगली से खोदने लगा – अंदर-बाहर, बहुत धीमे। रिया की कराहें बढ़ गईं, “हाय… विक्रम… और…” उसका मन अब पूरी तरह समर्पित था। शहर की आवाजें बाहर दूर हो गई थीं, सिर्फ उनकी सांसें और कराहें कमरे में गूंज रही थीं।
अब विक्रम ने अपना खीरा निकाला – सख्त, गर्म, तैयार। रिया ने शर्म से नजरें फेर लीं, लेकिन उसकी उंगलियां खुद-ब-खुद उस खीरे को छू रही थीं, उसे सहला रही थीं। विक्रम ने रिया के ऊपर लेटकर सामने से खोदना शुरू किया। खीरा धीरे-धीरे खाई में दाखिल हुआ, जैसे कोई जड़ मिट्टी में उतर रही हो। रिया की आंखें खुल गईं, मुंह से एक लंबी आह निकली। विक्रम बहुत धीमा था – हर धक्के में रिया को पूरा महसूस करा रहा था। रिया के तरबूज हिल रहे थे, मटर सख्त होकर कंपकंपा रहे थे। दोनों के शरीर पसीने से चिपक रहे थे। विक्रम खोदता रहा, गहराई बढ़ाता रहा। रिया की उंगलियां उसकी पीठ पर नाखून गाड़ रही थीं, दर्द और सुख का मिश्रण।
फिर विक्रम ने रिया को पलट दिया। पिछवाड़े की ओर मुंह करके। उसने पहले खाई चाटी – जीभ से गहराई तक, जैसे कोई मीठा रस चूस रहा हो। रिया की कराहें अब चीख में बदल रही थीं। वो तकिए में मुंह दबा रही थी, लेकिन सुख इतना था कि रोक नहीं पा रही थी। विक्रम ने पिछवाड़े से खोदना शुरू किया – धीरे, लेकिन गहराई से। रिया का पूरा शरीर लहरा रहा था। वो अब पूरी तरह खो चुकी थी। विक्रम का खीरा खाई को भर रहा था, हर धक्के में नई लहरें पैदा कर रहा था।
आखिरकार चरम आया। रिया का शरीर कांप उठा, खाई सिकुड़ने लगी। रस छूट गया – गर्म, भरपूर, जैसे कोई फव्वारा फूट पड़ा हो। विक्रम भी रुक नहीं सका – उसका रस निकल आया, खाई में भरते हुए। दोनों थककर एक-दूसरे पर गिर पड़े। सांसें तेज, पसीना बहता हुआ। बाहर शहर अभी भी जाग रहा था, लेकिन उनके लिए वो रात अब हमेशा की हो चुकी थी – गहरी, भावुक, और अनमोल।