
गर्मियों की वह सुनहरी दोपहर आज भी आर्यन के जेहन में ताजा थी जब सूरज की तपिश खिड़की के पर्दों को चीरकर कमरे के अंदर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही थी। आर्यन अपनी ट्यूशन टीचर शोभा मैम के सामने बैठा था जो उसे गणित के कठिन सवालों को सुलझाने में मदद कर रही थीं लेकिन आर्यन का ध्यान आज अंकों से ज्यादा शोभा मैम के उभरते हुए बदन पर टिका था। शोभा ने आज एक हलके नीले रंग की पतली साड़ी पहनी थी जो उनके जिस्म के हर मोड़ को बखूबी बयां कर रही थी और हवा के झोंके के साथ जब उनका पल्लू थोड़ा खिसका तो उनके ब्लाउज के भीतर दबे बड़े-बड़े रसीले तरबूज आधी दुनिया दिखाने को बेताब लग रहे थे।
शोभा मैम जब सवाल समझाने के लिए आगे झुकतीं तो उनकी गहरी और संकरी खाई साफ नजर आती थी जिसे देखकर आर्यन के हलक में जैसे जान अटक जाती थी। उनके शरीर से उठने वाली चमेली के इत्र की खुशबू और पसीने की मिली-जुली महक ने आर्यन के भीतर एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी थी जिसकी वजह से उसकी पतलून के भीतर उसका सोया हुआ खेरा धीरे-धीरे अपनी गर्दन उठाने लगा था। शोभा की नजरें तो किताब पर थीं लेकिन वह भी आर्यन की बदलती हुई सांसों की आवाज को महसूस कर पा रही थीं और उनके भीतर भी कहीं न कहीं एक औरत की प्यास धीरे-धीरे अंगड़ाई ले रही थी जो सालों से एक अधूरी चाहत की आग में जल रही थी।
बातचीत का सिलसिला धीरे-धीरे पढ़ाई से हटकर निजी बातों की ओर मुड़ने लगा और हवा में एक गहरा तनाव महसूस होने लगा जो सिर्फ जिस्मानी खिंचाव का था। शोभा ने अपनी उंगलियों से माथे का पसीना पोंछा जिससे उनके तरबूज और भी ज्यादा उभर कर सामने आए और उनके शीर्ष पर मौजूद नन्हे मटर के दाने जैसे ब्लाउज के कपड़े को फाड़कर बाहर आने की जिद करने लगे थे। आर्यन ने हिम्मत जुटाकर अपनी टीचर के हाथ पर अपना हाथ रखा तो एक बिजली सी दौड़ गई और शोभा ने अपनी पलकें झुका लीं जिसका साफ मतलब था कि उन्हें इस छुअन से कोई ऐतराज नहीं है बल्कि वह खुद भी इस पल का बेसब्री से इंतजार कर रही थीं।
आर्यन धीरे से उठा और शोभा के ठीक पीछे जाकर उनके कंधों को सहलाने लगा जिससे शोभा के मुंह से एक दबी हुई आह निकल गई जो उस शांत कमरे में संगीत की तरह गूंजी। उसने झुककर उनके गर्दन के पास अपने होठों का मिलन कराया तो शोभा का पूरा बदन कांप उठा और उन्होंने पीछे मुड़कर आर्यन को अपनी बाहों में भर लिया जिससे उनके तरबूज सीधे आर्यन की छाती से टकरा गए। उस वक्त आर्यन का खेरा पूरी तरह से सख्त होकर अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा था और शोभा ने भी शर्माते हुए अपनी हथेली उस पर रख दी तो जैसे आर्यन के सब्र का बांध ही टूट गया हो और वह उन्हें चूमने लगा।
आर्यन ने धीरे-धीरे शोभा की साड़ी के बंधन ढीले किए और जल्द ही वह अपने अंतःवस्त्रों में उसके सामने खड़ी थीं जहां उनके विशाल तरबूज अपनी पूरी गरिमा के साथ हिल रहे थे। शोभा की सांसें तेज हो चुकी थीं जब आर्यन ने अपनी जुबान से उनके गुलाबी मटर को सहलाना शुरू किया और शोभा ने सिसकारी भरते हुए उसके बालों में अपनी उंगलियां फंसा लीं। नीचे उनकी रेशमी खाई अब पूरी तरह से गीली होकर किसी मुसाफिर का इंतजार कर रही थी और वहां के घने जंगलों जैसे बालों के बीच से निकलती नमी ने आर्यन को पागल कर दिया था जिससे उसने फौरन अपनी उंगली से खाई की गहराई को नापना शुरू कर दिया।
शोभा अब और बर्दाश्त नहीं कर पा रही थीं और उन्होंने आर्यन को बिस्तर पर लिटाकर उसके कठोर खेरे को अपने हाथों में ले लिया और उसे प्यार से सहलाने लगीं। कुछ ही पलों में शोभा ने उस रसीले खेरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे पूरी शिद्दत से चूसने लगीं जिससे आर्यन की आंखों के सामने तारे नाचने लगे और वह बस उनके सिर को पकड़कर उस सुख को महसूस करने लगा। शोभा का मुंह उस खेरे के आकार को पूरी तरह समाने की कोशिश कर रहा था और उनकी जीभ का कमाल आर्यन को जन्नत की सैर करा रहा था लेकिन उसे तो उस गहरी खाई में उतरने की जल्दी थी।
आर्यन ने शोभा को सीधा लिटाया और सामने से खुदाई (missionary) करने की स्थिति में आ गया जहां उनके दोनों पैरों को उठाकर अपने कंधों पर रख लिया। जैसे ही आर्यन ने अपने खेरे का सिरा उस गीली और गर्म खाई के मुहाने पर टिकाया शोभा ने अपनी आंखें बंद कर लीं और एक गहरी सांस ली। एक जोरदार धक्के के साथ पूरा खेरा उस तंग खाई के भीतर समा गया और शोभा के मुंह से एक चीख निकल गई जो दर्द और आनंद का मिला-जुला अहसास थी क्योंकि उस तंग रास्ते में आर्यन की चौड़ाई ने हलचल मचा दी थी।
कमरे में अब सिर्फ थप-थप की आवाजें आ रही थीं क्योंकि आर्यन बड़ी तेजी और गहराई के साथ खुदाई कर रहा था और हर धक्के के साथ शोभा के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे। शोभा ने अपने पैरों को आर्यन की कमर के चारों ओर कस लिया ताकि वह और भी गहराई तक खुदाई कर सके और उसकी हर रग को महसूस कर सके। “ओह आर्यन, और जोर से खोदो… मुझे पूरी तरह अपना बना लो,” शोभा के ये शब्द आर्यन की आग में घी डालने का काम कर रहे थे और वह पागलों की तरह उनकी खाई को रौंदने लगा था जिससे हर तरफ पसीना और प्यार का रस बिखरने लगा था।
कुछ देर बाद आर्यन ने उन्हें घुमाया और पिछवाड़े से खुदाई (doggy style) करने लगा जहां शोभा घुटनों के बल झुकी हुई थीं और उनका भारी पिछवाड़ा आर्यन के सामने था। उस स्थिति में खुदाई और भी गहरी हो रही थी और आर्यन के हर प्रहार के साथ शोभा की आहें और भी तीखी होती जा रही थीं क्योंकि खेरा सीधे उनकी कोख की दीवारों से टकरा रहा था। शोभा की खाई अब पूरी तरह से झाग छोड़ रही थी और आर्यन भी अपने रस के आखिरी छोर पर पहुंच चुका था जहां उसका पूरा शरीर थरथराने लगा था और नियंत्रण खो रहा था।
अंततः एक आखिरी जबरदस्त धक्के के साथ आर्यन के खेरे से सारा गर्म रस छूटकर शोभा की खाई की गहराई में जमा होने लगा और शोभा भी अपनी चरम सीमा पर पहुंचकर जोर-जोर से कांपने लगीं। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए पसीने से तरबतर बिस्तर पर गिर पड़े और कई मिनटों तक बस एक-दूसरे की सांसों को महसूस करते रहे। उस दिन की वह खुदाई ने उनके गुरु-शिष्य के रिश्ते को एक नए और गहरे अहसास में बदल दिया था जहां शर्म की कोई जगह नहीं थी बल्कि सिर्फ एक-दूसरे की रूह और जिस्म की संतुष्टि थी जिसके बाद शोभा की हालत ऐसी थी कि वह हिलने के काबिल भी नहीं बची थीं।