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गाँव की वो रात और चु@@ई

कुसुम उस छोटे से गाँव के आखिरी खेत के पास बने मिट्टी के मकान में अकेली थी। रात के १२ बज चुके थे। बाहर खेतों में सरसों के फूल हल्की हवा में लहरा रहे थे, और दूर कहीं कोई कुत्ता भौंक रहा था। चाँद की रोशनी खिड़की से झांक रही थी, और कुसुम की पीली साड़ी पसीने और रात की नमी से चिपकी हुई थी। साड़ी का पल्लू बार-बार सरक रहा था, जिससे उसके तरबूज हल्के-हल्के उठ-गिर रहे थे – उनकी गोलाई, उनकी भारीपन, चाँदनी में चमकते हुए। वह कई महीनों से अकेली थी – पति शहर में मजदूरी करने गया था, और घर में सिर्फ खामोशी और एक दबी हुई भूख बाकी थी। आज रात वह भूख इतनी तेज थी कि जैसे खेत की मिट्टी खुद पानी मांग रही हो।

तभी बाहर से किसी के पैरों की आहट आई। कुसुम ने झांककर देखा। सामने हरिया खड़ा था – गाँव का ही जवान खेतिहर मजदूर, जिसके खेत कुसुम के खेत से सटे हुए थे। हरिया का शरीर मेहनत से कसा हुआ था, धूप से काला, कुर्ता पसीने से भीगा हुआ, और आँखों में एक गहरी, कच्ची लालसा। उसके हाथ में एक छोटी सी लालटेन थी। “कुसुम… रात को अकेली हो? खेत से लौट रहा था… पानी पी लूं?” उसकी आवाज में एक कांपती हुई गर्मी थी। कुसुम ने कुछ नहीं कहा। बस दरवाजा खुला छोड़ दिया और अंदर चली गई। उसका मन डर और शर्म से भर गया था, लेकिन शरीर पहले से ही उसकी तरफ खिंच रहा था – जैसे सूखी मिट्टी बारिश की पहली बूंद को सोख लेती है।

दोनों छोटे से आँगन में बैठ गए। लालटेन की पीली रोशनी में हरिया का चेहरा और गहरा लग रहा था। बातें शुरू हुईं – खेतों की फसल, बारिश की उम्मीद, कुसुम की अकेली रातें। लेकिन शब्द जल्दी खत्म हो गए। नजरें ज्यादा बोलने लगीं – भूखी, गहरी, बेकाबू। हरिया ने धीरे से कहा, “तुम्हारी आँखों में वो उदासी नहीं… वो प्यास है, जो दिन भर छुपाती हो।” कुसुम ने कुछ नहीं कहा। बस सिर झुका लिया। हरिया का हाथ धीरे से बढ़ा और कुसुम की उंगलियों को छुआ। उस स्पर्श में खेत की सारी मिट्टी की गर्मी थी – कच्ची, मेहनती, अनियंत्रित। कुसुम की सांस रुक गई। उसकी खाई में अब गर्म, चिपचिपा रस महसूस हो रहा था – जैसे कोई खेत की नाली में पानी भरने लगा हो।

हरिया धीरे से और करीब आया। उनकी सांसें अब एक हो चुकी थीं। पहले संतरा चूसना धीमा था, लेकिन इतना गहरा कि जैसे सालों की भूख एक साथ फूट पड़ी हो। हरिया के होंठ कुसुम के होंठों को ऐसे चूस रहे थे जैसे कोई पका आम पहली बार तोड़ा जा रहा हो – धीरे-धीरे, हर रस को सोखते हुए, जीभ अंदर तक घुसकर खेल रही थी। कुसुम की आँखें बंद हो गईं। उसके शरीर में मीठी, तेज कंपकंपी दौड़ गई। हरिया का हाथ उसकी कमर पर फिसला, फिर पीठ पर। उसने साड़ी का पल्लू धीरे से खींचा। साड़ी सरककर गिर गई। कुसुम के तरबूज चाँदनी में नंगे चमक रहे थे। मटर इतने सख्त थे कि हल्की हवा से भी कांप रहे थे। हरिया ने दोनों हाथों से एक तरबूज को थामा – हल्के से दबाया, फिर जोर से मसला, निचोड़ा। कुसुम के मुंह से एक गहरी, लंबी कराह निकली – “आआह्ह्ह… हरिया…”। हरिया ने मटर को मुंह में लिया, जीभ से गोल-गोल घुमाया, धीरे-धीरे, लंबे समय तक चूसा – जैसे कभी छोड़ना ही न चाहता हो। कुसुम ने हरिया के बालों में उंगलियां फंसाईं, उसे इतनी जोर से खींचा कि उसकी सांस रुक गई।

हरिया ने कुसुम को आँगन की चटाई पर लिटा दिया। बाहर खेतों से ठंडी हवा आ रही थी, लेकिन दोनों के शरीरों से निकलती गर्मी ने सब कुछ भगा दिया। हरिया ने अपनी कुर्ता-पायजामा उतार दिया। उसका खीरा खेत की मेहनत से तना हुआ था – मजबूत, गहरा, गर्म। कुसुम ने उसे देखा। शर्म से आँखें बंद कीं, लेकिन फिर खोलकर घूरती रही – उत्सुकता, लालसा, डर सब मिलकर एक नई आग जला रहे थे। हरिया ने कुसुम की साड़ी पूरी तरह उतार दी। अब कुसुम सिर्फ चाँदनी और हरिया की नजरों के सामने थी। उसने कुसुम की जांघों को सहलाया – धीरे-धीरे, अंदरूनी तरफ बढ़ते हुए। खाई पर बाल गीले, चिपके हुए, गर्माहट से लथपथ थे। हरिया ने पहले उंगली से छुआ, फिर दो उंगलियां धीरे से अंदर डालीं – गहराई तक। कुसुम की कमर इतनी जोर से उठी कि चटाई हिल गई। “हरिया… और… जैसे खेत में हल चलाते हो…” उसकी आवाज अब जरूरत भरी पुकार थी। हरिया ने खाई चाटना शुरू किया – जीभ धीरे-धीरे अंदर जाती, बाहर आती, हर कोने को चाटती, सोखती। कुसुम का पूरा शरीर लहरा रहा था। खुजली इतनी गहरी थी कि वह चीखने को तैयार थी।

हरिया ने अपना खीरा कुसुम की खाई के मुंह पर टिकाया। बहुत धीरे से दबाया। खीरा अंदर सरकता हुआ महसूस हुआ – हर इंच एक नया राज खोल रहा था। कुसुम ने दर्द और सुख से अंगुलियां हरिया की पीठ पर गाड़ दीं। हरिया रुक-रुक कर अंदर जा रहा था। जब खीरा पूरी तरह अंदर समा गया तो दोनों एक पल रुके – सांसें मिली हुईं, दिल एक लय में। फिर हरिया ने पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। कुसुम घुटनों के बल थी, हरिया पीछे से। हर गहरे धक्के के साथ कुसुम के तरबूज लहरा रहे थे, चाँदनी में चमकते हुए। हरिया एक हाथ से उन्हें मसल रहा था, निचोड़ रहा था, दूसरा हाथ कमर पर कसकर जकड़े हुए। कुसुम की कराहें अब खेतों की हवा में घुल गई थीं – सरसों की महक, कुत्ते की भौंक, सब उनके सुख में शामिल हो गए थे। पसीना दोनों के शरीर पर नदियों सा बह रहा था।

रफ्तार अब पूरी तरह जंगली हो चुकी थी। कुसुम महसूस कर रही थी कि उसकी खाई खीरे को कसकर जकड़े हुए है – हर थ्रस्ट पर और गहरा खींच रही है। हरिया हर बार पूरी ताकत से धक्का दे रहा था। अचानक कुसुम का शरीर तेजी से कांप उठा। रस छूट गया – गर्म, तेज लहरें खाई से निकलकर खीरे को भिगो रही थीं। हरिया भी कुछ सेकंड बाद जोर से कांप उठा और अपना रस अंदर छोड़ दिया – गहरा, गर्म, जैसे खेत में बीज बो दिया हो। दोनों थककर चटाई पर गिर पड़े। लंबे समय तक एक-दूसरे से चिपके रहे।

बाहर चाँद अभी भी झांक रहा था। कुसुम ने हरिया की छाती पर सिर रखा। हरिया ने उसके बाल सहलाए। कुसुम धीरे से बोली, “सुबह सबको पता चल जाएगा?” हरिया ने उसके माथे पर होंठ रखे और फुसफुसाया, “खेत की मिट्टी सब जानती है… लेकिन चुप रहती है। यह रात सिर्फ हमारी है।” दोनों ने एक-दूसरे को देखा। वो रात गाँव की सबसे गहरी, सबसे मीठी रात बन गई।

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